
Supreme Court reacts strongly to NCERT Class 8 book controversy – Shah Times
ज्यूडिशियरी पर अध्याय और अदालत का कड़ा संदेश
कक्षा 8 की किताब से उठा संवैधानिक तूफान
एनसीईआरटी की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की किताब में न्यायपालिका और भ्रष्टाचार से जुड़े अध्याय पर सुप्रीम कोर्ट ने कड़ा रुख अपनाया है। अदालत ने विवादित हिस्से पर रोक लगाते हुए जवाबदेही तय करने की बात कही है। बिना शर्त माफी के बावजूद कोर्ट संतुष्ट नहीं दिखा। यह मामला सिर्फ एक किताब का नहीं, बल्कि संस्थागत गरिमा, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और शिक्षा की दिशा पर बड़े सवाल खड़ा करता है। क्या छात्रों को व्यवस्था की आलोचना पढ़ाई जानी चाहिए, या इससे संस्थाओं पर भरोसा कमजोर होता है। यही इस पूरे विवाद का केंद्र है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
जवाबदेही बनाम अभिव्यक्ति: शिक्षा पर बड़ी बहस
सवाल सिर्फ एक किताब का नहीं
एनसीईआरटी की किताब पर सुप्रीम कोर्ट की सख्ती ने मुल्क भर में बहस को तेज कर दिया है। अदालत ने कहा कि यह महज गलती नहीं लगती, बल्कि एक सोची समझी कोशिश हो सकती है जिससे ज्यूडिशियरी की साख पर असर पड़े। दूसरी तरफ यह भी सच है कि तालीम का मकसद सवाल पूछना सिखाना होता है। अगर किताब में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार पर चर्चा है, तो क्या वह अपने आप में गुनाह है। या मसला यह है कि उसे किस अंदाज में पेश किया गया।
यहां ठहरकर सोचने की जरूरत है। आठवीं जमात का बच्चा अभी नाजुक समझ के दौर में होता है। अगर उसे यह बताया जाए कि न्यायपालिका में करप्शन है, लेकिन यह न बताया जाए कि वही अदालतें कई बार सरकारों को कटघरे में खड़ा करती हैं, आम आदमी को इंसाफ दिलाती हैं, तो तस्वीर अधूरी रह जाती है। अधूरी तस्वीर कभी कभी पूरी गलतफहमी बन जाती है।
अदालत की नाराज़गी और उसका तर्क
चीफ जस्टिस ने साफ कहा कि जब तक जिम्मेदारी तय नहीं होगी, कार्रवाई रुकेगी नहीं। यह सख्त लहजा इसलिए भी है क्योंकि अदालत खुद को संविधान का संरक्षक मानती है। अगर किताब में यह इशारा जाए कि न्यायपालिका ने खुद संस्थागत भ्रष्टाचार स्वीकार किया है, तो वह गंभीर आरोप बन जाता है।
लेकिन यहां एक दूसरा पहलू भी है। अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि वैध आलोचना को दबाना मकसद नहीं है। यह अहम बात है। लोकतंत्र में आलोचना ऑक्सीजन की तरह होती है। अगर हम हर आलोचना को साजिश मान लें, तो फिर बहस का दरवाजा बंद हो जाएगा।
तो क्या अदालत का गुस्सा ज्यादा था। या वह जरूरी था ताकि भविष्य में कोई संस्था लापरवाही न करे। दोनों बातें एक साथ सच हो सकती हैं।
तालीम का मकसद क्या हो
हम अपने बच्चों को कैसी शिक्षा देना चाहते हैं। सिर्फ आदर्श तस्वीर, जहां सब कुछ परफेक्ट है। या हकीकत के साथ, जहां खामियां भी हैं और सुधार की कोशिशें भी। अगर बच्चा अखबार पढ़ता है, टीवी देखता है, तो उसे न्यायपालिका से जुड़े विवादों की खबरें भी मिलती हैं। ऐसे में किताब में उस पर चुप्पी भी अजीब लगेगी।
मगर भाषा और सन्दर्भ बहुत मायने रखते हैं। अगर अध्याय में सिर्फ शिकायतों का जिक्र है और सुधारों का नहीं, तो वह बैलेंस नहीं कहलाएगा। शिक्षा में संतुलन जरूरी है। जैसे घर में अगर हम बच्चे को सिर्फ डांट दिखाएं और प्यार न दिखाएं, तो वह घर की पूरी तस्वीर नहीं समझ पाएगा।
जवाबदेही की असली कसौटी
सुप्रीम कोर्ट ने एनसीईआरटी के निदेशक और संबंधित अधिकारियों को नोटिस जारी किया है। यह कदम बताता है कि संस्थाएं एक दूसरे से जवाब मांग सकती हैं। यही लोकतांत्रिक ढांचा है। मगर यह भी जरूरी है कि जवाबदेही तय करते वक्त भय का माहौल न बने।
अगर हर लेखक यह सोचकर लिखे कि कहीं अदालत नाराज़ न हो जाए, तो फिर पाठ्यपुस्तकें सिर्फ सरकारी दस्तावेज बनकर रह जाएंगी। और अगर लेखक पूरी आजादी लेकर बिना तथ्यों के गंभीर आरोप लिख दे, तो वह भी खतरनाक है। सच इन दोनों के बीच है।
डिजिटल दौर की चुनौती
जस्टिस बागची ने सही कहा कि डिजिटल युग में किताब की हजारों प्रतियां फैल चुकी होंगी। आज पीडीएफ एक क्लिक में शेयर हो जाती है। ऐसे में बैन का असर सीमित हो सकता है। असली काम है भरोसे की बहाली। अगर एनसीईआरटी खुलकर बताए कि गलती कहां हुई, समीक्षा कैसे होगी, तो संदेश ज्यादा मजबूत जाएगा।
क्या यह साजिश है
अदालत ने संकेत दिया कि यह एक कैलकुलेटेड मूव हो सकता है। यह गंभीर आरोप है। अगर सच में ऐसा है, तो जांच जरूरी है। लेकिन जांच तथ्यों पर आधारित होनी चाहिए, भावनाओं पर नहीं। लोकतंत्र में शक भी प्रमाण मांगता है।
असहमति और गरिमा का संतुलन
अदालत ने माना कि असहमति लोकतंत्र की जान है। यही सबसे अहम वाक्य है। सवाल यह है कि क्या हम असहमति को गरिमा के साथ जीना सीख पाए हैं। अगर कोई छात्र यह पूछे कि ज्यूडिशियरी में लंबित मामलों की संख्या क्यों ज्यादा है, तो क्या वह व्यवस्था का अपमान कर रहा है। या वह एक जिम्मेदार नागरिक बनने की दिशा में कदम उठा रहा है।
भरोसे की परीक्षा
यह विवाद हमें एक आईना दिखाता है। संस्थाओं की गरिमा जरूरी है। मगर पारदर्शिता भी उतनी ही जरूरी है। बच्चों को न तो भ्रम दिया जाना चाहिए, न भय। उन्हें सच, सन्तुलन और संदर्भ मिलना चाहिए।
सुप्रीम कोर्ट का संदेश साफ है कि संस्थागत प्रतिष्ठा से खिलवाड़ बर्दाश्त नहीं होगा। साथ ही यह भी उतना ही जरूरी है कि शिक्षा का दायरा सवाल पूछने की हिम्मत दे। अगर हम इन दोनों को साथ लेकर चल सकें, तो यही असली लोकतांत्रिक जीत होगी।






