
A senior health department official interacts with visitors during an inspection in Bijnor. The incident has sparked discussions over alleged private practice violations, as reported by Shah Times
बिजनौर में अवैध क्लीनिक चलाते पकड़े गए मुजफ्फरनगर के CMO, महिला आयोग की छापेमारी
मुजफ्फरनगर के CMO सुनील तेवतिया बिजनौर में अवैध निजी क्लीनिक चलाते पकड़े गए। महिला आयोग की छापेमारी में वे टॉयलेट में छिपे मिले। मामले की जांच जारी।
📍 Muzaffarnagar ✍️Asif Khan
जब CMO ही नियम तोड़े, तो व्यवस्था का क्या होगा?
बिजनौर जिले में हुई एक घटना ने राज्य की स्वास्थ्य व्यवस्थाओं पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। मुजफ्फरनगर के मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. सुनील तेवतिया को राज्य महिला आयोग की सदस्य संगीता जैन ने एक अवैध निजी क्लीनिक चलाते हुए रंगे हाथ पकड़ा। यह घटना सिर्फ एक “छापेमारी” नहीं, बल्कि स्वास्थ्य तंत्र के भीतर पल रहे सड़ांध का ऐसा खुला प्रमाण है, जिसे वर्षों से नजरअंदाज किया जा रहा है।
सरकार ने वर्षों पहले निजी प्रैक्टिस पर प्रतिबंध लगा दिया था। शपथ-पत्र भी लिया गया, मॉनिटरिंग टीमें भी बनीं। लेकिन नियम लागू कहां हो रहे हैं?
अगर एक जिले का CMO ही अवैध क्लीनिक चला रहा हो, तो समझना मुश्किल नहीं कि अन्य स्तर के डॉक्टर क्या कर रहे होंगे।
घटना का पुनर्निर्माण: एक CMO का टॉयलेट में छिपना
रविवार दोपहर 1:13 बजे राज्य महिला आयोग की सदस्य संगीता जैन बिजनौर के इस क्लीनिक पर पहुंचीं। लगातार शिकायतें मिल रही थीं कि यहां मुजफ्फरनगर के CMO द्वारा निजी प्रैक्टिस की जा रही है।
जैसे ही वे केबिन में घुसीं, CMO पिछले दरवाजे से भागकर टॉयलेट में जाकर छिप गए। पुलिस ने उन्हें 5 मिनट में बाहर निकाला।
एक वरिष्ठ अधिकारी का इस तरह टॉयलेट में छिपना प्रशासनिक नैतिकता पर एक काला धब्बा है।
क्या सिर्फ प्राइवेट प्रैक्टिस? या सिस्टम की गहरी बीमारी?
यह घटना कई परतें खोलती है—
क्यों सरकारी डॉक्टर सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध नहीं होते?
मरीजों को पहले “सरकारी OPD” में, फिर “निजी क्लीनिक” में धकेला जाता है?
शपथ-पत्र की विश्वसनीयता क्या है?
मॉनिटरिंग टीमें लापता क्यों रहती हैं?
शिकायतों पर “चेतावनी” देने भर से क्या कुछ बदलने वाला है?
डॉक्टरों की निजी प्रैक्टिस को अगर सिर्फ “व्यक्तिगत गलती” माना जाए, तो जांच कभी पूरी नहीं होगी।
यह एक सिस्टमेटिक क्राइसिस है जिसकी जड़ें गहरी हैं।
सरकारी डॉक्टर निजी प्रैक्टिस क्यों करते हैं? डीप एक्सप्लेनेशन
1. कमाई का लालच
सरकारी डॉक्टरों का तर्क— सरकारी वेतन कम है।
लेकिन यह तर्क CMO स्तर के अधिकारी पर कैसे लागू हो सकता है?
2. स्थानीय स्तर पर सुरक्षा कवच
अक्सर जिला प्रशासन/स्थानीय नेटवर्किंग के चलते कार्रवाई नहीं होती।
डॉक्टरों में एक “अजेयता” की भावना पनप जाती है।
3. मॉनिटरिंग की नाकामी
नियम लिखे गए।
सर्कुलर जारी हुए।
शपथ-पत्र लिए गए।
लेकिन निगरानी के नाम पर सिर्फ कागज़ी औपचारिकता।
4. पब्लिक हेल्थ सिस्टम की कमियां
स्पेशलिस्ट डॉक्टरों की कमी
उपकरणों और दवाओं की कमी
भीड़ और अत्यधिक दबाव
इन सभी कारणों ने निजी क्लीनिकों को डॉक्टरों के लिए “कमाई का सुरक्षित रास्ता” बना दिया है।
जनता को होने वाला नुकसान
1. सरकारी अस्पतालों में डॉक्टर नहीं मिलते
मरीज सरकारी अस्पतालों में घंटों इंतजार करते हैं, क्योंकि डॉक्टर निजी क्लीनिक में व्यस्त होते हैं।
2. गरीब मरीजों की कमर टूटती है
जो इलाज मुफ्त मिलना चाहिए, वह निजी क्लीनिक में 300–500 रुपये लेकर दिया जाता है।
3. सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की विश्वसनीयता खत्म
लोग भरोसा खोते हैं कि सरकारी अस्पताल से गुणवत्तापूर्ण इलाज मिल पाएगा।
4. महिला, बच्चे और बुजुर्ग सबसे ज्यादा प्रभावित
क्योंकि इन वर्गों के लिए सरकारी स्वास्थ्य सेवा ही प्राथमिक विकल्प होती है।
CMO का निजी प्रैक्टिस करना — सामान्य मामला नहीं
मुख्य चिकित्सा अधिकारी सिर्फ एक डॉक्टर नहीं, बल्कि जिले के स्वास्थ्य व्यवस्था के मुखिया होते हैं।
उनकी जिम्मेदारी—
जिला अस्पताल की निगरानी
प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की कार्यक्षमता
मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रम
विशेष अभियानों की निगरानी
डॉक्टरों की ड्यूटी की मॉनिटरिंग
औषधि आपूर्ति की देखरेख
ऐसा अधिकारी यदि सरकारी आदेश का पालन न करे, तो पूरा जिला प्रभावित होता है।
महिला आयोग की भूमिका
इस केस में महिला आयोग ने एक साहसिक कदम उठाया है।
शिकायत मिलने के बाद कार्रवाई करना और सबूतों सहित CMO को पकड़ना आसान नहीं था।
इससे स्पष्ट है कि निगरानी तंत्र सक्षम हो तो घपले पकड़े जा सकते हैं।
क्या चेतावनी से कुछ बदलेगा? बिल्कुल नहीं।
पिछले 10 वर्षों में सैकड़ों डॉक्टर निजी प्रैक्टिस करते पकड़े गए।
ज़्यादातर मामलों में—
अस्थायी निलंबन
जांच लंबित
फिर क्लीन चिट
और फिर वही पुरानी प्रैक्टिस
इसलिए यह मामला एक और “फाइल” बनकर न रह जाए, इसकी निगरानी जरूरी है।
सुझाव: सरकार क्या करे? डीप पॉलिसी ब्लूप्रिंट
🔹 1. “सीक्रेट इंस्पेक्शन यूनिट” पूरी तरह स्वतंत्र हो
IAS + पुलिस + महिला आयोग की संयुक्त मोबाइल टीम।
🔹 2. GPS आधारित डॉक्टर-अटेंडेंस सिस्टम
यह सिस्टम कई राज्यों में लागू है और बेहद कारगर।
🔹 3. 20,000 रुपये तक का तत्काल दंड + सस्पेंशन
विशेषकर CMO/CS स्तर के अधिकारियों पर।
🔹 4. डिजिटल मरीज-फीडबैक सिस्टम
राज्य स्तर पर हेल्पलाइन + WhatsApp शिकायत चैनल।
🔹 5. निजी क्लीनिकों पर आकस्मिक सीलिंग पावर
ADMs को अधिकार दिया जाए।
नतीजा
ये घटना उत्तर प्रदेश ही नहीं, पूरे देश के चिकित्सा तंत्र के सामने एक बड़ा प्रश्न खड़ा करती है—
“क्या सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था को निजी लालच ने खोखला कर दिया है?”
जब CMO जैसे उच्च अधिकारी सरकार के आदेश को तोड़ते हुए पकड़े जाएँ, तो यह सिर्फ व्यक्तिगत गलती नहीं, बल्कि सिस्टम की विफलता है।
ज़रूरत है —
पूरे राज्य में गुप्त जांच अभियान की,
ताकि गरीबों के लिए बनी सरकारी स्वास्थ्य योजना “कागज़ पर” न रह जाए।





