
लग्ज़री, कारीगरी और एआई का टकराव
डिजिटल चमक बनाम असली हुनर की बहस
मिलान फैशन वीक से पहले गुच्ची ने अपने रनवे शो के प्रमोशन में एआई से तैयार तस्वीरें साझा कीं। सोशल मीडिया पर बहस छिड़ गई। कुछ लोगों ने इसे रचनात्मक विस्तार कहा, तो कुछ ने इसे कारीगरी से समझौता बताया। सवाल सिर्फ टेक्नोलॉजी का नहीं है, बल्कि उस भरोसे का है जो एक लग्ज़री ब्रांड दशकों में बनाता है। यह विश्लेषण इसी टकराव को समझने की कोशिश है।
📍Milan ✍️ Asif Khan
मिलान फैशन वीक में गुच्ची और एआई का सवाल
बदलते दौर का आईना
मिलान की गलियों में फैशन सिर्फ कपड़ों का खेल नहीं होता, वह एक एहसास होता है। जब गुच्ची ( Gucci ) ने अपने आगामी रनवे शो के लिए एआई से बनी तस्वीरें जारी कीं, तो यह सिर्फ एक प्रचार रणनीति नहीं थी, यह एक बयान था। बयान यह कि फैशन हाउस अब डिजिटल ज़माने की रफ्तार से कदम मिला रहा है। मगर सवाल यह है कि क्या हर नई रफ्तार मंज़िल तक ले जाती है, या कभी रास्ता ही बदल देती है।
सोशल मीडिया पर एक टिप्पणी खूब चली कि अब क्या गुच्ची को 1976 का गाउन पहनाने के लिए असली मिलानी दादी भी नहीं मिलती। यह जुमला मज़ाक में था, मगर उसके पीछे एक तल्ख़ सच्चाई छुपी है। लग्ज़री की दुनिया में असलियत की कीमत होती है। वहां हर धागा, हर सिलाई, हर कहानी मायने रखती है।
एआई की चमक और शुबहा
एआई से बनी तस्वीरों को साफ तौर पर चिह्नित किया गया था, फिर भी आलोचकों ने इसे एआई स्लॉप कहकर खारिज किया। उनका कहना था कि जब एक ब्रांड अपनी पहचान उच्च कारीगरी और इटालियन विरासत से जोड़ता है, तो उसे सस्ती समझी जाने वाली डिजिटल तरकीबों से बचना चाहिए।
यह तर्क एक हद तक वाजिब है। अगर कोई लग्ज़री रेस्टोरेंट अचानक रेडीमेड सॉस का इस्तेमाल करे, तो ग्राहक चौंकेंगे ही। मगर दूसरी तरफ यह भी देखना होगा कि एआई हर बार लागत घटाने का जरिया नहीं होता। कई बार यह प्रयोग की आज़ादी देता है, वह विज़न दिखाता है जो कैमरा तुरंत कैद नहीं कर सकता।
कारीगरी बनाम कोड
फैशन में कारीगरी सिर्फ हुनर नहीं, एक तहज़ीब है। हाथ से बुना कपड़ा, महीन कढ़ाई, सीमित एडिशन, ये सब मिलकर ब्रांड की साख बनाते हैं। एआई इस प्रक्रिया में कहाँ खड़ा है। क्या वह कारीगर की जगह ले सकता है।
हक़ीक़त यह है कि एआई अभी तक असली सिलाई नहीं कर सकता। वह सिर्फ छवि बनाता है। तस्वीरें, वीडियो, विजुअल मूड। असली गाउन तो अब भी इंसानी हाथों से ही तैयार होता है। तो क्या एआई को एक औजार समझा जाए, या एक ख़तरा।
अगर हम ईमानदारी से देखें, तो हर नई तकनीक पहले शक के घेरे में रही है। फोटोग्राफी जब आई थी, तब भी कुछ चित्रकारों ने इसे कला का अंत कहा था। आज दोनों साथ मौजूद हैं। सवाल यह है कि क्या गुच्ची एआई को ब्रश की तरह इस्तेमाल करेगा या उसे पूरी पेंटिंग सौंप देगा।
मिलान फैशन वीक का दबाव
मिलान फैशन वीक (Milan Fashion Week) महज एक इवेंट नहीं, एक इम्तिहान है। यहां हर ब्रांड अपनी पहचान को नए सिरे से परिभाषित करता है। ऐसे में एआई का इस्तेमाल एक साहसिक कदम भी माना जा सकता है। यह दिखाता है कि ब्रांड स्थिर नहीं है, वह बदलते समय के साथ खुद को ढाल रहा है।
मगर यह भी सच है कि लग्ज़री बाजार में भरोसा सबसे बड़ी पूंजी है। अगर दर्शकों को लगे कि ब्रांड शॉर्टकट ले रहा है, तो नुकसान सिर्फ एक कैंपेन का नहीं, पूरी छवि का हो सकता है।
डिजिटल विरासत की कोशिश
गुच्ची पहले भी डिजिटल कलाकारों के साथ काम कर चुका है। उसने एनएफटी प्रोजेक्ट किए, एआई वीडियो बनाए, और नई पीढ़ी के उपभोक्ताओं तक पहुंचने की कोशिश की। यह रणनीति बताती है कि ब्रांड अपने ग्राहक आधार को सिर्फ पारंपरिक नहीं रखना चाहता।
आज का युवा उपभोक्ता स्क्रीन पर जीता है। उसके लिए डिजिटल अनुभव भी उतना ही असली है जितना रैंप पर चलता मॉडल। अगर एआई उस अनुभव को समृद्ध बनाता है, तो इसे पूरी तरह खारिज करना जल्दबाज़ी होगी।
नियामकीय और नैतिक परतें
यूरोप में फैशन ब्रांड्स पर प्रतिस्पर्धा नियमों के उल्लंघन को लेकर जुर्माना लग चुका है। इससे यह साफ है कि फैशन उद्योग सिर्फ रचनात्मक नहीं, कानूनी जाल में भी उलझा हुआ है। टेक्नोलॉजी के साथ यह जाल और जटिल हो जाता है।
एआई से जुड़े सवाल सिर्फ सौंदर्य के नहीं, पारदर्शिता और जवाबदेही के भी हैं। क्या मॉडल्स की जगह डिजिटल चेहरे आएंगे। क्या इससे रोजगार पर असर पड़ेगा। या फिर नए तरह की नौकरियां पैदा होंगी। इन सवालों से बचना आसान है, मगर जरूरी नहीं।
नए क्रिएटिव नेतृत्व की दिशा
ब्रांड के नए क्रिएटिव नेतृत्व ने सितंबर 2025 में अपनी पहली कलेक्शन पेश की थी। ऐसे समय में एआई कैंपेन को एक संकेत की तरह भी पढ़ा जा सकता है। शायद यह दिखाने की कोशिश है कि आने वाला दौर पारंपरिक और डिजिटल के मेल का होगा।
मगर यहां एक सावधानी भी जरूरी है। अगर प्रयोग बहुत तेज़ हो जाएं, तो दर्शक भावनात्मक जुड़ाव खो सकते हैं। लग्ज़री सिर्फ उत्पाद नहीं, कहानी होती है। और कहानी में इंसानी स्पर्श अनिवार्य है।
दर्शक की अदालत
आखिर में फैसला दर्शक ही करता है। कुछ लोग एआई छवियों को देखकर प्रभावित हुए। उन्होंने कहा कि तस्वीरों में मिलानी ग्लैमर की झलक थी। दूसरों ने इसे खोखला बताया।
यह विभाजन बताता है कि फैशन अब सिर्फ रनवे पर नहीं, कमेंट सेक्शन में भी तय होता है। ब्रांड को अब दो मोर्चों पर लड़ना है। एक रचनात्मकता का, दूसरा विश्वसनीयता का।
आगे का रास्ता
क्या गुच्ची पूरी तरह एआई की ओर जाएगा। या फिर यह सिर्फ एक प्रयोग था। मेरा मानना है कि असली समझदारी संतुलन में है। तकनीक को अपनाइए, मगर उसे पहचान पर हावी मत होने दीजिए।
अगर एआई कारीगर की कहानी को और खूबसूरती से पेश करता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। मगर अगर वह कहानी को ही बदल दे, तो सवाल उठना लाजिमी है।
फैशन की दुनिया में चमक हमेशा रहेगी। फर्क इतना है कि अब उस चमक के पीछे कोड भी होगा और कारीगर का पसीना भी। देखना यह है कि दोनों में तालमेल कितना सधा हुआ रहता है।





