
India and US flags facing each other with tariff documents, Shah Times analysis
भारत अमेरिका व्यापार में फिर अनिश्चितता,टैरिफ़ की सियासत और दिल्ली की दुविधा
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा वैश्विक टैरिफ़ को 10 प्रतिशत से बढ़ाकर 15 प्रतिशत करने की घोषणा ने एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय व्यापार में अस्थिरता पैदा कर दी है। अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसले के बाद जब टैरिफ़ व्यवस्था पर सवाल उठे थे, तब उम्मीद थी कि व्यापारिक माहौल कुछ स्थिर होगा। लेकिन नए एलान ने संकेत दिया कि नीति अब भी राजनीतिक इच्छाशक्ति और कानूनी व्याख्या के बीच झूल रही है। भारत के लिए यह केवल प्रतिशत का खेल नहीं है, बल्कि रणनीतिक धैर्य, आर्थिक संतुलन और कूटनीतिक परिपक्वता का इम्तिहान है।
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
बदलते फ़ैसले, बदलता माहौल
अमेरिकी सियासत में टैरिफ़ अब सिर्फ़ आर्थिक औज़ार नहीं रहा, बल्कि सियासी बयानबाज़ी का हिस्सा बन चुका है। जब अमेरिका पहले 10 प्रतिशत की बात करें और अगले ही दिन 15 प्रतिशत कर दें, तो यह महज़ आंकड़ों का फ़र्क नहीं होता, यह भरोसे की बुनियाद को हिलाता है। कारोबार करने वाले लोग एक्सेल शीट से ज़्यादा स्थिरता चाहते हैं।
भारत के निर्यातकों के लिए यह स्थिति कुछ वैसी है जैसे आप माल भेज चुके हों और अचानक नियम बदल जाएँ। छोटे उद्योग, टेक्सटाइल, ऑटो पार्ट्स या फार्मा सेक्टर के व्यापारी पहले ही वैश्विक मांग की सुस्ती से जूझ रहे हैं। ऐसे में टैरिफ़ की अनिश्चितता उनकी लागत और मुनाफ़े दोनों पर असर डालती है।
लेकिन क्या यह सिर्फ़ ट्रंप के मिज़ाज का मामला है? या इसके पीछे गहरी रणनीति छिपी है?
सुप्रीम कोर्ट की दख़लअंदाज़ी
अमेरिकी सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा कि 1977 का कानून राष्ट्रपति को व्यापक टैरिफ़ लगाने की इजाज़त नहीं देता। संविधान के मुताबिक टैक्स और ड्यूटी लगाने का अधिकार कांग्रेस के पास है। यह फैसला सिर्फ़ कानूनी नहीं, बल्कि संस्थागत संतुलन का प्रतीक भी है।
अगर कार्यपालिका को असीमित आर्थिक अधिकार मिल जाएँ, तो लोकतांत्रिक ढाँचा कमज़ोर पड़ सकता है। अदालत का संदेश स्पष्ट था कि राष्ट्रीय आपातकाल की आड़ में व्यापार नीति को मनमाने ढंग से नहीं बदला जा सकता।
मगर अदालत के फैसले के बाद भी नया 15 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ़ लाने का संकेत यह बताता है कि राजनीतिक इच्छाशक्ति अभी पीछे हटने को तैयार नहीं। सवाल यह है कि क्या यह कदम कानून के दूसरे प्रावधानों के सहारे टिक पाएगा, या फिर एक और कानूनी चुनौती सामने आएगी?
भारत के लिए असली सवाल
भारत पर पहले 50 प्रतिशत तक टैरिफ़ का दबाव था, जिसे अंतरिम समझौते के बाद घटाकर 18 प्रतिशत किया गया। अब 15 प्रतिशत वैश्विक टैरिफ़ जुड़ने से प्रभावी दर लगभग 18.5 प्रतिशत के आसपास पहुंच सकती है। आंकड़ा छोटा लगता है, पर वैश्विक प्रतिस्पर्धा में आधा प्रतिशत भी बड़ा अंतर डाल देता है।
मान लीजिए एक भारतीय स्टील उत्पादक अमेरिकी बाज़ार में चीन या मेक्सिको से प्रतिस्पर्धा कर रहा है। अगर टैरिफ़ दरों में मामूली बदलाव भी हो, तो ऑर्डर इधर से उधर जा सकते हैं।
यहाँ एक और पहलू है। ट्रंप अक्सर कहते हैं कि भारत ज़्यादा चार्ज करता है। मगर भारत का तर्क है कि उसकी औसत टैरिफ़ संरचना विकासशील अर्थव्यवस्था की ज़रूरतों के अनुसार है। सच शायद बीच में कहीं है।
दोस्ती की तस्वीर और हक़ीक़त
अमेरिकी नेतृत्व अक्सर भारत के प्रधानमंत्री को दोस्त बताता है। सार्वजनिक मंचों पर तारीफ़ होती है, हाथ मिलाए जाते हैं, लेकिन व्यापार वार्ता में सख़्ती दिखाई जाती है। यह विरोधाभास नया नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में दोस्ती और हित अलग चीज़ें हैं।
भारत को यह समझना होगा कि भावनात्मक बयान और आर्थिक निर्णय अलग ट्रैक पर चलते हैं। अगर अमेरिका अपने उद्योगों को बचाने के लिए टैरिफ़ बढ़ाता है, तो वह अपने मतदाताओं को संदेश दे रहा है। उसी तरह भारत भी अपने किसानों और उद्योगों के हित देखेगा।
क्या टैरिफ़ सच में समाधान हैं
टैरिफ़ को अक्सर घरेलू उद्योग की सुरक्षा के तौर पर पेश किया जाता है। पर लंबे समय में यह उपभोक्ता पर बोझ बनता है। जब आयात महंगे होते हैं, तो घरेलू बाज़ार में कीमतें बढ़ती हैं।
अमेरिका में भी यही सवाल उठ रहा है कि क्या टैरिफ़ से वास्तव में व्यापार घाटा कम हुआ, या सिर्फ़ लागत बढ़ी। अगर अरबों डॉलर का रिफंड देना पड़ा, तो राजकोषीय संतुलन पर भी असर पड़ेगा।
भारत के लिए भी यह सोचने का वक़्त है कि क्या जवाबी टैरिफ़ सही रास्ता है या फिर आपसी समझौते की राह बेहतर है। हर बार शुल्क बढ़ाना आसान है, लेकिन उससे व्यापार का माहौल ठंडा पड़ सकता है।
सेक्शन 232 और 301 का खेल
अमेरिका के पास राष्ट्रीय सुरक्षा या अनुचित व्यापार प्रथाओं के नाम पर अलग कानूनी रास्ते मौजूद हैं। सेक्शन 232 के तहत स्टील और एल्युमिनियम पर शुल्क जारी रह सकते हैं। सेक्शन 301 देश विशेष पर केंद्रित कार्रवाई की अनुमति देता है।
यानी सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बावजूद पूरी कहानी खत्म नहीं हुई। यह शतरंज का खेल है, जहाँ एक चाल के बाद दूसरी चाल तय है।
भारत को भी अपनी रणनीति बहुस्तरीय रखनी होगी। सिर्फ़ बयानबाज़ी से काम नहीं चलेगा। निर्यात विविधीकरण, नए बाज़ारों की तलाश, और घरेलू सुधार ज़रूरी होंगे।
रूस, तेल और सियासत
टैरिफ़ चर्चा के बीच रूस से तेल ख़रीद का मुद्दा भी उछाला गया। अमेरिकी बयान अक्सर इसे नैतिक सवाल बनाते हैं। लेकिन ऊर्जा सुरक्षा हर देश के लिए प्राथमिकता है।
अगर भारत सस्ता तेल लेता है, तो वह अपने नागरिकों के हित देख रहा है। अंतरराष्ट्रीय दबाव और राष्ट्रीय हित के बीच संतुलन साधना आसान नहीं।
आगे का रास्ता
सवाल यह नहीं कि ट्रंप अगला फैसला क्या लेंगे। असली सवाल यह है कि भारत अपनी आर्थिक दिशा कितनी मज़बूत रखता है।
अगर घरेलू उत्पादन प्रतिस्पर्धी होगा, अगर लॉजिस्टिक्स सुधरेंगे, अगर नीतियाँ स्थिर रहेंगी, तो बाहरी झटकों का असर सीमित होगा।
कभी कभी हमें यह भी सोचना चाहिए कि हर वैश्विक तूफ़ान में घबराने की ज़रूरत नहीं। व्यापार नीति में उतार चढ़ाव आते रहेंगे। पर दीर्घकालिक दृष्टि ही देश को स्थिर रखती है।
आखिर में यह मसला सिर्फ़ प्रतिशत का नहीं, बल्कि भरोसे, संस्थागत संतुलन और वैश्विक व्यापार के भविष्य का है। भारत को भावनाओं से नहीं, तथ्यों और दूरदृष्टि से काम लेना होगा।




