
जिनेवा वार्ता के दरमियान बढ़ी सैन्य सरगर्मी
मिडिल ईस्ट में ताकत का प्रदर्शन, सुलह दूर?
मिडिल ईस्ट में हालिया सैन्य तैनाती और जिनेवा में चल रही परमाणु वार्ता ने अमेरिका और ईरान के रिश्तों को फिर सुर्खियों में ला दिया है। एक ओर कूटनीतिक बातचीत में प्रगति के दावे हैं, दूसरी ओर फाइटर जेट और युद्धपोतों की बढ़ती मौजूदगी। सवाल यह है कि क्या यह दबाव की रणनीति है या संभावित टकराव की प्रस्तावना।
📍Delhi ✍️ Asif Khan
बढ़ती तैनाती, घटती भरोसे की जगह
मिडिल ईस्ट की फिज़ा एक बार फिर भारी हो गई है। पिछले चंद घंटों में पचास से ज़्यादा फाइटर जेट की तैनाती और साथ में एयर रिफ्यूलिंग टैंकरों की मूवमेंट कोई मामूली कदम नहीं है। यह सिर्फ सैन्य कवायद नहीं लगती, बल्कि एक साफ संदेश है। सवाल यह है कि जब जिनेवा में बातचीत का दूसरा दौर चल रहा है, तो मैदान में यह ताकत दिखाना किस इरादे की तरफ इशारा करता है।
अमेरिकी अफसरान कह रहे हैं कि वार्ता में कुछ प्रोग्रेस हुई है। मगर अगर प्रोग्रेस है तो फिर इतनी जल्दबाज़ी में एयर और नेवल पावर क्यों बढ़ाई गई। क्या यह प्रेशर टैक्टिक है। या फिर बातचीत पर भरोसा कम है।
ईरान की तरफ से भी बयान कम सख्त नहीं हैं। वहां के रहनुमा ने खुलकर कहा है कि अगर हमला हुआ तो जवाब मिलेगा। उन्होंने यह तक इशारा किया कि बड़े से बड़ा युद्धपोत भी डूब सकता है। यह सिर्फ जुमला नहीं है। यह एक सियासी और फौजी पोजिशनिंग है।
वार्ता और वार की दोहरी राह
जिनेवा में जो बातचीत हो रही है, वह सीधे आमने सामने नहीं बल्कि अप्रत्यक्ष है। इसका मतलब है कि भरोसा अभी भी सीमित है। बातचीत के बाद दोनों पक्षों ने माहौल को बेहतर बताया। मगर साथ ही यह भी माना कि कई अहम मुद्दे बाकी हैं।
यहां एक अहम सवाल उठता है। अगर दोनों तरफ से यह माना जा रहा है कि रास्ता खुला है, तो क्या सैन्य तैनाती उस रास्ते को और मुश्किल नहीं बना देगी। कूटनीति की मेज पर बैठकर अगर बाहर मिसाइल सिस्टम की चर्चा हो, तो भरोसा कैसे बढ़ेगा।
हम अक्सर यह मान लेते हैं कि ताकत दिखाने से समझौता जल्दी हो जाता है। मगर इतिहास बताता है कि कई बार इससे उल्टा असर भी होता है। जब दोनों तरफ से बयानबाजी तेज हो जाए, तो छोटी सी गलती भी बड़ा संकट बन सकती है।
शक्ति प्रदर्शन या रणनीतिक संतुलन
अमेरिका का तर्क है कि यह तैनाती क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखने के लिए है। वह कहता है कि उसकी मौजूदगी किसी खास देश के खिलाफ नहीं बल्कि व्यापक सुरक्षा ढांचे का हिस्सा है। मगर ईरान इसे सीधे चुनौती की तरह देख रहा है।
यहां एक आम उदाहरण समझिए। अगर दो पड़ोसी किसी जमीन को लेकर बातचीत कर रहे हों और उसी दौरान एक पड़ोसी अपने घर की छत पर हथियारबंद गार्ड खड़ा कर दे, तो दूसरा पड़ोसी इसे कैसे देखेगा। शायद डर के रूप में, शायद उकसावे के रूप में।
ईरान के पास एंटी शिप मिसाइल सिस्टम होने की चर्चा पहले भी रही है। विशेषज्ञ मानते हैं कि उसने अपने समुद्री रक्षा तंत्र को मजबूत किया है। ऐसे में अमेरिकी युद्धपोतों की बढ़ती मौजूदगी को वह सीधी चुनौती मान सकता है।
सियासत का अंदरूनी दबाव
दोनों देशों के अंदरूनी हालात भी इस टेंशन को प्रभावित करते हैं। अमेरिका में नेतृत्व पर यह दबाव रहता है कि वह कमजोर न दिखे। खासकर जब परमाणु मुद्दे की बात हो। दूसरी ओर ईरान में भी घरेलू सियासत और राष्ट्रीय गर्व का सवाल जुड़ा हुआ है।
जब किसी मुल्क का नेतृत्व अपने अवाम के सामने बयान देता है, तो वह सिर्फ दूसरे देश को नहीं बल्कि अपने नागरिकों को भी संबोधित कर रहा होता है। इसलिए बयानबाजी अक्सर सख्त हो जाती है।
मगर यहां यह भी सोचना होगा कि क्या इस सख्ती से आम लोगों का भला होगा। मिडिल ईस्ट पहले ही लंबे संघर्षों से गुजरा है। नई जंग का असर सिर्फ दो देशों तक सीमित नहीं रहेगा। तेल बाजार, वैश्विक अर्थव्यवस्था और क्षेत्रीय स्थिरता सब प्रभावित होंगे।
रेड लाइन्स और हकीकत
अमेरिका की तरफ से यह कहा गया है कि कुछ रेड लाइन्स तय हैं। ईरान उन्हें मानने को तैयार नहीं। यह स्थिति नई नहीं है। असल सवाल यह है कि क्या इन रेड लाइन्स पर कोई लचीलापन संभव है।
डिप्लोमेसी का मतलब अक्सर यही होता है कि दोनों पक्ष थोड़ा पीछे हटें ताकि बीच का रास्ता निकल सके। अगर दोनों ही अपनी जगह पर अड़े रहें, तो बातचीत औपचारिकता बनकर रह जाती है।
ईरान ने संकेत दिया है कि वह नए प्रस्ताव लेकर लौट सकता है। यह एक पॉजिटिव संकेत है। मगर प्रस्ताव क्या होंगे, यह अभी साफ नहीं। अगर वे बुनियादी मतभेदों को नहीं छूते, तो शायद हालात ज्यादा नहीं बदलेंगे।
गलतफहमी का खतरा
इतिहास में कई बड़े संघर्ष गलतफहमी से शुरू हुए हैं। जब फाइटर जेट आसमान में हों और युद्धपोत समुद्र में, तो एक तकनीकी गलती भी बड़ा संकट बन सकती है। एक रडार सिग्नल की गलत व्याख्या, एक गलत कम्युनिकेशन, और हालात नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं।
यही वजह है कि बैक चैनल कम्युनिकेशन और भरोसे की लाइनें बेहद जरूरी होती हैं। सवाल यह है कि क्या इस वक्त दोनों देशों के बीच ऐसा भरोसेमंद तंत्र मौजूद है।
क्या जंग वाकई विकल्प है
हमें यह भी खुद से पूछना चाहिए कि क्या जंग वाकई किसी के लिए फायदेमंद होगी। अमेरिका के लिए एक और लंबे सैन्य अभियान की कीमत कम नहीं होगी। ईरान के लिए भी आर्थिक और सामाजिक असर गंभीर होंगे।
कभी कभी सियासी बयान इतने सख्त हो जाते हैं कि पीछे हटना मुश्किल हो जाता है। मगर असली ताकत शायद यही है कि जब मौका हो, तब समझदारी से कदम पीछे खींचा जाए।
आगे की राह
इस वक्त हालात नाजुक हैं, मगर पूरी तरह बंद नहीं। बातचीत जारी है। संकेत मिले हैं कि अगला दौर जल्द हो सकता है। यही वह खिड़की है जहां से उम्मीद की रोशनी आ सकती है।
मगर यह तभी संभव है जब दोनों पक्ष यह मान लें कि दबाव और धमकी की सीमा होती है। आखिरकार स्थायी हल टेबल पर ही निकलेगा, समुद्र या आसमान में नहीं।
दुनिया की नजर इस टकराव पर है। हर बयान, हर तैनाती और हर बैठक का असर दूर तक जाएगा। इसलिए जरूरी है कि भावनाओं से ज्यादा विवेक को जगह मिले।
अंत में सवाल सीधा है। क्या ताकत का प्रदर्शन समझौते की राह आसान करेगा, या दीवारें और ऊंची करेगा। इसका जवाब आने वाले हफ्तों में छिपा है। फिलहाल उम्मीद और आशंका साथ साथ चल रही हैं।




