
Prime Minister addressing a public rally in Assam ahead of elections, highlighting security and development. Shah Times
पुलवामा, पूर्वोत्तर और सत्ता का सवाल
असम की रैली और केंद्र की राजनीति
असम की रैली और केंद्र की राजनीति
असम के चुनावी माहौल में प्रधानमंत्री का भाषण केवल एक राजनीतिक संबोधन नहीं रहा। उसमें पुलवामा की स्मृति, आतंकवाद के खिलाफ कड़ा रुख, पूर्वोत्तर के विकास के दावे और विपक्ष पर तीखे हमले एक साथ आए। यह संपादकीय उस भाषण के भाव, तर्क और निहितार्थों की पड़ताल करता है।
प्रधानमंत्री ने असम में विकास परियोजनाओं का जिक्र करते हुए सुरक्षा और राष्ट्रवाद को केंद्र में रखा। कांग्रेस पर तीखे आरोप लगाए गए। सवाल यह है कि क्या यह राजनीति स्मृति को मजबूत करती है या बहस को सीमित करती है। यह विश्लेषण दावों और प्रतिदावों के बीच संतुलन खोजने की कोशिश है।
📍 Guwahati ✍️ Asif Khan
चुनाव से पहले असम में राष्ट्रवाद की नई परिभाषा
चुनावी मंच और राष्ट्रीय स्मृति
असम की जनसभा में पुलवामा का जिक्र आते ही माहौल गंभीर हो गया। शहीदों के प्रति सम्मान हर भारतीय के दिल में है। यह साझा पीड़ा है। लेकिन जब इसी स्मृति को चुनावी भाषण का केंद्रीय बिंदु बनाया जाता है, तो उसका स्वर बदल जाता है। स्मृति तब नीति बन जाती है और नीति राजनीति। सवाल यह नहीं कि याद किया जाए या नहीं, सवाल यह है कि कैसे और किस संदर्भ में।
सुरक्षा का दावा और भरोसा
प्रधानमंत्री ने कहा कि आतंकवाद के खिलाफ भारत की कार्रवाई पूरी दुनिया ने देखी। यह बात समर्थकों में भरोसा पैदा करती है। आम आदमी जब शाम को खबरें देखता है, तो उसे लगता है कि देश सुरक्षित हाथों में है। लेकिन यहीं एक दूसरा सवाल उठता है। क्या सुरक्षा केवल जवाबी कार्रवाई से मापी जा सकती है। दीर्घकालिक शांति, स्थानीय संवाद और विश्वास का क्या स्थान है।
विपक्ष पर हमले की राजनीति
कांग्रेस पर आतंकियों को समर्थन देने जैसे आरोप चुनावी जोश बढ़ाते हैं। लेकिन लोकतंत्र में विपक्ष की भूमिका केवल विरोध करने की नहीं, सवाल पूछने की भी होती है। अगर हर सवाल को देशद्रोह की तरह देखा जाए, तो बहस का दरवाजा बंद हो जाता है। एक स्वस्थ व्यवस्था में सरकार मजबूत होती है, पर सवालों से डरती नहीं।
पूर्वोत्तर का विकास और हकीकत
प्रधानमंत्री ने कहा कि पहले पूर्वोत्तर को नजरअंदाज किया गया। यह बात कई लोगों को सच लगती है। सड़कें बनी हैं, पुल बने हैं, कनेक्टिविटी बढ़ी है। असम में ब्रह्मपुत्र पर नए सेतु उम्मीद जगाते हैं। लेकिन गांव के किसान और शहर के युवा अलग तस्वीर भी देखते हैं। विकास के फायदे सब तक पहुंचे या नहीं, यह सवाल अभी खुला है।
बजट के आंकड़े और जमीन
आम बजट 2026 में असम को अधिक टैक्स हिस्सेदारी मिलने का दावा किया गया। आंकड़े बड़े हैं और सुनने में प्रभावशाली भी। पर आम नागरिक अपने घर के बजट से तुलना करता है। क्या उसकी आय बढ़ी। क्या शिक्षा और स्वास्थ्य सुलभ हुए। आंकड़े तभी मायने रखते हैं जब वे रोजमर्रा की जिंदगी में बदलाव लाएं।
संगठन और कार्यकर्ता
प्रधानमंत्री ने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं की सराहना की। यह राजनीति की सच्चाई है कि असली मेहनत वही करते हैं। एक कार्यकर्ता सुबह से रात तक लोगों से मिलता है, समस्याएं सुनता है। लेकिन संगठन की मजबूती के साथ यह सवाल भी उठता है कि क्या भीतर की असहमति सुनी जाती है। संगठन मजबूत हो, पर संवाद खुला रहे, यही लोकतांत्रिक संतुलन है।
धर्म, आस्था और पहचान
कामाख्या मंदिर का जिक्र भावनात्मक जुड़ाव बनाता है। असम की संस्कृति विविध है और गर्व का विषय भी। लेकिन जब आस्था राजनीति की भाषा बनती है, तो कुछ लोग खुद को बाहर महसूस करते हैं। एक समावेशी राजनीति को यह ध्यान रखना होता है कि श्रद्धा जोड़ने का काम करे, दूरी बढ़ाने का नहीं।
राष्ट्रवाद की सीमाएं
“भारत माता” जैसे नारे कई लोगों को प्रेरित करते हैं। लेकिन राष्ट्रवाद की एक ही परिभाषा तय कर देना विविध समाज में टकराव पैदा कर सकता है। सवाल यह नहीं कि कौन देश से प्यार करता है। सवाल यह है कि क्या अलग तरीके से सोचने वाला भी उतना ही देशभक्त माना जाएगा।
पुलवामा की बरसी और जवाबदेही
पुलवामा की बरसी पर शोक स्वाभाविक है। पर सात साल बाद समीक्षा भी जरूरी है। क्या सुरक्षा व्यवस्था में सुधार हुआ। क्या चूक से सबक लिया गया। स्मृति का सम्मान तभी पूरा होता है जब भविष्य सुरक्षित हो। केवल भावनात्मक भाषण से यह काम अधूरा रह जाता है।
पहचान की राजनीति और असम
असम में पहचान का सवाल पुराना है। घुसपैठ, नागरिकता और संसाधनों का दबाव जटिल मुद्दे हैं। इन्हें केवल आरोपों से नहीं सुलझाया जा सकता। नीति को मानवीय दृष्टि भी चाहिए। अगर विकास के साथ भरोसा नहीं जुड़ा, तो योजनाएं कागज पर ही रह जाती हैं।
चुनाव और नैतिकता
चुनाव से पहले परियोजनाओं का लोकार्पण कानूनी है। लेकिन नैतिक सवाल बना रहता है। क्या यह निरंतर शासन का हिस्सा है या प्रचार का साधन। मतदाता समझदार है। वह समय और नीयत दोनों को परखता है।
विकास बनाम संवाद
सरकार विकास की बात करती है और यह जरूरी भी है। लेकिन संवाद उतना ही जरूरी है। जब विरोध की आवाज दबती है, तो असंतोष भीतर जमा होता है। लोकतंत्र में विकास और संवाद साथ चलते हैं।
अंतिम विचार
प्रधानमंत्री का भाषण समर्थकों के लिए विश्वास का संदेश था। आलोचकों के लिए यह तीखी और विभाजनकारी भाषा का उदाहरण। सच्चाई शायद दोनों के बीच है। असम को निवेश चाहिए, सुरक्षा चाहिए और खुली बहस भी चाहिए। चुनाव केवल सत्ता बदलने का अवसर नहीं, दिशा तय करने का मौका होते हैं।







