
किसानों की मुश्किलों पर बोले MLA पंकज मलिक, दीपावली से पहले सरकार से राहत की उम्मीद
बकाया भुगतान और लागत संकट पर MLA पंकज मलिक का हस्तक्षेप
लखनऊ में विधायक पंकज मलिक ने गन्ना मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी से मुलाक़ात कर किसानों की बढ़ती लागत, बकाया भुगतान और आजीविका की मुश्किलों पर विस्तार से चर्चा की। मंत्री ने दीपावली से पहले भुगतान कराने का आश्वासन दिया।
📍लखनऊ🗓️ 16 अक्तूबर 2025✍️ Asif Khan
दीपावली से पहले गन्ना भुगतान का वादा, किसानों में उम्मीद की किरण
उत्तर प्रदेश की राजनीति और कृषि दोनों का नाता हमेशा से गन्ने के खेतों से जुड़ा रहा है। पश्चिमी उत्तर प्रदेश का किसान सिर्फ़ एक उत्पादक नहीं बल्कि प्रदेश की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। ऐसे में जब वह संकट की बात करता है, तो उस आवाज़ को नज़रअंदाज़ करना शासन के लिए राजनीतिक और सामाजिक दोनों रूप से जोखिम भरा हो जाता है।
लखनऊ में हुई यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक शिष्टाचार भेंट नहीं थी, बल्कि एक लंबे समय से चल रही समस्या की ओर ध्यान आकर्षित करने की कोशिश थी। विधायक पंकज मलिक, जो स्वयं ज़मीनी राजनीति से आते हैं, ने यह स्पष्ट किया कि गन्ना किसानों की हालत अब चिंताजनक हो चुकी है।
किसान का लागत मूल्य लगातार बढ़ रहा है — खाद, डीज़ल, मज़दूरी, और बिजली सब महंगी हो चुकी हैं। मगर गन्ने का मूल्य वर्षों से लगभग स्थिर है। इस असमानता ने किसानों को कर्ज़ और तनाव के जाल में फँसा दिया है। मलिक का यह तर्क सटीक है कि जब तक किसानों को उनका बकाया समय पर नहीं मिलेगा, तब तक वे अगली फसल की बुवाई समय पर नहीं कर पाएंगे।
शामली, बुढ़ाना और थाना भवन शुगर मिलों के भुगतान की देरी ने न सिर्फ़ किसानों की आर्थिक स्थिति को कमज़ोर किया है, बल्कि ग्रामीण बाज़ारों की गतिविधियों पर भी असर डाला है। त्यौहार के मौसम में यह तकलीफ़ और गहरी महसूस होती है — जब बच्चे नई किताबें या कपड़े माँगते हैं और घर का मुखिया खाली जेब से जवाब देता है।
मंत्री लक्ष्मी नारायण चौधरी का तत्काल संज्ञान लेना सकारात्मक संकेत है। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह आश्वासन व्यवहारिक कार्रवाई में बदलेगा, या यह भी बाकी राजनीतिक वादों की तरह फाइलों में दफ़न रह जाएगा?
राजनीतिक दृष्टि से देखें तो गन्ना किसान सिर्फ़ वोटर नहीं बल्कि प्रभावशाली समूह हैं। पश्चिमी उत्तर प्रदेश में चुनावी समीकरण गन्ना मूल्य और भुगतान की समयसीमा पर ही निर्भर करते हैं। इसीलिए सरकारें अक्सर आख़िरी वक़्त में भुगतान के आदेश निकालती हैं ताकि किसानों की नाराज़गी को कम किया जा सके।
लेकिन असली समाधान तब होगा जब गन्ना उद्योग को नीतिगत स्तर पर पारदर्शी बनाया जाए। मिलों की वित्तीय जवाबदेही तय हो, किसानों को डिजिटल प्लेटफॉर्म पर भुगतान का ट्रैकिंग सिस्टम मिले, और बकाया पर ब्याज की व्यवस्था लागू हो।
यह मुद्दा केवल एक ज़िले का नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश के गन्ना बेल्ट का है। सहारनपुर से लेकर लखीमपुर तक किसान यही कहानी सुनाते हैं — “हमने गन्ना दिया, पर भुगतान का इंतज़ार महीनों से जारी है।”
इस संपादकीय का उद्देश्य सिर्फ़ आलोचना नहीं, बल्कि समाधान की तलाश है। अगर सरकार सच में ‘किसान कल्याण’ को प्राथमिकता देती है, तो उसे केवल घोषणाओं से आगे बढ़कर ज़मीनी स्तर पर कार्रवाई करनी होगी।
दीपावली से पहले भुगतान कराने का वादा स्वागत योग्य है, लेकिन किसानों के लिए यह दीया तभी जलेगा जब रकम उनके बैंक खाते में पहुँचेगी।
सामाजिक और राजनीतिक परिप्रेक्ष्य:
आज का किसान केवल खेत में नहीं, बल्कि राजनीतिक विमर्श के केंद्र में भी है। जब उसकी तकलीफ़ आवाज़ पाती है, तो यह लोकतंत्र की सेहत का संकेत है।
पंकज मलिक जैसे जनप्रतिनिधियों का यह कदम यह दिखाता है कि विपक्ष या सत्तापक्ष के परे, असल राजनीति वही है जो ज़मीन की गंध को महसूस करे।
कृषि अर्थशास्त्र के जानकार भी मानते हैं कि भुगतान में देरी पूरे ग्रामीण अर्थतंत्र की रफ़्तार को प्रभावित करती है। जब किसान के पास पैसा नहीं होता, तो उसकी ख़रीदारी घटती है, स्थानीय व्यापार सुस्त होता है और गाँव की अर्थव्यवस्था थम जाती है।
मंत्री का आश्वासन इस ठहराव को तोड़ने की दिशा में एक शुरुआत हो सकता है। मगर असली सवाल यह है कि क्या यह पहल स्थायी होगी या सिर्फ़ त्यौहार के मौक़े पर सीमित राहत।
वैकल्पिक दृष्टिकोण:
कुछ विश्लेषकों का मानना है कि गन्ना उद्योग में सरकारी हस्तक्षेप बढ़ने से बाज़ार की प्रतिस्पर्धा घटती है। अगर निजी मिलों को उत्पादन लागत और लाभ के अनुसार मूल्य तय करने की स्वतंत्रता दी जाए, तो स्थिति संतुलित हो सकती है।
लेकिन इसके विरोध में कहा जाता है कि इस तरह की स्वतंत्रता किसानों के लिए हानिकारक हो सकती है क्योंकि निजी कंपनियाँ अपने मुनाफ़े को प्राथमिकता देंगी।
दोनों तर्कों में सच्चाई है। समाधान यही है कि नीति ऐसी बने जिसमें किसान, मिल और उपभोक्ता — तीनों का हित संतुलित रहे।
निष्कर्ष
गन्ना सिर्फ़ एक फ़सल नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश के लाखों परिवारों की जीवनरेखा है। यह मुद्दा आर्थिक भी है, मानवीय भी और राजनीतिक भी।
लखनऊ की यह मुलाक़ात आने वाले दिनों में किसानों के लिए राहत लाएगी या नहीं, यह सरकार की नीयत और तत्परता पर निर्भर करेगा।
लेकिन इतना तय है कि अब किसान चुप नहीं रहेगा — उसकी आवाज़ विधानसभा से लेकर सोशल मीडिया तक गूँज रही है।
और यही लोकतंत्र की असली ताक़त है।





