
Religious and diplomatic efforts intensify to save Indian nurse Nimisha Priya from Yemen death sentence – Shah Times Report
भारत की कूटनीति बनाम यमन का कानून: कहां खड़ी है निमिषा प्रिया की उम्मीद
क्या ब्लड मनी से बच सकेगी निमिषा प्रिया की जान? यमन में फांसी से पहले आखिरी कूटनीति
भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की यमन में फांसी टालने की कोशिशें जारी हैं। ब्लड मनी पर बातचीत निर्णायक मोड़ पर है, उम्मीद की एक नई किरण जगी है।
निमिषा प्रिया की फांसी और भारत की कूटनीतिक सीमाएं
भारतीय नर्स निमिषा प्रिया की यमन में फांसी का मामला मानवीय, राजनीतिक, कूटनीतिक और धार्मिक जटिलताओं का जीवंत उदाहरण बन चुका है। यह केवल एक हत्या या सजा का मामला नहीं है, बल्कि यह भारत जैसे लोकतांत्रिक और संवेदनशील देश की उस कूटनीतिक सीमा को दर्शाता है जहां एक नागरिक की जान बचाने की कोशिशें केवल अपीलों और धर्म-संगठनों के भरोसे रह जाती हैं।
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अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार और न्यायिक संप्रभुता के टकराव
यमन में लागू शरिया कानून और न्यायिक संप्रभुता के आगे भारत सरकार का प्रभाव सीमित है। सुप्रीम कोर्ट में केंद्र सरकार का यह बयान कि “हम ज्यादा कुछ नहीं कर सकते”, सिर्फ कानूनी विवशता का संकेत नहीं देता, बल्कि यह दिखाता है कि वैश्विक राजनीति में न्यायिक संप्रभुता का सम्मान किस हद तक कूटनीति को पीछे छोड़ देता है। हालांकि, यह भी उतना ही सच है कि हर संप्रभु राष्ट्र का अपने कानून के प्रति पूर्ण अधिकार है।
लेकिन सवाल यह है – क्या एक मानवीय आधार पर, जब ब्लड मनी जैसी सांवैधानिक प्रक्रिया मौजूद है, तो क्या भारत को और आक्रामक नहीं होना चाहिए था?
ब्लड मनी: एक धार्मिक-न्यायिक समाधान या मजबूरी?
ब्लड मनी यानि ‘रक्त-मुआवजा’ एक ऐसी अवधारणा है जो अपराध और क्षमा के बीच एक सांस्कृतिक पुल का काम करती है। इस्लामी शरिया में यदि मृतक का परिवार आरोपी को माफ कर देता है और मुआवजा ले लेता है, तो सजा माफ की जा सकती है।
इस परिस्थिति में ब्लड मनी एकमात्र विकल्प है, और इसके लिए यमन के धार्मिक नेताओं, कबीलों, और मृतक परिवार को मनाना आसान नहीं है। कई बार यह माफ करना सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि सामाजिक स्वीकृति और धार्मिक प्रतिष्ठा से भी जुड़ा होता है।
कंथापुरम और शेख हबीब की पहल: धार्मिक कूटनीति की शक्ति
जब भारत की आधिकारिक कूटनीति कमजोर पड़ी, तब धार्मिक कूटनीति ने कमान संभाली। कंथापुरम ए पी अबूबकर मुसलियार और यमन के सूफी विद्वान शेख हबीब उमर बिन हफीज की पहल ने संवाद की राह खोली।
यह एक दुर्लभ उदाहरण है जहां इंटर-इस्लामिक नेटवर्किंग ने अंतरराष्ट्रीय मामलों में प्रभाव डाला है। यह बताता है कि धार्मिक नेतृत्व, विशेष रूप से सूफी परंपरा, मध्य-पूर्व में शांति स्थापना और वार्ता के लिए कितनी सक्षम हो सकती है।
भारत सरकार की भूमिका: निष्क्रियता या विवशता?
भारत सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में जो कहा, वह संवैधानिक रूप से सही हो सकता है, लेकिन नैतिक और कूटनीतिक दृष्टिकोण से सवाल उठते हैं। जब भारत अपने नागरिकों को दूसरे देशों में फंसा देखकर “सीमित हस्तक्षेप” का तर्क देता है, तो यह वैश्विक मंच पर उसकी छवि को प्रभावित करता है।
अगर विदेशों में बसे भारतीय यह महसूस करें कि संकट के समय भारत उनके साथ नहीं है, तो “प्रवासी भारतीय” की अवधारणा को गहरा धक्का लग सकता है।
सामाजिक प्रतिक्रिया और मीडिया की भूमिका
निमिषा का मामला तब तक आम जनता की नज़र में नहीं आया जब तक सोशल मीडिया पर जागरूकता नहीं फैली। यह एक बार फिर उस विडंबना को उजागर करता है कि जब तक सोशल मीडिया या टीवी चैनलों पर कोई मामला नहीं आता, वह राष्ट्रीय प्राथमिकता नहीं बनता।
मीडिया ने इस मुद्दे को उठाकर सरकार पर दबाव बनाया और धार्मिक नेतृत्व को सक्रिय होने के लिए मंच प्रदान किया। वहीं, सोशल मीडिया पर #SaveNimisha जैसे हैशटैग ने डिजिटल कूटनीति की भूमिका निभाई।
क्या भारत को अब एक ‘सिविल रेस्क्यू डिप्लोमेसी’ नीति बनानी चाहिए?
भारत अपने नागरिकों की विदेशों में रक्षा के लिए सीमित मैकेनिज्म पर निर्भर है। कई मामलों में सिर्फ कॉन्सुलेट या दूतावास तक ही प्रयास सीमित रहते हैं। यह जरूरी हो गया है कि भारत अब एक ‘सिविल रेस्क्यू डिप्लोमेसी’ नीति बनाए, जिसमें:
गैर-सरकारी धार्मिक संगठनों के साथ आधिकारिक सहयोग हो
अंतरराष्ट्रीय संकट स्थितियों के लिए विशेषज्ञ मध्यस्थ तैयार किए जाएं
ऐसी घटनाओं पर समय रहते प्रतिक्रिया की रूपरेखा तैयार की जाए
अंतिम क्षणों की यह वार्ता क्या बदल सकती है?
अब जबकि 16 जुलाई की तारीख समीप है, यमन के धमार में होने वाली वार्ता निर्णायक साबित हो सकती है। ब्लड मनी स्वीकार कर लिया जाए, तो निमिषा की जिंदगी बच सकती है। लेकिन यह केवल उसकी व्यक्तिगत मुक्ति नहीं होगी, यह भारत की कूटनीति, धार्मिक संवाद और सामाजिक सक्रियता की सामूहिक जीत होगी।
यह वार्ता बताती है कि जब राजनीतिक सीमाएं खत्म हो जाती हैं, तो मानवीय संवाद ही एकमात्र विकल्प बचता है।
निष्कर्ष: क्या हम समय रहते सीख लेंगे?
निमिषा प्रिया का मामला हमें यह सोचने पर मजबूर करता है कि क्या भारत को अपने नागरिकों की सुरक्षा को केवल राजनयिक सीमाओं तक सीमित रखना चाहिए? क्या मानवीय प्रयास, धार्मिक संवाद और समाज की भागीदारी को आधिकारिक नीति में शामिल नहीं किया जाना चाहिए?
यमन में हो रही अंतिम क्षणों की यह कूटनीति, भारत को यह सिखाती है कि कभी-कभी धर्म, समाज और अंतरराष्ट्रीय संवाद की त्रिधारा ही किसी एक नागरिक की जान बचाने के लिए काफी होती है। जरूरत है समय रहते इन प्रवृत्तियों को नीति में बदलने की।




