
पश्चिम एशिया के तनाव में नई दिल्ली का दांव
रक्षा सौदों के बीच लोकतंत्र की बहस
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह दूसरा इसराइल दौरा ऐसे वक़्त हो रहा है जब पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ा हुआ है, वेस्ट बैंक की गतिविधियों पर बहस है और ईरान को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है। इस यात्रा में रक्षा सहयोग, नई तकनीक, मुक्त व्यापार समझौते और संसद को संबोधन जैसे कई अहम पड़ाव शामिल हैं। साथ ही इसराइल की आंतरिक सियासत, सुप्रीम कोर्ट से टकराव और विपक्ष की प्रतिक्रिया भी चर्चा में है। सवाल यह है कि क्या यह दौरा केवल रणनीतिक साझेदारी को आगे बढ़ाएगा या वैश्विक राजनीति में भारत की भूमिका को भी नया आकार देगा।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
केनेस्सेट से कूटनीति तक, क्या बदलेगा समीकरण
बदलते वक़्त में दूसरी दस्तक
नौ साल में दूसरी बार किसी भारतीय प्रधानमंत्री का इसराइल जाना महज़ एक प्रोटोकॉल विज़िट नहीं है। यह उस रिश्ते की दूसरी किश्त है जिसकी पहली बड़ी तस्वीर 2017 में बनी थी। तब बहुतों ने कहा था कि इतिहास बदला है। अब सवाल यह है कि क्या दिशा भी बदलेगी।
आज का माहौल अलग है। पश्चिम एशिया सुलग रहा है। वेस्ट बैंक में हालात पर अरब दुनिया नज़र रखे हुए है। ईरान को लेकर फिज़ा में बेचैनी है। ऐसे में नई दिल्ली का यह क़दम एक सोची समझी चाल भी है और एक इम्तिहान भी।
सियासत में टाइमिंग सब कुछ होती है। अगर हालात शांत होते तो यह दौरा सिर्फ़ सहयोग की बात होता। मगर अब यह दौरा एक पोज़िशनिंग भी है।
मीडिया की गर्मजोशी और संदेश
इसराइली मीडिया ने जिस तरह पहले पन्ने पर नमस्ते लिखकर तस्वीर छापी, वह महज़ अदब नहीं, एक इशारा है। संदेश साफ़ है कि दो पुराने सभ्यताओं वाले देश नया अध्याय खोलना चाहते हैं।
मगर हमें यह भी समझना होगा कि मीडिया अक्सर उम्मीदों को बढ़ा देता है। हेडलाइन में रणनीतिक टर्निंग पॉइंट लिख देना आसान है। असली सवाल यह है कि क्या जमीनी अमल भी उतना ही तेज़ होगा।
भारत में भी मीडिया का एक हिस्सा इस दौरे को निर्णायक पल बता रहा है। लेकिन पत्रकारिता का काम तालियां बजाना नहीं, सवाल पूछना है।
संसद का मंच और लोकतंत्र की बहस
प्रधानमंत्री का इसराइली संसद को संबोधित करना प्रतीकात्मक तौर पर बड़ा क्षण है। पर इसी मंच के आसपास विवाद भी है। सुप्रीम कोर्ट के अध्यक्ष को आमंत्रण न देने का फैसला वहां की घरेलू सियासत से जुड़ा है। विपक्ष ने बहिष्कार की घोषणा की है।
यहां हमें रुककर सोचना चाहिए। जब हम लोकतंत्र की साझेदारी की बात करते हैं, तो क्या हम दूसरे देश की आंतरिक बहसों से पूरी तरह अलग रह सकते हैं। या फिर चुप रहना ही कूटनीतिक समझदारी है।
भारत खुद एक बड़ा लोकतंत्र है। न्यायपालिका और कार्यपालिका के रिश्ते पर यहां भी बहस होती रही है। ऐसे में यह मुद्दा केवल इसराइल का नहीं, एक व्यापक प्रश्न है कि लोकतांत्रिक संस्थाएं कितनी स्वतंत्र हैं और सरकारें उन्हें कैसे देखती हैं।
सुरक्षा सहयोग का असली एजेंडा
साफ़ दिख रहा है कि इस यात्रा का केंद्र रक्षा और सुरक्षा है। एयर डिफेंस सिस्टम, लेजर आधारित तकनीक, ड्रोन रोधी व्यवस्था और बहुस्तरीय सुरक्षा ढांचा चर्चा में हैं।
पिछले वर्षों में सीमाओं पर तनाव और ड्रोन की बढ़ती चुनौती ने भारत को नए समाधान खोजने पर मजबूर किया है। अगर पड़ोस में कोई देश सस्ते ड्रोन से परेशानी पैदा कर सकता है तो जवाब भी तकनीकी होना चाहिए।
लेकिन यहां एक ज़रूरी सवाल है। क्या हर सुरक्षा चुनौती का हल आयात में है। या फिर टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और संयुक्त उत्पादन पर ज़ोर होना चाहिए। अगर हम केवल ख़रीदार बनकर रह गए तो आत्मनिर्भरता का सपना अधूरा रहेगा।
सरकार का दावा है कि सहयोग व्यापक और संवेदनशील तकनीक तक पहुंच दिलाएगा। यह अच्छा संकेत है। मगर समझौते की शर्तें और दीर्घकालिक रणनीति उतनी ही अहम हैं।
टेक्नोलॉजी, एआई और ऊर्जा
रक्षा से आगे बढ़ें तो नई तकनीक की बात भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। एआई, क्वांटम, ऊर्जा सुरक्षा, जल प्रबंधन, कृषि नवाचार। इन क्षेत्रों में इसराइल की विशेषज्ञता जानी जाती है।
भारत के लिए यह साझेदारी केवल हथियारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। अगर स्टार्टअप इकोसिस्टम, रिसर्च संस्थान और उद्योग मिलकर काम करें तो असली फायदा होगा।
एक साधारण उदाहरण लीजिए। अगर किसी सूखे इलाके में जल प्रबंधन की नई तकनीक से किसान की फसल बचती है तो यह किसी मिसाइल से कम रणनीतिक उपलब्धि नहीं। सुरक्षा केवल सीमा पर नहीं, खेत और कारखाने में भी होती है।
मुक्त व्यापार समझौता और अर्थव्यवस्था
मुक्त व्यापार समझौते पर बातचीत भी जारी है। यह हिस्सा अक्सर सुर्खियों में कम रहता है, मगर लंबी दूरी का असर यहीं से आता है।
अगर टैरिफ घटते हैं, निवेश बढ़ता है और सप्लाई चेन जुड़ती है तो दोनों अर्थव्यवस्थाएं लाभ में रहेंगी। मगर हमें सावधान भी रहना होगा। किसी भी समझौते में संतुलन जरूरी है। घरेलू उद्योग की सुरक्षा और वैश्विक प्रतिस्पर्धा के बीच महीन रेखा होती है।
वैश्विक राजनीति का बड़ा खेल
इस दौरे को केवल द्विपक्षीय चश्मे से देखना अधूरा होगा। अमेरिका, ईरान, खाड़ी देश, तुर्की, चीन। सबकी अपनी चालें हैं।
भारत आज बहुध्रुवीय दुनिया में संतुलन साधने की कोशिश कर रहा है। एक तरफ़ पश्चिमी साझेदारी, दूसरी तरफ़ पारंपरिक संबंध। सवाल यह है कि क्या यह संतुलन लंबे समय तक टिक पाएगा।
अगर ईरान और अमेरिका के बीच टकराव बढ़ता है तो भारत को ऊर्जा सुरक्षा और प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा दोनों पर सोचना होगा। इसराइल के साथ करीबी रिश्ते इस समीकरण को जटिल भी बना सकते हैं।
लेकिन यह भी सच है कि वैश्विक मंच पर सक्रिय भूमिका निभाने के लिए जोखिम लेना पड़ता है। तटस्थ खड़े रहना हमेशा विकल्प नहीं होता।
घरेलू राजनीति का असर
दोनों देशों में नेतृत्व मजबूत छवि के साथ खड़ा है। मगर घरेलू दबाव भी कम नहीं। इसराइल में न्यायपालिका को लेकर बहस है। भारत में विपक्ष सरकार की विदेश नीति पर सवाल उठाता रहा है।
कभी कभी विदेश नीति घरेलू राजनीति का विस्तार बन जाती है। बड़े स्वागत, गर्मजोशी और निजी रात्रिभोज की तस्वीरें संदेश देती हैं कि रिश्ते व्यक्तिगत भरोसे पर टिके हैं। मगर संस्थागत ढांचा उतना ही जरूरी है।
व्यक्तिगत रसायन शास्त्र बदल सकता है, सरकारें बदल सकती हैं। पर साझेदारी टिकनी चाहिए।
क्या यह टर्निंग पॉइंट है
मीडिया ने इसे रणनीतिक मोड़ कहा है। यह दावा आकर्षक है। मगर टर्निंग पॉइंट शब्द भारी होता है।
अगर इस दौरे के बाद रक्षा सहयोग में ठोस प्रगति, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर, संयुक्त उत्पादन, स्टार्टअप साझेदारी और संतुलित व्यापार समझौता दिखे तो इसे मोड़ कहा जा सकता है।
वरना यह भी कई दौरों की तरह एक अहम लेकिन सामान्य पड़ाव रह जाएगा।
भारत के लिए असली कसौटी
आख़िर में सवाल यह नहीं कि इसराइल क्या चाहता है। सवाल यह है कि भारत की दीर्घकालिक रणनीति क्या है।
क्या हम केवल सुरक्षा चुनौतियों के जवाब में साझेदारी कर रहे हैं। या हम एक व्यापक दृष्टि के साथ आगे बढ़ रहे हैं जिसमें नवाचार, लोकतांत्रिक मूल्यों और आर्थिक सशक्तिकरण की जगह हो।
एक समझदार दोस्त की तरह हमें खुद से भी सख्त सवाल पूछने चाहिए। उत्साह ज़रूरी है, मगर विवेक उससे भी ज़्यादा।
मोदी का यह दौरा अवसर है। मगर अवसर तभी इतिहास बनता है जब इरादा साफ़ हो और अमल ठोस। वरना सुर्खियां अगले हफ्ते किसी और खबर में बदल जाती हैं।






