
Shah Times coverage of Book Fair and Skill Development Exhibition at Muzaffarnagar Police Line
वामा सारथी पहल से पुलिस परिवार की महिलाओं को नई पहचान
मुजफ्फरनगर पुलिस लाइन में बच्चों के भविष्य पर बड़ा फोकस
मुजफ्फरनगर पुलिस लाइन में आयोजित पुस्तक मेला और कौशल विकास प्रदर्शनी केवल एक सांस्कृतिक कार्यक्रम नहीं था, बल्कि यह पुलिस परिवारों के सामाजिक सशक्तिकरण, बच्चों की एजुकेशन अवेयरनेस और महिलाओं की आर्थिक आत्मनिर्भरता का एक अहम मॉडल बनकर सामने आया। वामा सारथी के बैनर तले हुए इस आयोजन ने यह दिखाया कि पुलिस वेलफेयर अब सिर्फ प्रशासनिक शब्द नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर बदलती हुई सोच का हिस्सा बन रहा है।
📍 पुलिस लाइन, मुजफ्फरनगर
📰 29 मई 2026
✍️ वसी सिद्दीकी
पुलिस लाइन मुजफ्फरनगर में पुस्तक मेला बना सामाजिक बदलाव का संकेत
मुजफ्फरनगर पुलिस लाइन में शुक्रवार को आयोजित पुस्तक मेला एवं कौशल विकास प्रदर्शनी ने एक अलग तरह का नैरेटिव पेश किया। आम तौर पर पुलिस लाइन को अनुशासन, परेड और सुरक्षा व्यवस्था के केंद्र के रूप में देखा जाता है, लेकिन इस आयोजन ने उसी परिसर को शिक्षा, क्रिएटिविटी और सामाजिक जागरूकता के मंच में बदल दिया।
वामा सारथी पुलिस फैमिली वेलफेयर एसोसिएशन के तत्वावधान में हुए इस कार्यक्रम में पुलिस परिवारों की महिलाओं, बच्चों और पुलिसकर्मियों की सक्रिय मौजूदगी ने यह साफ किया कि पुलिस वेलफेयर मॉडल अब केवल औपचारिक गतिविधियों तक सीमित नहीं रहना चाहता।
कार्यक्रम का नेतृत्व वामा सारथी अध्यक्ष डॉ. नीलम राय और पुलिस अधीक्षक अपराध एवं नोडल अधिकारी इंदु सिद्धार्थ ने किया। आयोजन में करीब 400 प्रतिभागियों की मौजूदगी इस बात का संकेत थी कि समाज के भीतर शिक्षा और स्किल डेवलपमेंट को लेकर रुचि लगातार बढ़ रही है।
पुस्तक मेला क्यों बना चर्चा का केंद्र
डिजिटल दौर में बच्चों की पढ़ने की आदत लगातार कम होने को लेकर लंबे समय से बहस चल रही है। मोबाइल स्क्रीन, शॉर्ट वीडियो और इंस्टेंट कंटेंट की वजह से किताबों से दूरी बढ़ने की चिंता अक्सर सामने आती रही है।
ऐसे माहौल में पुलिस लाइन के भीतर बुक फेयर आयोजित करना एक अलग सोच को दर्शाता है। बच्चों को ज्ञानवर्धक, प्रेरणादायक और रचनात्मक पुस्तकों से जोड़ने की कोशिश केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि मानसिक विकास और वैचारिक विस्तार से जुड़ी पहल मानी जा रही है।








कार्यक्रम में बच्चों ने अलग-अलग विषयों की किताबें पढ़ीं, समझीं और खरीदी भी। यह हिस्सा इसलिए अहम माना जा रहा है क्योंकि छोटे शहरों में पुस्तक मेलों की संख्या सीमित होती जा रही है। ऐसे में संस्थागत स्तर पर इस तरह के आयोजन एजुकेशनल गैप को कम करने में भूमिका निभा सकते हैं।
कौशल विकास प्रदर्शनी ने बदला विमर्श
इस आयोजन का दूसरा बड़ा पहलू महिलाओं के कौशल विकास से जुड़ा रहा। सिलाई और ब्यूटीशियन कोर्स की प्रदर्शनी में पुलिस परिवार की महिलाओं ने अपने प्रशिक्षण के दौरान तैयार उत्पादों को प्रदर्शित किया।
लाइव प्रैक्टिकल डेमो ने कार्यक्रम को केवल औपचारिक प्रदर्शन तक सीमित नहीं रहने दिया। इससे यह संदेश गया कि स्किल ट्रेनिंग का उद्देश्य केवल प्रमाणपत्र देना नहीं, बल्कि वास्तविक रोजगार क्षमता विकसित करना भी है।
भारत में महिला श्रम भागीदारी दर को लेकर लगातार बहस होती रही है। ग्रामीण और अर्धशहरी इलाकों में बड़ी संख्या में महिलाएं घरेलू जिम्मेदारियों के कारण आर्थिक गतिविधियों से दूर रह जाती हैं। ऐसे में पुलिस परिवारों की महिलाओं को हुनर आधारित ट्रेनिंग देना सामाजिक और आर्थिक दोनों दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण माना जा सकता है।
वामा सारथी मॉडल कितना प्रभावी
उत्तर प्रदेश पुलिस के भीतर वामा सारथी को पुलिस परिवार कल्याण से जोड़कर देखा जाता है। इसका मकसद पुलिसकर्मियों के परिवारों को सामाजिक, शैक्षिक और मानसिक सहयोग देना है।
हालांकि सवाल यह भी उठता है कि क्या ऐसे कार्यक्रम केवल प्रतीकात्मक गतिविधियां बनकर रह जाते हैं या इनका स्थायी असर भी दिखाई देता है।
इस कार्यक्रम के समर्थकों का कहना है कि छोटे स्तर पर शुरू होने वाली पहलें धीरे-धीरे सामुदायिक परिवर्तन की नींव तैयार करती हैं। बच्चों को किताबों से जोड़ना और महिलाओं को स्किल आधारित ट्रेनिंग देना सीधे तौर पर सामाजिक आत्मविश्वास बढ़ाता है।
दूसरी ओर कुछ विश्लेषकों का मानना है कि ऐसे कार्यक्रमों की वास्तविक सफलता तभी मानी जाएगी जब इन्हें नियमित स्वरूप दिया जाए और ट्रेनिंग के बाद महिलाओं को रोजगार या मार्केट लिंक भी उपलब्ध कराया जाए।
पुलिस परिवारों की मानसिक दुनिया पर असर
पुलिस सेवा को अक्सर तनावपूर्ण और दबाव वाली नौकरी माना जाता है। लंबे ड्यूटी घंटे, लगातार कानून व्यवस्था की चुनौतियां और सामाजिक दबाव का असर पुलिसकर्मियों के परिवारों पर भी पड़ता है।
ऐसे माहौल में सांस्कृतिक और शैक्षिक कार्यक्रम मानसिक संतुलन और सामुदायिक जुड़ाव को मजबूत करने में मदद करते हैं। बच्चों के लिए सकारात्मक माहौल तैयार करना और परिवारों को साझा गतिविधियों में शामिल करना पुलिस वेलफेयर के व्यापक मॉडल का हिस्सा बन सकता है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर पुलिस संस्थानों में केवल अनुशासन आधारित संस्कृति रहे और मानवीय जुड़ाव कमजोर हो जाए, तो उसका असर कर्मचारियों की मानसिक स्थिति पर भी पड़ता है। इसलिए इस तरह के आयोजन संस्थागत संवेदनशीलता का संकेत माने जा सकते हैं।
छोटे शहरों में रीडिंग कल्चर की चुनौती
मुजफ्फरनगर जैसे शहरों में एजुकेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर लगातार बढ़ रहा है, लेकिन रीडिंग कल्चर को लेकर चुनौतियां अभी भी मौजूद हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं तक सीमित पढ़ाई ने रचनात्मक अध्ययन की परंपरा को कमजोर किया है।
बुक फेयर जैसे आयोजन बच्चों को केवल पाठ्यक्रम तक सीमित नहीं रखते। वे उन्हें नई सोच, विज्ञान, साहित्य, इनोवेशन और स्टार्टअप जैसी अवधारणाओं से परिचित कराते हैं।
यह पहल इसलिए भी अहम है क्योंकि राष्ट्रीय शिक्षा नीति में भी क्रिटिकल थिंकिंग और क्रिएटिव लर्निंग पर जोर दिया गया है। ऐसे में स्थानीय स्तर पर होने वाले कार्यक्रम नई शिक्षा सोच को ज़मीन पर उतारने की कोशिश के रूप में देखे जा सकते हैं।
सामाजिक संदेश और प्रशासनिक इमेज
पुलिस विभाग की सार्वजनिक छवि अक्सर कानून व्यवस्था और सख्ती से जुड़ी होती है। लेकिन इस तरह के कार्यक्रम विभाग की मानवीय छवि को सामने लाते हैं।
जब पुलिस परिवारों की महिलाएं आत्मनिर्भरता की दिशा में कदम बढ़ाती हैं और बच्चे किताबों से जुड़ते दिखाई देते हैं, तो इससे विभाग और समाज के बीच भरोसे का रिश्ता भी मजबूत होता है।
हालांकि आलोचक यह भी कहते हैं कि सामाजिक गतिविधियों के साथ-साथ पुलिस सुधार, कार्य परिस्थितियों और संसाधनों पर भी समान गंभीरता से काम होना चाहिए। केवल इमेज बिल्डिंग से संस्थागत समस्याएं हल नहीं होंगी।
यह तर्क अपनी जगह महत्वपूर्ण है, लेकिन इसके बावजूद सामाजिक वेलफेयर कार्यक्रमों की उपयोगिता को पूरी तरह खारिज करना भी मुश्किल है।
भविष्य की दिशा क्या हो सकती है
अगर इस मॉडल को आगे बढ़ाया जाए तो पुलिस लाइनें केवल प्रशासनिक परिसर नहीं, बल्कि सामुदायिक विकास केंद्र के रूप में भी विकसित हो सकती हैं।
बुक क्लब, डिजिटल लाइब्रेरी, महिला स्टार्टअप नेटवर्क और स्किल ट्रेनिंग सेंटर जैसे आइडिया भविष्य में इस तरह की पहलों को और प्रभावी बना सकते हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी संस्थानों के भीतर अगर परिवार आधारित वेलफेयर सिस्टम मजबूत होता है तो उसका असर कर्मचारियों के मनोबल और कार्यक्षमता पर भी दिखाई देता है।
मुजफ्फरनगर का यह आयोजन शायद राष्ट्रीय स्तर की बड़ी खबर न हो, लेकिन स्थानीय समाज और पुलिस परिवारों के लिए इसका असर गहरा हो सकता है।
सम्पादकीय दृष्टिकोण
पुलिस लाइन मुजफ्फरनगर में आयोजित पुस्तक मेला एवं कौशल विकास प्रदर्शनी केवल एक दिन का कार्यक्रम नहीं था। यह बदलते सामाजिक नज़रिये, शिक्षा के महत्व और महिला आत्मनिर्भरता की तरफ बढ़ते कदम का प्रतीक भी था।
इस आयोजन ने यह संकेत दिया कि वेलफेयर की असली परिभाषा केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि अवसर, जागरूकता और आत्मविश्वास तैयार करना भी है।
अब असली चुनौती यह होगी कि क्या ऐसी पहलें नियमित सामाजिक आंदोलन का रूप ले पाएंगी या फिर वे केवल इवेंट आधारित गतिविधियों तक सीमित रह जाएंगी।
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