
Russia nuclear weapons reduction statement at NPT conference Shah Times
रूस ने क्यों कहा, परमाणु हथियार घटाने का वक्त अभी नहीं
एनपीटी सम्मेलन के बीच रूस का बड़ा संदेश, भरोसा टूटा
न्यूयॉर्क में शुरू हुए परमाणु अप्रसार संधि समीक्षा सम्मेलन के बीच रूस ने साफ कहा है कि वह सिद्धांत रूप में परमाणु-मुक्त दुनिया का समर्थक है, लेकिन मौजूदा वैश्विक हालात इस दिशा में किसी वास्तविक प्रगति के लिए मुफीद नहीं हैं। यूक्रेन जंग, नाटो विस्तार, अमेरिका-रूस तनाव, चीन की सैन्य तैयारी और पश्चिमी देशों की नई परमाणु रणनीतियों ने उस भरोसे को कमजोर कर दिया है जिस पर हथियार कटौती की पूरी बहस टिकी थी। सवाल यह है कि क्या दुनिया फिर एक नए परमाणु दौर में दाखिल हो रही है।
📍Moscow / New York 🗓️ April 27, 2026 ✍️ Asif Khan
परमाणु शून्य की बात, लेकिन ज़मीन पर उल्टी दिशा
दुनिया की सियासत में कुछ बयान ऐसे होते हैं जो सिर्फ डिप्लोमैटिक लाइन नहीं होते, बल्कि आने वाले दौर का इशारा भी देते हैं। रूस के विशेष दूत आंद्रेई बेलौसोव का ताज़ा बयान उसी कैटेगरी में आता है। उन्होंने कहा कि रूस परमाणु-मुक्त दुनिया का समर्थक है, लेकिन मौजूदा हालात में परमाणु हथियारों की कटौती की संभावना बेहद कम है।
पहली नज़र में यह बयान विरोधाभासी लग सकता है। अगर रूस परमाणु हथियार खत्म करना चाहता है, तो फिर कटौती की संभावना कम क्यों बता रहा है। असल जवाब मौजूदा जियोपॉलिटिकल माहौल में छिपा है।
आज दुनिया उस दौर में है जहां भरोसा तेजी से खत्म हो रहा है। और परमाणु निरस्त्रीकरण भरोसे के बिना संभव नहीं होता।
न्यूयॉर्क सम्मेलन क्यों अहम है
न्यूयॉर्क में परमाणु अप्रसार संधि यानी एनपीटी का 11वां समीक्षा सम्मेलन शुरू हुआ है, जो 22 मई तक चलेगा। एनपीटी को लंबे समय से ग्लोबल न्यूक्लियर ऑर्डर की रीढ़ माना जाता है।
इस समझौते के तीन बड़े स्तंभ हैं।
पहला, परमाणु हथियारों का प्रसार रोकना।
दूसरा, शांतिपूर्ण परमाणु ऊर्जा सहयोग।
तीसरा, धीरे-धीरे निरस्त्रीकरण।
समस्या तीसरे स्तंभ में है।
गैर-परमाणु देश लगातार शिकायत करते रहे हैं कि अमेरिका, रूस, चीन, फ्रांस और ब्रिटेन जैसे परमाणु शक्तिशाली देश निरस्त्रीकरण के वादे करते हैं लेकिन अपने शस्त्रागार को आधुनिक भी बना रहे हैं।
यानी संदेश यह जाता है कि बाकी दुनिया परमाणु हथियार न बनाए, लेकिन बड़ी ताकतें अपने हथियार बनाए रखें।
यही असंतुलन एनपीटी की विश्वसनीयता पर सवाल खड़े करता है।
रूस आखिर क्या कहना चाहता है
रूस का तर्क सीधा है।
मॉस्को कह रहा है कि पश्चिम खुद अपने न्यूक्लियर स्ट्रक्चर को मजबूत कर रहा है। नाटो की सुरक्षा नीति में परमाणु भूमिका अब भी मौजूद है। यूरोप में अमेरिकी हथियारों की तैनाती को लेकर रूस लंबे समय से नाराज़ है।
रूस यह भी कह रहा है कि गैर-परमाणु देशों की जमीन पर परमाणु इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ाना “न्यूक्लियर ज़ीरो” की भावना के खिलाफ है।
यह पूरी दलील पूरी तरह निराधार नहीं है।
अमेरिका अपने परमाणु सिस्टम के आधुनिकीकरण पर भारी खर्च कर रहा है। चीन तेजी से मिसाइल साइलो बढ़ा रहा है। रूस भी अपने स्ट्रेटेजिक सिस्टम अपडेट कर रहा है।
दूसरे शब्दों में, सभी ताकतें सार्वजनिक मंचों पर शांति की बात कर रही हैं लेकिन बैकएंड में सैन्य तैयारी जारी है।
यूक्रेन युद्ध ने क्या बदला
यूक्रेन युद्ध ने परमाणु बहस को पूरी तरह बदल दिया।
रूस ने कई मौकों पर संकेत दिए कि यदि उसकी सुरक्षा को अस्तित्वगत खतरा हुआ तो वह कठोर विकल्पों पर विचार कर सकता है। पश्चिम ने इसे गंभीर चेतावनी माना।
दूसरी तरफ अमेरिका और यूरोपीय देशों ने यूक्रेन को लगातार सैन्य समर्थन दिया।
इस जंग ने एक पुराना सिद्धांत फिर सामने ला दिया।
जब पारंपरिक युद्ध लंबा खिंचता है, तब परमाणु शक्तियों के बीच गलत अनुमान का खतरा बढ़ता है।
अगर किसी मिसाइल, ड्रोन या साइबर अटैक को गलत समझ लिया गया तो हालात तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं।
यही वजह है कि विश्लेषक इस दौर को बेहद संवेदनशील मानते हैं।
क्या सिर्फ पश्चिम जिम्मेदार है
यहीं सबसे जरूरी सवाल उठता है।
क्या सारी जिम्मेदारी सिर्फ पश्चिम की है।
रूस ऐसा नैरेटिव पेश करता है, लेकिन तस्वीर ज्यादा जटिल है।
यूक्रेन पर रूस की सैन्य कार्रवाई ने यूरोप की सुरक्षा चिंताओं को बढ़ाया। इसी वजह से नाटो देशों ने अपनी रक्षा रणनीति और मजबूत की।
फिनलैंड का नाटो में शामिल होना और स्वीडन की सुरक्षा बहस भी इसी बदलाव का हिस्सा है।
आलोचक कहते हैं कि रूस खुद भी तनाव बढ़ाने में भूमिका निभा चुका है।
यानी दोनों पक्ष खुद को रक्षात्मक और दूसरे को आक्रामक बता रहे हैं।
सच बीच में कहीं है।
चीन फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
यह बहस सिर्फ अमेरिका और रूस तक सीमित नहीं रही।
चीन तेजी से अपनी सैन्य क्षमता बढ़ा रहा है। अमेरिकी रिपोर्ट्स लंबे समय से यह दावा करती रही हैं कि बीजिंग अपने परमाणु हथियारों की संख्या बढ़ा रहा है।
चीन कहता है कि उसका न्यूक्लियर डॉक्ट्रिन रक्षात्मक है।
लेकिन एशिया में तनाव बढ़ रहा है।
ताइवान मुद्दा, दक्षिण चीन सागर विवाद, अमेरिका-चीन प्रतिस्पर्धा और इंडो-पैसिफिक रणनीति ने समीकरण बदल दिए हैं।
अब परमाणु स्थिरता एक त्रिकोणीय चुनौती बन चुकी है।
छोटे देश क्यों चिंतित हैं
दुनिया के कई छोटे और मध्यम देश इस पूरी स्थिति से परेशान हैं।
उनका सवाल है कि अगर बड़ी शक्तियां खुद नियम नहीं मानेंगी तो बाकी देश क्यों भरोसा करें।
ईरान का परमाणु विवाद अब भी अधूरा है।
उत्तर कोरिया लगातार हथियार परीक्षण करता है।
मध्य पूर्व में नई सुरक्षा चिंताएं हैं।
अगर बड़ी ताकतें हथियार बढ़ाती रहीं तो क्षेत्रीय शक्तियां भी वैसा करने की कोशिश कर सकती हैं।
यह डोमिनो इफेक्ट बेहद खतरनाक होगा।
आर्थिक कीमत भी कम नहीं
परमाणु हथियार सिर्फ सुरक्षा का मामला नहीं हैं।
यह भारी आर्थिक बोझ भी हैं।
जब देश अरबों डॉलर हथियारों पर खर्च करते हैं, तब वही पैसा हेल्थ, एजुकेशन, इंफ्रास्ट्रक्चर और टेक्नोलॉजी में नहीं जाता।
एक आम नागरिक के लिए इसे ऐसे समझिए।
अगर परिवार अपनी पूरी कमाई सिर्फ सुरक्षा गार्ड पर खर्च कर दे और बच्चों की पढ़ाई छोड़ दे, तो भविष्य कमजोर हो जाएगा।
दुनिया कहीं-कहीं यही गलती कर रही है।
क्या एनपीटी कमजोर हो रहा है
कई विशेषज्ञ मानते हैं कि एनपीटी अब गंभीर दबाव में है।
कारण साफ हैं।
विश्वास की कमी।
नई हथियार तकनीक।
हाइपरसोनिक मिसाइलें।
साइबर खतरे।
स्पेस मिलिट्रीकरण।
पुराने समझौते नई चुनौतियों के लिए पर्याप्त नहीं दिख रहे।
आगे क्या देखना होगा
सबसे अहम सवाल यह है कि क्या अमेरिका और रूस फिर किसी नए आर्म्स कंट्रोल फ्रेमवर्क पर बात करेंगे।
क्या चीन अधिक पारदर्शिता दिखाएगा।
क्या यूरोप तनाव कम करेगा।
क्या संयुक्त राष्ट्र कोई नई कूटनीतिक ऊर्जा पैदा कर पाएगा।
अगर जवाब नकारात्मक रहा, तो दुनिया धीरे-धीरे एक नए हथियार दौर में प्रवेश कर सकती है।
अंतिम सवाल इंसानियत का है
रूस का बयान सिर्फ एक देश की शिकायत नहीं है। यह पूरी दुनिया की विफल होती सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था की याद दिलाता है।
परमाणु हथियारों का इस्तेमाल कभी नहीं होना चाहिए। यह बात लगभग सभी देश सार्वजनिक रूप से कहते हैं।
मगर असली परीक्षा तब होती है जब देशों को अपने सामरिक हितों और वैश्विक जिम्मेदारी में चुनाव करना पड़ता है।
फिलहाल दुनिया शांति की भाषा बोल रही है, लेकिन सुरक्षा की राजनीति हथियारों की भाषा में लिखी जा रही है।
यही सबसे बड़ा खतरा है।
अगर भरोसा वापस नहीं आया, तो परमाणु-मुक्त दुनिया का सपना सिर्फ भाषणों में रह जाएगा।




