
Prime Minister Narendra Modi addressing the Israeli Parliament during his visit, as covered by Shah Times.
इजराइल दौरा: सम्मान से आगे की राजनीति
भारत-इजराइल रिश्ते: भावना बनाम रणनीति
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को इजराइली संसद नेसेट में सर्वोच्च सम्मान दिया गया। उन्होंने हमास हमले की निंदा करते हुए आतंकवाद के खिलाफ सख्त रुख दोहराया और गाजा शांति पहल का समर्थन किया। इजराइली प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने उन्हें एशिया का शेर बताया। यह दौरा केवल भावनात्मक क्षण नहीं, बल्कि रक्षा, व्यापार और क्षेत्रीय संतुलन की बड़ी रणनीति का हिस्सा भी है। सवाल यह है कि क्या यह साझेदारी भारत की बहुस्तरीय विदेश नीति को मजबूत करेगी या उसे जटिल संतुलन में और कठिनाई में डालेगी।
📍Tel Aviv / New Delhi ✍️ Asif Khan
नेसेट में मोदी: आतंकवाद, व्यापार और संतुलन
सम्मान से आगे की कहानी
नेसेट में मिला सम्मान किसी भी लोकतांत्रिक नेता के लिए बड़ी बात है। जब नरेंद्र मोदी ने कहा कि वह एक प्राचीन सभ्यता की ओर से दूसरी प्राचीन सभ्यता को संबोधित कर रहे हैं, तो यह केवल शब्द नहीं थे। यह narrative building था। Diplomacy में symbolism का महत्व कम नहीं होता। पर सवाल यह है कि क्या symbolism ground reality को बदल देता है, या वह केवल perception को polish करता है?
इजराइल और भारत के रिश्ते आज जिस मुकाम पर हैं, वहां तक पहुंचने में दशकों लगे हैं। कभी भारत ने फिलिस्तीन के पक्ष में स्पष्ट रुख रखा था। आज वही भारत इजराइल के साथ strategic partnership को openly celebrate कर रहा है। यह बदलाव सिर्फ सरकार का नहीं, global geopolitics का भी नतीजा है।
आतंकवाद पर साझा दर्द
मोदी ने हमास के हमले की निंदा की और कहा कि भारत आतंकवाद का दर्द समझता है। यह बयान घरेलू audience और अंतरराष्ट्रीय community दोनों के लिए था। भारत लंबे समय से cross border terrorism का सामना करता रहा है। ऐसे में आतंकवाद के खिलाफ zero tolerance policy दोहराना स्वाभाविक है।
लेकिन यहां एक नाजुक पहलू भी है। जब हम कहते हैं कि किसी भी हाल में नागरिकों की हत्या जायज नहीं, तो क्या यह सिद्धांत हर conflict पर समान रूप से लागू होगा? क्या भारत इजराइल और फिलिस्तीन दोनों से समान मानवीय संवेदना की अपेक्षा करेगा? Diplomacy में शब्द carefully chosen होते हैं, क्योंकि हर वाक्य future negotiation की जमीन तैयार करता है।
गाजा शांति पहल और संतुलन
प्रधानमंत्री ने गाजा शांति पहल का समर्थन भी किया। यह संकेत है कि भारत पूरी तरह एकतरफा स्थिति में नहीं जाना चाहता। वह security concerns को acknowledge करता है, लेकिन long term peace को भी जरूरी मानता है।
भारत के लिए challenge यह है कि वह इजराइल के साथ रक्षा सहयोग बढ़ाए और साथ ही अरब देशों के साथ अपने energy, trade और diaspora संबंध भी मजबूत रखे। Middle East में लाखों भारतीय काम करते हैं। Remittance भारत की economy के लिए अहम है। इसलिए foreign policy सिर्फ ideology नहीं, economics भी है।
रक्षा सहयोग: अवसर या निर्भरता
ड्रोन, मिसाइल सिस्टम और advanced defense technology पर बातचीत की चर्चा है। इजराइल defense innovation में अग्रणी माना जाता है। भारत अपनी military modernization को तेजी देना चाहता है।
लेकिन एक critical सवाल यह है कि क्या हम technology transfer पर जोर देंगे या केवल खरीद पर? अगर साझेदारी joint manufacturing और research तक जाती है, तो यह win win हो सकता है। अगर यह केवल import oriented मॉडल बनता है, तो strategic autonomy पर असर पड़ सकता है।
भारत लंबे समय से आत्मनिर्भरता की बात करता है। ऐसे में defense deals का structure महत्वपूर्ण होगा। Public को headline दिखती है, लेकिन असली कहानी clauses में छिपी होती है।
व्यक्तिगत chemistry बनाम संस्थागत संबंध
नेतन्याहू ने मोदी को भाई कहा, एशिया का शेर कहा। ‘मोदी हग’ की चर्चा भी हुई। Political optics में यह सब असरदार है। Leaders की personal chemistry bilateral ties को तेज कर सकती है।
पर हमें याद रखना चाहिए कि लोकतंत्र व्यक्तियों से बड़े होते हैं। आज जो warmth दिख रही है, क्या वह future governments में भी बनी रहेगी? Sustainable diplomacy institutions पर टिकती है, emotions पर नहीं।
घरेलू राजनीति का कोण
भारत में यह दौरा राजनीतिक narrative का हिस्सा भी बनेगा। समर्थक इसे decisive leadership और global respect के रूप में पेश करेंगे। आलोचक पूछेंगे कि क्या यह timing सही थी, जब क्षेत्र में तनाव बढ़ा हुआ है।
विदेश नीति हमेशा domestic politics से अलग नहीं रहती। हर अंतरराष्ट्रीय भाषण का echo देश के भीतर सुनाई देता है। ऐसे में संतुलन और clarity दोनों जरूरी हैं।
ऐतिहासिक संदर्भ की परतें
भारत और यहूदी समुदाय के संबंधों का जिक्र भावनात्मक जुड़ाव पैदा करता है। यह सच है कि भारत में यहूदियों को ऐतिहासिक रूप से शरण और सम्मान मिला। यह भारत की plural ethos का हिस्सा है।
लेकिन इतिहास केवल गौरव गाथा नहीं, वह हमें सावधान भी करता है। कभी भारत ने इजराइल के गठन का विरोध किया था। आज वही भारत strategic ally है। इससे यह स्पष्ट होता है कि foreign policy स्थिर नहीं होती, वह बदलते समय के साथ evolve होती है।
अर्थव्यवस्था और FTA की दिशा
दोनों देशों के बीच free trade agreement पर बातचीत जारी है। Trade volume अभी सीमित है, लेकिन potential काफी है। Agriculture technology, water management, cyber security, artificial intelligence जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ सकता है।
पर trade deals में हमेशा winners और losers दोनों होते हैं। क्या भारतीय MSME sector तैयार है? क्या regulatory standards harmonize करना आसान होगा? Economic integration सिर्फ enthusiasm से नहीं, detailed groundwork से सफल होती है।
क्षेत्रीय समीकरण और बड़ा परिप्रेक्ष्य
भारत आज multi alignment की नीति पर चलता दिखता है। वह अमेरिका से strategic partnership रखता है, रूस से defense संबंध बनाए रखता है, अरब देशों से energy ties मजबूत करता है और इजराइल से technology लेता है।
यह balancing act आसान नहीं है। Middle East में कोई भी flare up भारत के लिए diplomatic tightrope बन सकता है। इसलिए हर बयान, हर handshake और हर agreement long term calculation के साथ होना चाहिए।
भावनाओं से आगे, विवेक की जरूरत
नेसेट का सम्मान निश्चित रूप से एक diplomatic milestone है। यह भारत की global visibility को दर्शाता है। लेकिन foreign policy में applause अंतिम लक्ष्य नहीं होता। असली लक्ष्य stability, prosperity और strategic autonomy है।
भारत को यह सुनिश्चित करना होगा कि उसकी इजराइल नीति balanced रहे। Security cooperation मजबूत हो, लेकिन humanitarian values भी कायम रहें। Strategic partnership आगे बढ़े, लेकिन independent voice भी बरकरार रहे।
आखिरकार सवाल यह नहीं कि किसने किसे शेर कहा। सवाल यह है कि क्या यह साझेदारी भारत को अधिक सुरक्षित, अधिक समृद्ध और अधिक सम्मानित बनाएगी। Diplomacy में दोस्ती जरूरी है, पर दूरदर्शिता उससे भी ज्यादा जरूरी है।






