
MANAV मंत्र और एआई का भविष्य टेक्नोलॉजी की रफ्तार, इंसान की जिम्मेदारी
एआई प्लेज रिकॉर्ड: विजन, वादे और सवाल
नई दिल्ली में आयोजित एआई इम्पैक्ट समिट 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वैश्विक एआई कंपनियों के प्रमुखों को संबोधित करते हुए MANAV विजन मंत्र प्रस्तुत किया। 24 घंटे में 2,50,946 लोगों द्वारा एआई प्लेज लेने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ। यह समिट भारत की डिजिटल दिशा, नैतिक ढांचे और वैश्विक नेतृत्व की महत्वाकांक्षा को सामने रखती है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
एआई इम्पैक्ट समिट 2026: मानव विजन या डिजिटल चुनौती
बदलती दुनिया और नया मंत्र
नई दिल्ली में जब एआई इम्पैक्ट समिट 2026 का आग़ाज़ हुआ तो माहौल सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं, बल्कि सोच का भी था। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने जब MANAV विजन मंत्र पेश किया तो बात सिर्फ मशीन की नहीं रही, इंसान की भी हो गई। सवाल यह है कि क्या यह मंत्र वाकई उस रफ्तार को संभाल पाएगा, जो आज एआई की दुनिया में दिख रही है।
हम सब जानते हैं कि टेक्नोलॉजी का सफर नया नहीं है। कभी इंटरनेट आया, फिर स्मार्टफोन आए, फिर डेटा का सैलाब। अब एआई है, जो हमारे मोबाइल से लेकर दफ्तर तक हर जगह दस्तक दे रहा है। लेकिन फर्क यह है कि इस बार स्पीड अभूतपूर्व है। जो बदलाव पहले दस साल में दिखता था, अब वह महीनों में नजर आता है।
MANAV विजन: सोच का ढांचा या राजनीतिक संदेश
MANAV का मतलब बताया गया है मोरल एंड एथिकल गाइडलेंस, अकाउंटेबल गवर्नेंस, नेशनल सोवरनिटी, एक्सेसिबल एंड इंक्लूसिव और वैलिडिटी एंड लेजिटीमेट। सुनने में यह पूरा फ्रेमवर्क संतुलित लगता है। लेकिन असली परीक्षा अमल की होती है।
मोरल गाइडलेंस की बात आसान है, लेकिन एआई के एल्गोरिदम में नैतिकता कैसे डाली जाएगी। अगर कोई चैटबॉट गलत सूचना दे दे तो जिम्मेदारी किसकी होगी। कंपनी की, सरकार की या यूजर की। अकाउंटेबल गवर्नेंस का दावा तभी मजबूत होगा जब पारदर्शिता भी उतनी ही मजबूत हो।
नेशनल सोवरनिटी की बात भी अहम है। डेटा आज का नया तेल कहा जाता है। अगर डेटा देश के भीतर सुरक्षित है तो डिजिटल आजादी की बात मजबूत होती है। लेकिन ग्लोबल कंपनियों के साथ साझेदारी में यह संतुलन कैसे बनेगा, यह सवाल अभी खुला है।
जीपीएस का उदाहरण और असली रास्ता
प्रधानमंत्री ने जीपीएस का उदाहरण दिया। जीपीएस रास्ता सुझाता है, लेकिन चलना हमें है। यह तुलना समझने में आसान है। पर हकीकत में एआई कई बार सिर्फ सुझाव नहीं देता, बल्कि निर्णयों को प्रभावित करता है। बैंक लोन से लेकर नौकरी की स्क्रीनिंग तक, एआई के मॉडल हमारे जीवन को छू रहे हैं।
अगर मॉडल में बायस हो, तो उसका असर समाज पर पड़ता है। एक छोटा सा उदाहरण लें। अगर किसी क्षेत्र का डेटा अधूरा है तो वहां के लोगों को गलत स्कोर मिल सकता है। यह सिर्फ टेक्निकल मसला नहीं, सामाजिक असर भी है। इसलिए जीपीएस वाली मिसाल अच्छी है, लेकिन सड़क की हालत भी देखनी होगी।
रिकॉर्ड और रियलिटी
समिट के दौरान 24 घंटे में 2,50,946 लोगों द्वारा एआई प्लेज लेने का रिकॉर्ड दर्ज हुआ। यह संख्या प्रभावशाली है। किसी भी डिजिटल पहल में इतनी भागीदारी अपने आप में बड़ी बात है। लोगों को ऑनलाइन बैज देना, क्विज कराना, पोर्टल बनाना, यह सब दिखाता है कि सरकार जागरूकता को अभियान की तरह चला रही है।
लेकिन यहां भी एक जरूरी सवाल है। क्या प्लेज लेने से व्यवहार बदलता है। हम अक्सर देखते हैं कि लोग पर्यावरण, स्वच्छता या ट्रैफिक नियमों पर शपथ लेते हैं, पर रोजमर्रा की जिंदगी में वही पुरानी आदतें लौट आती हैं। एआई के मामले में भी असली बदलाव तब होगा जब स्कूल, कॉलेज और दफ्तरों में डिजिटल साक्षरता गहरी होगी।
निवेश, अवसर और प्रतिस्पर्धा
समिट में वैश्विक कंपनियों के प्रमुखों की मौजूदगी ने यह संदेश दिया कि भारत एआई की दौड़ में पीछे नहीं रहना चाहता। डेटा सेंटर्स और इंफ्रास्ट्रक्चर में निवेश के ऐलान उम्मीद जगाते हैं। इससे रोजगार, रिसर्च और स्टार्टअप इकोसिस्टम को बल मिल सकता है।
लेकिन हमें यह भी देखना होगा कि क्या हम सिर्फ बाजार बनेंगे या इनोवेशन के केंद्र भी बन पाएंगे। अगर कोड बाहर से आए और यहां सिर्फ उपयोग हो, तो दीर्घकालिक लाभ सीमित रह सकता है। जरूरत है कि विश्वविद्यालय, रिसर्च लैब और इंडस्ट्री मिलकर अपना मजबूत मॉडल तैयार करें।
रोबोट विवाद और पारदर्शिता का सवाल
समिट के दौरान एक विश्वविद्यालय द्वारा प्रदर्शित रोबोट को लेकर विवाद भी सामने आया। सोशल मीडिया पर दावे और सफाई का दौर चला। अंततः आयोजन स्थल से जगह खाली कराने की खबर आई। यह घटना छोटी लग सकती है, पर संदेश बड़ा है।
जब हम एआई और रोबोटिक्स की बात करते हैं, तो भरोसा सबसे बड़ी पूंजी होती है। अगर दावे बढ़ा चढ़ाकर किए जाएं तो विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। टेक्नोलॉजी के क्षेत्र में प्रतिष्ठा धीरे बनती है और जल्दी टूटती है।
मानव सामर्थ्य बनाम मशीन इंटेलिजेंस
प्रधानमंत्री ने कहा कि एआई मशीनों की बुद्धिमत्ता बढ़ा रहा है, लेकिन उससे भी ज्यादा मानव सामर्थ्य को विस्तार दे रहा है। यह बात दिलचस्प है। सच भी है कि डॉक्टर, इंजीनियर, पत्रकार, शिक्षक सभी एआई टूल्स से लाभ उठा सकते हैं।
लेकिन एक दूसरी तस्वीर भी है। ऑटोमेशन से कुछ नौकरियां बदलेंगी, कुछ खत्म होंगी, कुछ नई बनेंगी। सवाल यह है कि क्या हम अपने युवाओं को उस बदलाव के लिए तैयार कर रहे हैं। अगर नहीं, तो डिजिटल डिवाइड और गहरा सकता है।
नैतिकता की परीक्षा आने वाली पीढ़ी के लिए
एआई का असली असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा। आज जो बच्चे स्कूल में हैं, वे ऐसे समय में काम करेंगे जहां मशीन और इंसान की साझेदारी सामान्य होगी। इसलिए नीति बनाते समय सिर्फ वर्तमान नहीं, भविष्य की जरूरतों को भी देखना होगा।
अगर डेटा सुरक्षा कमजोर रही, अगर फेक कंटेंट पर नियंत्रण नहीं हुआ, अगर एल्गोरिदम पारदर्शी नहीं बने, तो भरोसा डगमगा सकता है। और बिना भरोसे कोई भी डिजिटल इकोसिस्टम लंबे समय तक नहीं टिकता।
उत्सव से आगे की राह
एआई इम्पैक्ट समिट 2026 एक उपलब्धि भी है और एक चेतावनी भी। उपलब्धि इसलिए कि भारत ने वैश्विक मंच पर अपनी आवाज बुलंद की है। चेतावनी इसलिए कि अब शब्दों को नीति और नीति को व्यवहार में बदलना होगा।
MANAV विजन एक दिशा दिखाता है। पर दिशा दिखाना और मंजिल तक पहुंचना दो अलग बातें हैं। अगर नैतिकता, जवाबदेही और समावेशन को सच में प्राथमिकता दी गई, तो यह पहल इतिहास में दर्ज हो सकती है। वरना यह भी एक और भव्य आयोजन बनकर रह जाएगी, जिसकी चर्चा कुछ दिनों बाद कम हो जाएगी।
आज जरूरत तालियों से ज्यादा तर्क की है, नारों से ज्यादा नीति की है, और रिकॉर्ड से ज्यादा जिम्मेदारी की है। एआई का भविष्य सिर्फ मशीनों का नहीं, हमारे समाज का भी भविष्य है। इसलिए सवाल पूछना, बहस करना और सच को परखना हमारी सामूहिक जिम्मेदारी है।





