
एआई का वादा और भारत की ज़मीनी हक़ीक़त
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने तकनीक के बड़े दावे पेश किए। सवाल यह है कि क्या एआई आम ज़िंदगी तक पहुंचेगा या सिर्फ़ मंचों तक सिमट जाएगा। समिट में स्टार्टअप, सरकार और वैश्विक साझेदार एक साथ दिखे। एआई से उम्मीदें बड़ी हैं, लेकिन बराबरी, निजता और रोज़गार की चिंता भी उतनी ही गहरी है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
भारत का एआई क्षण: समिट से समाज तक का असली इम्तिहान
एआई का जश्न और ज़मीन की सच्चाई
नई दिल्ली में सजे विशाल हॉल, चमकती स्क्रीनें और बड़े वादे। इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 ने यही तस्वीर दिखाई। मंच पर कहा गया कि एआई हर छठे इंसान की समस्या सुलझा रहा है। यह सुनने में उम्मीद जगाता है, मगर सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या यह दावा उस किसान तक पहुंचता है जो मौसम की मार झेल रहा है, या उस छात्र तक जो बेहतर शिक्षा का रास्ता ढूंढ रहा है? तकनीक का जश्न तब अर्थ रखता है जब उसका असर रोज़मर्रा की ज़िंदगी में महसूस हो।
नेतृत्व, प्रतीक और संदेश
समिट का उद्घाटन और स्टार्टअप्स से संवाद एक साफ़ संदेश देता है कि सरकार एआई को रणनीतिक प्राथमिकता मान रही है। जब Narendra Modi स्टॉल दर स्टॉल रुकते हैं, सवाल पूछते हैं, तो यह केवल औपचारिकता नहीं रहती। यह संकेत है कि नीति और नवाचार को एक मेज़ पर बैठाने की कोशिश हो रही है। लेकिन प्रतीकों से आगे बढ़कर संस्थागत फैसले ज़रूरी हैं।
स्टार्टअप की उड़ान और सीमाएं
600 से अधिक स्टार्टअप्स की मौजूदगी उत्साह बढ़ाती है। नए मॉडल, स्थानीय समस्याओं के समाधान और ऑफ़लाइन एआई जैसे विचार भविष्य की झलक देते हैं। मसलन, इंटरनेट के बिना काम करने वाला एआई डेटा निजता की बहस को नई दिशा देता है। पर यहाँ एक सादा सवाल उठता है। क्या इन स्टार्टअप्स को लंबे समय तक पूंजी, बाज़ार और नीति समर्थन मिलेगा, या वे कुछ सालों में थककर गिर जाएंगे? भारत ने पहले भी स्टार्टअप बूम देखा है। सबक यही है कि निरंतरता बिना शोर के आती है।
कॉरपोरेट पवेलियन और ताक़त का संतुलन
बड़े कॉरपोरेट पवेलियन तकनीकी ताक़त दिखाते हैं। नेटवर्क सुरक्षा, स्वास्थ्य, शिक्षा और घर तक एआई की पहुँच की झलक मिलती है। रिलायंस जियो और मेटा जैसे नाम आकर्षण का केंद्र रहे। लेकिन ताक़त का संतुलन भी यहीं से जुड़ा है। जब डेटा, प्लेटफ़ॉर्म और पूंजी कुछ हाथों में सिमटती है, तो छोटे खिलाड़ियों और आम उपभोक्ताओं के अधिकारों की रक्षा कौन करेगा?
गरीब और मध्यम वर्ग तक एआई कैसे पहुंचे
समिट की एक अहम बात यह रही कि चर्चा केवल जोखिमों तक सीमित नहीं रही। फोकस इस पर था कि एआई का लाभ गरीब और मध्यम वर्ग तक कैसे पहुंचे। उदाहरण के तौर पर, अगर एआई फसल की बीमारी पहले बता दे, या अस्पताल में लाइन कम कर दे, तो इसका मतलब समझ आता है। लेकिन इसके लिए स्थानीय भाषा, कम लागत और भरोसेमंद सिस्टम चाहिए। वरना एआई सिर्फ़ शहरों की सुविधा बनकर रह जाएगा।
डेटा, निजता और भरोसा
एआई का ईंधन डेटा है। जितना ज़्यादा डेटा, उतनी बेहतर मशीन। पर हर क्लिक, हर आवाज़, हर चेहरा रिकॉर्ड होने लगे, तो डर स्वाभाविक है। ऑफ़लाइन एआई और स्वदेशी मॉडल इस चिंता का जवाब देने की कोशिश करते हैं। फिर भी एक सख़्त सवाल बाकी है। क्या हमारे क़ानून इतने मज़बूत हैं कि नागरिक का डेटा सच में सुरक्षित रहे? भरोसा घोषणाओं से नहीं, नियमों और उनके पालन से बनता है।
रोज़गार का सवाल: डर या अवसर
एआई के साथ रोज़गार का सवाल हर बातचीत में उभरता है। कुछ नौकरियाँ जाएंगी, यह सच है। मगर नई भूमिकाएं भी बनेंगी। समस्या यह है कि बदलाव की रफ़्तार तेज़ है और तैयारी धीमी। अगर एक अकाउंटेंट को अचानक एआई टूल्स के बीच खड़ा कर दिया जाए, तो वह घबरा जाएगा। समाधान प्रशिक्षण में है, स्कूल से लेकर दफ़्तर तक। समिट में स्किलिंग की बात हुई, पर इसे ज़मीन पर उतारना असली परीक्षा है।
शिक्षा और शोध का जोड़
अकादमिक और शोध संस्थानों की मौजूदगी उम्मीद जगाती है। जब विश्वविद्यालय, उद्योग और सरकार साथ आते हैं, तो नवाचार टिकाऊ बनता है। भारतजेन जैसे प्रयास स्थानीय संदर्भ में एआई गढ़ने की दिशा दिखाते हैं। पर शोध तभी फलता है जब उसे आज़ादी, फंड और आलोचनात्मक माहौल मिले। सिर्फ़ लक्ष्य तय कर देना काफ़ी नहीं, सवाल पूछने की गुंजाइश भी चाहिए।
वैश्विक साझेदारी और आत्मनिर्भरता
13 देशों के मंडप और दर्जनों देशों की भागीदारी भारत की वैश्विक भूमिका दिखाती है। सहयोग ज़रूरी है, क्योंकि एआई सीमाओं में बंधा नहीं। पर आत्मनिर्भरता का मतलब दुनिया से कटना नहीं, बल्कि अपनी शर्तों पर जुड़ना है। अगर हम सिर्फ़ तकनीक आयात करेंगे और डेटा निर्यात, तो संतुलन बिगड़ेगा। भारत को सह-निर्माता बनना होगा, सिर्फ़ उपभोक्ता नहीं।
नीति की कसौटी
नीति की बात मंच पर आसान लगती है। असल चुनौती लागू करने में है। स्टार्टअप्स को नियमों की स्पष्टता चाहिए, नागरिकों को सुरक्षा की गारंटी। बहुत ज़्यादा नियंत्रण नवाचार मार देता है, बहुत कम नियंत्रण भरोसा तोड़ देता है। सही संतुलन वही है जो समय के साथ बदले, सीखता रहे।
एक साधारण उदाहरण
मान लीजिए, एक छोटे शहर का सरकारी अस्पताल। अगर एआई मरीजों की प्राथमिकता तय कर दे, डॉक्टरों का बोझ घटा दे, तो यह वरदान है। लेकिन अगर सिस्टम ग़लत डेटा से ट्रेन हुआ हो और किसी को पीछे कर दे, तो नुकसान भी उतना ही बड़ा है। इसलिए जवाबदेही तय होनी चाहिए। गलती मशीन की हो या इंसान की, जवाब साफ़ होना चाहिए।
उम्मीद के साथ सावधानी
इंडिया एआई इम्पैक्ट समिट 2026 उम्मीद का मंच है। यहाँ ऊर्जा है, कल्पना है और क्षमता भी। पर असली इम्पैक्ट तब होगा जब यह ऊर्जा नीतियों, प्रशिक्षण और भरोसे में बदले। एआई कोई जादू नहीं, एक औज़ार है। यह समाज को वैसा ही बनाएगा जैसा हम उसे दिशा देंगे। सवाल यही है कि दिशा कौन तय करेगा और किसके लिए।





