
क्या पाकिस्तान भी करेगा इज़राइल से समझौता? ट्रंप का बड़ा संकेत
ईरान डील के बदले मुस्लिम देशों से ट्रंप की नई शर्त!
डोनाल्ड ट्रंप ने मुस्लिम देशों से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल होने की अपील कर मिडिल ईस्ट की सियासत में नई बहस छेड़ दी है। सऊदी अरब, पाकिस्तान, तुर्की और कई अरब देशों का नाम लेकर ट्रंप ने ईरान के साथ संभावित बड़े समझौते का संकेत दिया है। सवाल यह है कि क्या यह क्षेत्रीय शांति की कोशिश है या इज़राइल केंद्रित नई रणनीति?
📍वॉशिंगटन / मिडिल ईस्ट 📰 26 मई 2026✍️ आसिफ खान
ट्रंप की नई अपील ने क्यों बढ़ाई मिडिल ईस्ट की बेचैनी
अमेरिकी राष्ट्रपति Donald Trump ने एक बार फिर मिडिल ईस्ट की सियासत को हिला देने वाला बयान दिया है। ट्रुथ सोशल पर लंबी पोस्ट लिखते हुए ट्रंप ने कहा कि सऊदी अरब, यूएई, कतर, मिस्र, जॉर्डन, बहरीन, पाकिस्तान और तुर्की जैसे मुस्लिम देशों को “अब्राहम अकॉर्ड्स” में शामिल होना चाहिए। उनके मुताबिक यह कदम ईरान के साथ किसी बड़े क्षेत्रीय समझौते का हिस्सा बन सकता है।
यह बयान ऐसे वक्त आया है जब मिडिल ईस्ट पहले से तनाव, अविश्वास और बदलती रणनीतियों के दौर से गुजर रहा है। ग़ज़ा युद्ध, ईरान-इज़राइल टकराव, तेल सुरक्षा, रेड सी संकट और अमेरिकी चुनावी राजनीति, सब एक साथ इस बहस को और संवेदनशील बना रहे हैं।
ट्रंप की अपील को सिर्फ कूटनीतिक बयान मानना आसान नहीं है। इसके पीछे अमेरिकी चुनावी रणनीति, इज़राइल की सुरक्षा, अरब देशों की नई आर्थिक दिशा और ईरान को क्षेत्रीय तौर पर अलग-थलग करने की कोशिश जैसे कई पहलू जुड़े हुए दिखाई देते हैं।
आखिर क्या है अब्राहम अकॉर्ड्स
Abraham Accords की शुरुआत 2020 में ट्रंप प्रशासन के दौरान हुई थी। इसका मकसद इज़राइल और अरब देशों के बीच रिश्तों को सामान्य बनाना था।
यूएई और बहरीन सबसे पहले इसमें शामिल हुए। बाद में मोरक्को और सूडान भी इस प्रक्रिया का हिस्सा बने। अमेरिका ने इसे “ऐतिहासिक शांति पहल” बताया था। समर्थकों का दावा था कि इससे मिडिल ईस्ट में स्थिरता बढ़ेगी और आर्थिक साझेदारी मजबूत होगी।
लेकिन आलोचकों ने शुरुआत से सवाल उठाए। उनका कहना था कि फिलिस्तीन मुद्दे को दरकिनार कर सिर्फ सामरिक और कारोबारी हितों को आगे बढ़ाया गया। कई अरब समाजों में आज भी इज़राइल के साथ खुले रिश्तों को लेकर गहरी हिचक मौजूद है।
पाकिस्तान और तुर्की का नाम क्यों अहम है
ट्रंप की पोस्ट में पाकिस्तान और तुर्की का जिक्र सबसे ज्यादा चर्चा में है। दोनों देश लंबे समय से फिलिस्तीन के समर्थन की सार्वजनिक लाइन लेते रहे हैं। पाकिस्तान ने अब तक इज़राइल को औपचारिक मान्यता नहीं दी है। तुर्की के राष्ट्रपति Recep Tayyip Erdoğan भी कई मौकों पर इज़राइल की तीखी आलोचना करते रहे हैं।
ऐसे में सवाल उठ रहा है कि क्या ट्रंप सिर्फ दबाव की राजनीति कर रहे हैं या उनके पास किसी बड़े बैक चैनल संवाद की जानकारी है।
पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति भी इस बहस को जटिल बनाती है। वहां सेना, धार्मिक समूह और आम अवाम के बीच इज़राइल मुद्दा बेहद संवेदनशील माना जाता है। किसी भी सरकार के लिए अचानक अब्राहम अकॉर्ड्स जैसी पहल में शामिल होना आसान नहीं होगा।
तुर्की का मामला अलग है। अंकारा और तेल अवीव के रिश्ते उतार-चढ़ाव वाले रहे हैं। कारोबार और सुरक्षा स्तर पर संपर्क बना रहा, लेकिन सार्वजनिक राजनीतिक बयान अक्सर टकराव वाले रहे।
सऊदी अरब पर सबसे ज्यादा नजर
मिडिल ईस्ट के समीकरण में सबसे महत्वपूर्ण नाम Saudi Arabia का माना जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका और इज़राइल लगातार कोशिश करते रहे हैं कि रियाद औपचारिक रूप से अब्राहम अकॉर्ड्स में शामिल हो।
लेकिन ग़ज़ा युद्ध के बाद स्थिति बदल गई। सऊदी नेतृत्व ने सार्वजनिक तौर पर कहा कि फिलिस्तीनी राज्य के स्पष्ट रोडमैप के बिना सामान्यीकरण मुश्किल होगा।
यही वजह है कि ट्रंप का नया बयान कई विश्लेषकों को चुनावी दबाव और रणनीतिक संदेश दोनों लगता है। वह यह संकेत देना चाहते हैं कि अगर वह दोबारा सत्ता में मजबूत स्थिति बनाते हैं तो मिडिल ईस्ट में नई डील पॉलिटिक्स शुरू हो सकती है।
ईरान फैक्टर कितना बड़ा है
Iran इस पूरी बहस का केंद्रीय तत्व बना हुआ है। अमेरिका और इज़राइल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम और क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर चिंतित रहे हैं।
ट्रंप प्रशासन पहले भी ईरान पर “मैक्सिमम प्रेशर” नीति चला चुका है। अब उनकी नई पोस्ट को कुछ विशेषज्ञ उसी रणनीति के अगले चरण के रूप में देख रहे हैं। तर्क यह है कि अगर ज्यादा मुस्लिम देश इज़राइल के साथ रिश्ते सामान्य करते हैं तो ईरान क्षेत्रीय तौर पर अकेला पड़ सकता है।
लेकिन यह विश्लेषण पूरी तस्वीर नहीं दिखाता। ईरान के भी अपने क्षेत्रीय नेटवर्क हैं। इराक, सीरिया, लेबनान और यमन में उसका प्रभाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। इसलिए सिर्फ अब्राहम अकॉर्ड्स के विस्तार से क्षेत्रीय शक्ति संतुलन तुरंत बदल जाएगा, ऐसा दावा करना जल्दबाजी होगी।
क्या यह शांति प्रक्रिया है या सामरिक गठबंधन
ट्रंप समर्थक कहते हैं कि अब्राहम अकॉर्ड्स ने मिडिल ईस्ट में युद्ध की जगह आर्थिक सहयोग का रास्ता खोला। यूएई और इज़राइल के बीच व्यापार तेजी से बढ़ा। टेक्नोलॉजी, रक्षा और पर्यटन क्षेत्र में साझेदारी बढ़ी।
लेकिन आलोचक पूछते हैं कि अगर यह वास्तव में शांति प्रक्रिया है तो फिलिस्तीन मुद्दा अब तक हल क्यों नहीं हुआ।
ग़ज़ा में जारी मानवीय संकट ने इस सवाल को और गहरा किया है। अरब दुनिया में बड़ी आबादी मानती है कि सामान्यीकरण से पहले फिलिस्तीनी अधिकारों की गारंटी जरूरी है।
यही वजह है कि ट्रंप की अपील को हर जगह समान समर्थन नहीं मिल रहा। कुछ इसे “व्यावहारिक कूटनीति” कह रहे हैं, तो कुछ इसे “इज़राइल केंद्रित क्षेत्रीय पुनर्गठन” बता रहे हैं।
अमेरिका की घरेलू राजनीति भी जुड़ी
यह बयान अमेरिकी घरेलू राजनीति से भी अलग नहीं है। United States में राष्ट्रपति चुनावी माहौल लगातार गर्म हो रहा है। ट्रंप अपने समर्थकों के बीच खुद को “मजबूत वैश्विक डीलमेकर” के तौर पर पेश करना चाहते हैं।
अब्राहम अकॉर्ड्स ट्रंप की पहली राष्ट्रपति अवधि की बड़ी विदेश नीति उपलब्धियों में गिने जाते हैं। इसलिए उनका दोबारा इसका विस्तार करने की बात करना राजनीतिक तौर पर भी समझा जा रहा है।
डेमोक्रेटिक खेमे के कुछ नेता मानते हैं कि ट्रंप जटिल क्षेत्रीय संघर्षों को बहुत सरल तरीके से पेश करते हैं। उनका तर्क है कि सिर्फ समझौतों की घोषणा से जमीन पर स्थायी शांति नहीं आती।
अरब समाजों में कैसी प्रतिक्रिया
सोशल मीडिया पर इस मुद्दे को लेकर तीखी बहस देखने को मिली। कुछ यूजर्स ने कहा कि आर्थिक भविष्य और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नए रिश्ते जरूरी हैं। वहीं बड़ी संख्या में लोगों ने फिलिस्तीन मुद्दे को नजरअंदाज करने का आरोप लगाया।
पाकिस्तान और तुर्की में भी ऑनलाइन चर्चा तेज हुई। कुछ लोगों ने इसे अमेरिकी दबाव बताया। कुछ ने सवाल उठाया कि क्या मुस्लिम देशों की विदेश नीति अब पूरी तरह सुरक्षा और अर्थव्यवस्था के हिसाब से तय होगी।
हालांकि अभी तक पाकिस्तान, तुर्की और सऊदी अरब की तरफ से ट्रंप की इस अपील पर कोई बड़ा औपचारिक नीति परिवर्तन सामने नहीं आया है।
टाइमलाइन कैसे बदली
2020 में अब्राहम अकॉर्ड्स की शुरुआत हुई। यूएई और बहरीन ने इज़राइल से रिश्ते सामान्य किए। बाद में मोरक्को और सूडान भी जुड़े।
2023 और 2024 में सऊदी-इज़राइल बातचीत की खबरें बढ़ीं। लेकिन ग़ज़ा युद्ध के बाद प्रक्रिया धीमी पड़ गई।
2025 और 2026 में ईरान-इज़राइल तनाव, रेड सी सुरक्षा संकट और तेल व्यापार चिंताओं ने नई भू-राजनीतिक अनिश्चितता पैदा की।
अब 2026 में ट्रंप फिर उसी फ्रेमवर्क को आगे बढ़ाने की कोशिश करते दिखाई दे रहे हैं।
आगे क्या हो सकता है
सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या ट्रंप की अपील सिर्फ बयानबाज़ी है या इसके पीछे कोई वास्तविक कूटनीतिक प्रयास चल रहा है।
अगर सऊदी अरब जैसे बड़े देश आगे बढ़ते हैं तो मिडिल ईस्ट की राजनीति में बड़ा बदलाव आ सकता है। लेकिन अगर फिलिस्तीन मुद्दा अनसुलझा रहता है तो इस प्रक्रिया को व्यापक जनसमर्थन मिलना मुश्किल होगा।
पाकिस्तान और तुर्की जैसे देशों के लिए यह फैसला और भी जटिल होगा क्योंकि वहां घरेलू राजनीतिक दबाव बहुत मजबूत है।
फिलहाल इतना साफ है कि ट्रंप ने फिर एक बार मिडिल ईस्ट बहस को नई दिशा दे दी है। लेकिन यह दिशा स्थायी शांति की तरफ जाएगी या नए ध्रुवीकरण की तरफ, इसका जवाब अभी भविष्य के गर्भ में है।
सम्पादकीय दृष्टिकोण
डोनाल्ड ट्रंप की नई अपील सिर्फ एक सोशल मीडिया पोस्ट नहीं मानी जा रही। यह मिडिल ईस्ट की बदलती राजनीति, अमेरिकी रणनीति और मुस्लिम देशों के सामने खड़े नए दबावों की झलक भी है।
अब्राहम अकॉर्ड्स का विस्तार क्षेत्रीय सहयोग का नया मॉडल बन सकता है। लेकिन अगर फिलिस्तीन मुद्दा पीछे छूटता है, तो यही प्रक्रिया नए अविश्वास और राजनीतिक तनाव को भी जन्म दे सकती है।
यानी सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन देश समझौते में शामिल होगा। असली सवाल यह है कि क्या मिडिल ईस्ट की नई राजनीति न्याय, सुरक्षा और स्थिरता के बीच संतुलन बना पाएगी।
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