
Rahul Gandhi vs Shashi Tharoor: Political rift at AI summit
एआई समिट पर कांग्रेस की दो आवाज़ें
शशि थरूर की तारीफ, राहुल गांधी का एतराज़
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
बहस का असली मरकज़
सियासत में इख़्तिलाफ नई बात नहीं। मगर जब एक ही पार्टी के दो कद्दावर चेहरे किसी अहम मसले पर मुख़्तलिफ़ राय रखें, तो मामला दिलचस्प भी हो जाता है और पेचीदा भी। भारत एआई इम्पैक्ट समिट 2026 को लेकर यही मंज़र सामने है। एक तरफ राहुल गांधी ने इसे पीआर स्टंट करार दिया, दूसरी तरफ शशि थरूर ने इसे ग्लोबल सक्सेस बताया।
सवाल यह नहीं कि कौन सही है। सवाल यह है कि क्या हम मुद्दे को समझने की कोशिश कर रहे हैं या सिर्फ़ सियासी पोज़िशनिंग देख रहे हैं।
टेक्नोलॉजी और तसव्वुर की सियासत
आज एआई सिर्फ़ एक टेक्नोलॉजी टूल नहीं रहा। यह इकोनॉमी, गवर्नेंस, सिक्योरिटी और एजुकेशन तक असर डाल रहा है। जब 119 मुल्कों के नुमाइंदे किसी मुल्क में जमा हों, तो वह सिर्फ़ इवेंट नहीं रहता, वह एक सियासी पैग़ाम बन जाता है।
थरूर का कहना है कि बड़े प्रोग्राम्स में माइनर लैप्स हो सकते हैं। यह बात वाजिब लगती है। कोई भी इंटरनेशनल समिट परफेक्ट नहीं होती। अगर किसी स्टॉल पर विदेशी रोबोट दिख गया, तो यह मैनेजमेंट की गलती हो सकती है, लेकिन क्या इससे पूरा आयोजन बेअसर हो जाता है?
दूसरी ओर राहुल गांधी का एतराज़ भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। अगर ‘मेक इन इंडिया’ के बैनर तले बाहर का प्रोडक्ट रखा गया, तो यह सिंबॉलिक चूक है। सियासत में सिंबल की अहमियत बहुत होती है। एक छोटी सी तस्वीर भी बड़ी बहस खड़ी कर देती है।
लीडरशिप का इम्तिहान
यह बहस असल में कांग्रेस की लीडरशिप को लेकर भी है। थरूर का बयान यह दिखाता है कि पार्टी के अंदर फिक्र का दायरा अलग अलग है। कोई ग्लोबल इमेज को तरजीह देता है, तो कोई घरेलू मैसेजिंग को।
राहुल गांधी का नैरेटिव यह रहा है कि सरकार इवेंट्स को ब्रांडिंग एक्सरसाइज़ बना देती है। उनका कहना है कि असली मसला ग्राउंड रियलिटी है। बेरोज़गारी, महंगाई, और सोशल सेक्टर पर खर्च जैसे मुद्दे ज्यादा अहम हैं।
मगर यहां एक काउंटर प्वाइंट भी है। अगर टेक्नोलॉजी में लीडरशिप नहीं लेंगे, तो भविष्य की इकोनॉमी कैसे मजबूत होगी? एआई सेक्टर में ग्लोबल पोज़िशनिंग सिर्फ़ फोटो ऑप नहीं होती, यह इन्वेस्टमेंट, पार्टनरशिप और पॉलिसी इन्फ्लुएंस का रास्ता खोलती है।
क्या यह सिर्फ़ बयानबाज़ी है
आम मतदाता के लिए यह बहस कभी कभी उलझन पैदा करती है। वह सोचता है कि अगर आयोजन इतना बुरा था, तो अंतरराष्ट्रीय भागीदारी इतनी बड़ी कैसे रही? और अगर इतना शानदार था, तो विपक्ष इतना नाराज़ क्यों?
दरअसल सियासत में हर बयान एक मैसेज होता है। राहुल गांधी का बयान उनके सपोर्ट बेस को यह दिखाता है कि वह सरकार की हर गतिविधि पर सवाल उठाते हैं। थरूर का बयान उनके इंटरनेशनल आउटलुक और इंटेलेक्चुअल इमेज को मज़बूत करता है।
दोनों अपने अपने तरीके से पॉलिटिकल स्पेस बना रहे हैं।
ग्लोबल साउथ और नैरेटिव की जंग
समिट में ग्लोबल साउथ के लिए इक्विटेबल एक्सेस की बात हुई। यह अहम मुद्दा है। एआई का कंट्रोल अगर कुछ ही मुल्कों तक सीमित रहा, तो डिजिटल डिवाइड और बढ़ेगा।
सरकार का दावा है कि भारत ने कंसेंसस बिल्डिंग में अहम रोल निभाया। अगर यह सही है, तो यह डिप्लोमैटिक उपलब्धि मानी जाएगी। मगर विपक्ष पूछ रहा है कि क्या यह विजन डॉक्यूमेंट जमीन पर असर डालेगा या सिर्फ़ काग़ज़ी रहेगा।
यह सवाल जायज़ है। हम सबने कई बार बड़े ऐलान सुने हैं जो बाद में ठंडे पड़ गए। इसलिए एहतियात जरूरी है।
सियासी तंज और असली मुद्दा
महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री की यह टिप्पणी कि एआई की जरूरत राहुल गांधी को है, सियासी तंज़ के दायरे में आती है। मगर इससे बहस का स्तर ऊपर नहीं उठता। टेक्नोलॉजी पर गंभीर चर्चा की जगह जब पर्सनल कमेंट्स आते हैं, तो असल मुद्दा पीछे छूट जाता है।
अगर एआई कृषि, हेल्थकेयर और एजुकेशन में क्रांतिकारी बदलाव ला सकता है, तो चर्चा इस पर होनी चाहिए कि पॉलिसी फ्रेमवर्क क्या है, डेटा ओनरशिप कैसे तय होगी, और लीगल सेफगार्ड्स कैसे लागू होंगे।
कांग्रेस के लिए सबक
कांग्रेस के सामने दो रास्ते हैं। या तो वह हर सरकारी पहल का विरोध करे, या फिर मुद्दों को केस बाय केस आधार पर परखे। थरूर का रुख यह संकेत देता है कि पार्टी के भीतर एक सेक्शन ऐसा भी है जो हर उपलब्धि को सिरे से खारिज करने के पक्ष में नहीं।
राहुल गांधी का एतराज़ यह याद दिलाता है कि ब्रांडिंग और वास्तविकता में फर्क होता है। अगर आयोजन में कमियां हैं, तो उन्हें उजागर करना विपक्ष का फर्ज़ है। मगर साथ ही अगर कोई सकारात्मक पहल है, तो उसे मान लेना भी परिपक्वता की निशानी है।
आगे की राह
एआई का दौर अभी शुरू हुआ है। आने वाले सालों में यह रोजगार, इंडस्ट्री और गवर्नेंस के ढांचे को बदल देगा। ऐसे में सियासी जमातों को सिर्फ़ तंज़ और तारीफ से आगे बढ़कर ठोस पॉलिसी डिबेट करनी होगी।
मतदाता अब सिर्फ़ नारे नहीं, नतीजे देखना चाहता है। उसे फर्क नहीं पड़ता कि बयान किसने दिया। उसे यह देखना है कि टेक्नोलॉजी से उसकी ज़िंदगी में क्या सुधार आएगा।
अगर एआई से किसान की फसल की निगरानी बेहतर होती है, अगर छोटे बिज़नेस को डेटा एनालिटिक्स से फायदा मिलता है, तो यह वास्तविक कामयाबी होगी। और अगर सब कुछ सिर्फ़ स्टेज, लाइट और कैमरे तक सीमित रह गया, तो विपक्ष की आलोचना सही साबित होगी।
आख़िर में यह बहस हमें एक बड़ी बात सिखाती है। लोकतंत्र में असहमति कमजोरी नहीं, ताकत होती है। मगर शर्त यह है कि असहमति तथ्यों और तर्क पर आधारित हो।
राहुल गांधी और शशि थरूर के बीच यह मतभेद सिर्फ़ एक इवेंट का नहीं, बल्कि राजनीति की दिशा का संकेत है। क्या विपक्ष रचनात्मक आलोचना का रास्ता चुनेगा, या सिर्फ़ प्रतिरोध की राजनीति करेगा? आने वाला वक्त इसका जवाब देगा।






