
Judicial scrutiny of real estate regulation as the Supreme Court raises concerns over RERA. Shah Times
जब नियामक भटक जाए, सवाल व्यवस्था पर उठते हैं
रेरा, बिल्डर और भरोसे की टूटी दीवार
रियल एस्टेट नियामक व्यवस्था पर अदालत की तीखी टिप्पणी ने एक पुराना सवाल फिर जगा दिया है। क्या घर खरीदार सच में सुरक्षित हैं, या व्यवस्था कहीं और झुक गई है।
अदालत की सख़्त मौखिक टिप्पणी ने रियल एस्टेट नियामक के कामकाज पर भरोसे की दरार उजागर की है। मुद्दा सिर्फ़ एक कार्यालय के स्थानांतरण का नहीं, बल्कि उस मक़सद का है जिसके लिए यह संस्था बनी थी।
📍New Delhi 👈 Asif Khan
सुप्रीम कोर्ट की फटकार और रियल एस्टेट का आईना
अदालत की आवाज़ और जनता की बेचैनी
सुप्रीम कोर्ट की हालिया टिप्पणी सिर्फ़ कानूनी बहस नहीं थी। वह उन हज़ारों आवाज़ों की गूँज थी जो सालों से फ़ाइलों, तारीख़ों और अधूरे वादों के बीच फँसी हैं। जब अदालत कहती है कि जिनके लिए संस्था बनी, वही निराश हैं, तो यह वाक्य काग़ज़ पर नहीं, ज़मीन पर उतरता है। एक आम घर खरीदार के लिए घर सपना होता है, निवेश नहीं। और जब सपना टूटता है, तो दर्द हिसाब किताब नहीं देखता।
मक़सद से भटकती संस्था
रियल एस्टेट क्षेत्र में पारदर्शिता लाने के लिए बनी रियल एस्टेट रेगुलेटरी अथॉरिटी का उद्देश्य साफ़ था। देरी रुके, धोखा थमे, और खरीदार को न्याय मिले। लेकिन अदालत की टिप्पणी बताती है कि तस्वीर उलटी नज़र आ रही है। ऐसा लगता है मानो डिफ़ॉल्ट करने वाले बिल्डरों के लिए राहत का रास्ता चौड़ा है, और खरीदार के लिए इंतज़ार लंबा। सवाल यह नहीं कि नियम हैं या नहीं, सवाल यह है कि वे किसके लिए काम कर रहे हैं।
हिमाचल का मामला, राष्ट्रीय संकेत
हिमाचल प्रदेश से जुड़ा कार्यालय स्थानांतरण का विवाद एक प्रतीक बन गया। शिमला से धर्मशाला का सफ़र सिर्फ़ फ़ाइलों का नहीं था, भरोसे का भी था। अदालत ने राज्य सरकार के फ़ैसले को मान्यता दी, पर साथ ही पूरी प्रणाली पर उँगली रख दी। यह वही क्षण था जब स्थानीय बहस राष्ट्रीय विमर्श में बदल गई।
मौखिक टिप्पणी का वज़न
कई लोग कह सकते हैं कि यह अंतिम फ़ैसला नहीं, सिर्फ़ मौखिक टिप्पणी है। पर न्यायिक भाषा में मौखिक शब्द भी दिशा देते हैं। जब पीठ यह कहती है कि अगर संस्था खत्म भी हो जाए तो आपत्ति नहीं, तो यह चेतावनी है। यह कहना है कि सुधार अब विकल्प नहीं, ज़रूरत है।
जजों की चिंता, व्यवस्था की परीक्षा
सूर्य कांत और जोयमाल्या बागची की टिप्पणियाँ भावनात्मक नहीं, तर्कपूर्ण थीं। उन्होंने पूछा कि जिन लोगों को राहत मिलनी चाहिए थी, वे क्यों भटक रहे हैं। यह सवाल सीधा है, और जवाब मुश्किल। क्योंकि जवाब में नीति, राजनीति और प्रशासन तीनों खड़े हैं।
खरीदार का अनुभव, क़ानून की किताब से बाहर
ज़रा सोचिए, एक मध्यम वर्गीय परिवार जो सालों की बचत लगाकर फ्लैट बुक करता है। समय पर कब्ज़ा नहीं मिलता। शिकायत दर्ज होती है। सुनवाई होती है। आदेश आता है। फिर अपील, फिर देरी। इस पूरी प्रक्रिया में कानून मौजूद है, पर इंसाफ़ दूर। अदालत की नाराज़गी इसी दूरी पर है।
क्या रेरा पुनर्विचार चाहता है
अदालत का कहना कि सभी राज्यों को रेरा के गठन पर दोबारा सोचना चाहिए, हल्की बात नहीं। यह संकेत है कि ढांचा शायद अपने बोझ से झुक रहा है। कहीं ऐसा तो नहीं कि नियामक और नियंत्रित के बीच फ़ासला मिट गया हो। जब नियामक वही भाषा बोलने लगे जो उसे नियंत्रित करनी थी, तब संतुलन बिगड़ता है।
प्रशासनिक फैसले और न्यायिक सीमाएँ
अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कार्यालय का स्थानांतरण नीति का विषय है। न्यायपालिका हर प्रशासनिक फ़ैसले में दख़ल नहीं दे सकती। यह संतुलन ज़रूरी है। लेकिन जब नीति से प्रभावित अधिकारों की बात आती है, तब न्यायिक निगरानी स्वाभाविक हो जाती है। यही वह बारीक रेखा है जिस पर यह मामला खड़ा है।
सेवानिवृत्त अधिकारी और विशेषज्ञता का सवाल
सुनवाई में उठाया गया सवाल कि सेवानिवृत्त अधिकारी किस तरह क्षेत्रीय विकास समझेंगे, सिर्फ़ व्यक्ति पर टिप्पणी नहीं है। यह सिस्टम डिज़ाइन की आलोचना है। रियल एस्टेट, पर्यावरण, शहरी योजना यह सब तकनीकी और स्थानीय समझ माँगते हैं। सिर्फ़ पद का अनुभव पर्याप्त नहीं, ज़मीन की समझ भी चाहिए।
अपील की पहुँच और न्याय की दूरी
अदालत का निर्देश कि अपील की शक्ति स्थानांतरित हो, एक व्यावहारिक पहलू दिखाता है। न्याय सिर्फ़ आदेश नहीं, पहुँच भी है। अगर अपील के लिए सौ किलोमीटर का सफ़र करना पड़े, तो अधिकार काग़ज़ पर रह जाता है। यह छोटा सा निर्देश बड़ी सोच को दिखाता है।
सुधार की राह, या अंत की बहस
सबसे तीखा सवाल यही है कि क्या रेरा में सुधार संभव है, या उसे नए सिरे से सोचना होगा। संस्था को खत्म करने की बात चौंकाती है, पर शायद झकझोरने के लिए ज़रूरी है। कभी कभी सिस्टम को आईना दिखाने के लिए कड़े शब्द चाहिए होते हैं।
संतुलन का रास्ता
यह बहस बिल्डर बनाम खरीदार की नहीं होनी चाहिए। रियल एस्टेट अर्थव्यवस्था का अहम हिस्सा है। निवेश, रोज़गार, शहरों का विकास सब इससे जुड़े हैं। पर विकास का मतलब अधिकारों की अनदेखी नहीं। संतुलन वही है जहाँ कारोबार चले, और इंसाफ़ भी।
अंत में, भरोसे की बात
नियामक संस्थाएँ क़ानून से नहीं, भरोसे से चलती हैं। जब भरोसा डगमगाता है, तो अदालत की आवाज़ तेज़ होती है। रेरा पर आई यह टिप्पणी एक मौका है। सुधार का, आत्ममंथन का, और उस वादे को याद करने का जो घर खरीदार से किया गया था।





