
यूनुस के बाद बांग्लादेश: तारिक रहमान से उम्मीद और जोखिमचुनाव, सुधार और नई सत्ता की असली कसौटी
बांग्लादेश में बदलाव का पल और उसकी कीमत
अवामी लीग के पतन के बाद बांग्लादेश में सत्ता, सुधार और चुनाव की बहस तेज है। यूनुस के अंतरिम नेतृत्व से लेकर तारिक रहमान की जीत तक।यूनुस के सुधार एजेंडे, अवामी लीग के विरोध, तारिक रहमान की चुनावी रणनीति और क्षेत्रीय प्रभावों को तौलते हुए यह पूछा गया है कि क्या बदलाव टिकाऊ है। यह लेख नए बांग्लादेश की दिशा पर सवाल उठाता है।
📍 Dhaka ✍️ Asif Khan
एक टूटे तंत्र से उम्मीद तक
बांग्लादेश आज उस मोड़ पर खड़ा है जहाँ हर फैसला आने वाले दशकों की दिशा तय करेगा। अवामी लीग के पतन के बाद जब अंतरिम जिम्मेदारी डॉ. मोहम्मद यूनुस को सौंपी गई, तो उम्मीद भी थी और शंका भी। उम्मीद इसलिए कि उन्होंने गरीबी को समझा है, जमीनी हकीकत देखी है। शंका इसलिए कि क्या एक नैतिक दृष्टि से मजबूत व्यक्ति राजनीतिक मशीनरी को साध सकता है। जैसे किसी पुराने घर की नींव हिल चुकी हो, ऊपर से रंग करने से काम नहीं चलता। सवाल यह था कि मरम्मत कहाँ से शुरू हो।
सुधार का वादा और सत्ता की सीमा
यूनुस ने साफ कहा कि केवल चुनाव करा देना काफी नहीं। यह बात सुनने में साधारण लगती है, पर राजनीति में यह असहज सच है। सुधार चार्टर, जनमत संग्रह, और जवाबदेही की बात ने उम्मीद जगाई। लेकिन यहीं एक विरोधाभास भी उभरा। अंतरिम सत्ता के पास नैतिक अधिकार होता है, पर राजनीतिक ताकत सीमित रहती है। जैसे कोई डॉक्टर मरीज को सलाह दे, पर दवा खाने का फैसला मरीज ही करे। यूनुस की अपील में दम था, पर जमीन पर सहमति बनाना कठिन था।
अवामी लीग का विरोध और पुरानी राजनीति की वापसी
अवामी लीग ने चुनाव प्रक्रिया को अवैध बताया। पार्टी का कहना है कि इस माहौल में निष्पक्षता संभव नहीं। यहां सवाल सिर्फ एक दल का नहीं, बल्कि लोकतंत्र की स्मृति का है। अवामी लीग लंबे समय तक सत्ता में रही, और सत्ता छोड़ने के बाद उसका विरोध स्वाभाविक है। लेकिन क्या यह विरोध आत्ममंथन के बिना विश्वसनीय बन सकता है। शेख हसीना के निर्वासन और सजा ने राजनीति को और कड़ा बना दिया। यह सख्ती न्याय है या प्रतिशोध, इस पर समाज बंटा हुआ है।
तारिक रहमान की जीत और नई शैली
चुनाव में तारिक रहमान की जीत सिर्फ सीटों की गणना नहीं थी। यह शैली की जीत थी। युवाओं से सीधी बातचीत, अनौपचारिक संवाद, और डिजिटल प्लेटफॉर्म का इस्तेमाल। राजनीति यहां भाषण से हटकर बातचीत बनी। जैसे किसी चाय की दुकान पर लोग खुलकर बात करते हैं, वैसी राजनीति। यह तरीका ताजा था, पर क्या यह टिकाऊ है। जीत के बाद सबसे कठिन काम शुरू होता है, वादों को निभाना।
भारतीय रणनीतियों की छाया
बीएनपी के अभियान में भारतीय चुनावी शैलियों की झलक दिखी। बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी ने सोशल मीडिया, जमीनी संवाद और प्रतीकों का इस्तेमाल किया। ‘चायेर अड्डा’ का विचार लोगों को जोड़ता दिखा। यहां सवाल यह नहीं कि प्रेरणा कहाँ से आई, सवाल यह है कि क्या इसे स्थानीय संदर्भ में ढाला गया। राजनीति नकल से नहीं, अनुकूलन से सफल होती है। भारत में जो काम करता है, वह बांग्लादेश में उसी तरह चले, यह जरूरी नहीं।
युवा मतदाता और भावनात्मक राजनीति
चार करोड़ से अधिक नए मतदाता। यह संख्या नहीं, यह जिम्मेदारी है। “मुझे सर नहीं, भाई कहो” जैसे नारे भावनात्मक जुड़ाव बनाते हैं। यह जुड़ाव जरूरी है, पर अधूरा भी। भावनाएं पुल बनाती हैं, नीतियां सड़क। अगर सड़क मजबूत नहीं, तो पुल कहीं नहीं ले जाता। युवाओं को रोजगार, शिक्षा और सुरक्षा चाहिए। सवाल यह है कि क्या नई सत्ता इन बुनियादी मुद्दों पर उतनी ही ऊर्जा लगाएगी जितनी प्रचार में दिखाई गई।
जमात की मौजूदगी और भविष्य की चुनौती
जमात-ए-इस्लामी का मजबूत प्रदर्शन याद दिलाता है कि बांग्लादेश की राजनीति एकध्रुवीय नहीं है। आरोप, प्रत्यारोप और “फिक्स्ड” चुनाव की बातें माहौल को गर्म रखती हैं। यह तनाव लोकतंत्र की परीक्षा है। असहमति लोकतंत्र की आत्मा है, पर हिंसा उसका जहर। यहां संयम और संवाद की जरूरत है, न कि जल्दबाजी की।
क्षेत्रीय रिश्ते और कूटनीति
बांग्लादेश और भारत के रिश्तों में खटास नई नहीं, पर मौजूदा हालात ने इसे गहरा किया है। राजनीति के बदलाव का असर सीमाओं से परे जाता है। नई सरकार के सामने चुनौती है कि घरेलू जनादेश और क्षेत्रीय संतुलन में तालमेल बिठाए। विदेश नीति में कठोर शब्द आसान होते हैं, स्थिर रिश्ते मुश्किल।
यूनुस की विदाई और विरासत
यूनुस को पद छोड़ना है। सवाल यह नहीं कि वे गए, सवाल यह है कि क्या छोड़ा। अगर सुधार की प्रक्रिया संस्थागत रूप लेती है, तो उनकी भूमिका ऐतिहासिक होगी। अगर सब कुछ चुनावी जीत में सिमट गया, तो यह एक अधूरा अध्याय बनेगा। इतिहास व्यक्तियों से नहीं, संस्थाओं से बनता है। यही कसौटी है।
आगे का रास्ता
बांग्लादेश के सामने विकल्प साफ हैं। या तो नई सत्ता पुराने तरीकों को नए नारों में पैक करे, या सच में व्यवस्था बदले। जनता ने संकेत दे दिया है कि वह बदलाव चाहती है। अब सत्ता की बारी है कि वह सुनना भी सीखे। राजनीति का असली इम्तिहान चुनाव नहीं, शासन है। और यह इम्तिहान हर दिन होता है।




