
Scientists explore the healing potential of betel leaf for Alzheimer’s treatment, Shah Times report.
अल्ज़ाइमर इलाज की देसी राह ,परंपरा से प्रयोगशाला तक पान
📍लखनऊ✍️Asif Khan
लखनऊ विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों द्वारा पान के पत्ते में मौजूद हाइड्रॉक्सीचाविकोल पर किया गया शोध अल्ज़ाइमर के इलाज की दिशा में नई उम्मीद बनकर उभरा है। यह खोज परंपरागत ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के संगम की एक मजबूत मिसाल पेश करती है।
पान का पत्ता हमारे समाज में केवल स्वाद या परंपरा का हिस्सा भर नहीं रहा, बल्कि वह रिश्तों की मिठास, इज़्ज़त की पेशकश और संवाद का एक नरम ज़रिया भी रहा है। शादी हो या कोई खुशी का मौका, पान का ज़िक्र अपने आप आ जाता है। लेकिन अब वही पान, जिसे बुज़ुर्ग कभी आदत और कभी दवा दोनों कहते थे, अल्ज़ाइमर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज की उम्मीद बनकर सामने आया है। यह खबर सुनते ही बहुतों के मन में एक साथ हैरानी, खुशी और शंका तीनों पैदा हो गई हैं।
अल्ज़ाइमर एक ऐसी बीमारी है जो धीरे-धीरे इंसान से उसकी यादों का खज़ाना छीन लेती है। यह केवल मरीज को ही नहीं, बल्कि पूरे परिवार को भीतर तक तोड़ देती है। कोई पिता जो कभी घर का सहारा रहा, वही जब अपने बेटे को पहचानने से चूकने लगे, तो उस घर की दीवारें भी भारी हो जाती हैं। यही वजह है कि दुनिया भर में वैज्ञानिक सालों से इसका असरदार इलाज ढूंढने में लगे हैं, लेकिन अभी तक पूरी तरह सफल नहीं हो पाए हैं।
लखनऊ विश्वविद्यालय की प्रयोगशाला में हुआ यह शोध पहली नजर में परंपरा और आधुनिक विज्ञान का सुंदर मेल लगता है। हाइड्रॉक्सीचाविकोल नाम का यह तत्व पान के पत्ते में प्राकृतिक रूप से पाया जाता है। शोधकर्ताओं का कहना है कि यह तत्व उन प्रोटीनों पर असर डाल सकता है जो अल्ज़ाइमर से जुड़े हुए हैं। सुनने में यह बहुत बड़ा दावा लगता है और सच कहें तो लगता भी है। लेकिन यहीं से सवाल शुरू होते हैं।
पहला सवाल यह है कि क्या कंप्यूटर आधारित अध्ययन और शुरुआती प्रयोगों के आधार पर किसी दवा की सफलता का अंदाज़ा लगाना सही होगा। विज्ञान खुद हमें सिखाता है कि लैब से लेकर मरीज तक का सफर बहुत लंबा और कठिन होता है। हजारों यौगिक इस रास्ते में बीच में ही दम तोड़ देते हैं। इसलिए ज़रूरी है कि हम उत्साह के साथ-साथ संयम भी बनाए रखें।
दूसरा पहलू परंपरागत ज्ञान का है। हमारे यहां सदियों से पान को कई औषधीय गुणों से जोड़ा जाता रहा है। बुज़ुर्ग कहते रहे हैं कि यह पाचन ठीक रखता है, मुँह की सफाई करता है और थकान दूर करता है। अब वही बात आधुनिक प्रयोगशाला की भाषा में सामने आ रही है। यह एक तरह से उस ज्ञान की वापसी है जिसे हमने लंबे वक्त तक हल्के में लिया।
लेकिन क्या हर परंपरागत चीज़ सच में दवा बन सकती है। यही वो मोड़ है जहां हमें भावनाओं से थोड़ा बाहर निकलकर तर्क की ज़मीन पर खड़ा होना होगा। पान का अत्यधिक सेवन कैंसर जैसे गंभीर जोखिमों से भी जुड़ा रहा है। ऐसे में यह मान लेना कि पान का हर तत्व सुरक्षित ही होगा, एक खतरनाक सरलीकरण हो सकता है।
हाइड्रॉक्सीचाविकोल को गोली के रूप में विकसित किए जाने की संभावना सुनने में आकर्षक लगती है। सस्ती, आसानी से उपलब्ध और सरल दवा की कल्पना हर देश के लिए उम्मीद की किरण बन सकती है, खासकर भारत जैसे देश में जहां महंगी दवाएं आम आदमी की पहुंच से बाहर हो जाती हैं। लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि सस्ती दवा का सपना कई बार बड़े कारोबारी खेल में बदल जाता है।
दवा बनने के बाद उसका पेटेंट किसके पास होगा। उसका दाम कौन तय करेगा। क्या ग्रामीण क्षेत्र के मरीजों को वह सच में सुलभ होगी। यह सारे सवाल आज भले ही कागज पर लगें, लेकिन कल यही सवाल हकीकत बनकर सामने खड़े होंगे।
अल्ज़ाइमर केवल एक मेडिकल समस्या नहीं है, यह एक सामाजिक संकट भी है। जैसे-जैसे उम्र बढ़ती जा रही है, वैसे-वैसे इस बीमारी के मामले भी बढ़ रहे हैं। परिवार छोटे हो रहे हैं, संयुक्त परिवार लगभग खत्म हो रहे हैं, और अकेले बुज़ुर्गों की संख्या बढ़ती जा रही है। ऐसे में अल्ज़ाइमर का बोझ केवल अस्पतालों पर नहीं, बल्कि समाज की पूरी संरचना पर पड़ रहा है।
अगर पान के पत्ते से बनी दवा सच में असरदार साबित होती है, तो यह केवल एक मेडिकल सफलता नहीं होगी, बल्कि एक सामाजिक राहत होगी। सोचिए, कितने ही बुज़ुर्ग दोबारा अपने बच्चों के नाम याद कर पाएंगे, कितनी ही माताएं अपने पोते-पोतियों को पहचान पाएंगी। यह कल्पना ही आंखें नम कर देने के लिए काफी है।
लेकिन एक बारीक सच यह भी है कि अल्ज़ाइमर का इलाज केवल दवा से नहीं होता। जीवनशैली, खानपान, मानसिक सक्रियता और सामाजिक जुड़ाव भी इसमें बड़ी भूमिका निभाते हैं। अगर हम केवल गोली पर भरोसा करके बाकी सब नजरअंदाज कर दें, तो यह भी एक अधूरा समाधान ही रहेगा।
यहां एक और सवाल उठता है कि कहीं ऐसा तो नहीं कि हम हर बड़ी बीमारी का हल सिर्फ दवा में खोजने लगे हैं। आराम की जिंदगी, कम चलना-फिरना, लगातार स्क्रीन देखना और तनाव से भरा जीवन भी तो इन बीमारियों की जड़ में है। अगर हम इन कारणों पर बात ही नहीं करेंगे, तो इलाज हमेशा अधूरा ही रहेगा।
शोधकर्ताओं ने जिन प्रोटीनों की भूमिका बताई है, वह दिमाग के संदेश तंत्र से जुड़े हुए हैं। यह बात आम आदमी के लिए भले ही जटिल लगे, लेकिन इसका मतलब सीधा है कि यह तत्व दिमाग की संवाद प्रणाली को प्रभावित कर सकता है। और जब बात संवाद की हो, तो थोड़ी सी गड़बड़ी भी बड़े असर का कारण बन सकती है। इसलिए इसके दुष्प्रभावों पर भी उतनी ही गंभीरता से काम करना होगा।
एक तरफ हम गर्व कर सकते हैं कि यह शोध भारत में हुआ है, हमारी मिट्टी से निकली चीज़ पर हुआ है। दूसरी तरफ हमें यह भी देखना होगा कि कहीं यह खोज विदेशी कंपनियों के हाथों में जाकर हमारे लिए फिर से महंगी न बन जाए। यह पहले भी कई बार हो चुका है कि हमारे ज्ञान का इस्तेमाल बाहर बड़े मुनाफे के लिए हुआ और हम सिर्फ दर्शक बने रह गए।
यह खोज एक अवसर भी है और एक चेतावनी भी। अवसर इसलिए कि हम अपनी पारंपरिक औषधियों को आधुनिक विज्ञान की कसौटी पर कसकर दुनिया को नई दिशा दे सकते हैं। चेतावनी इसलिए कि अगर हमने इस दिशा में नीति, नैतिकता और सामाजिक न्याय का ध्यान नहीं रखा, तो यह अवसर कुछ लोगों की कमाई का साधन बनकर रह जाएगा।
अल्ज़ाइमर के मरीजों के परिवार जानते हैं कि यह बीमारी कितनी बेरहम होती है। एक दिन मरीज सही तरीके से बात करता है, अगले दिन वही इंसान अपने कमरे का रास्ता भूल जाता है। यह उतार-चढ़ाव परिवार को अंदर से थका देता है। ऐसे में कोई भी नई उम्मीद तुरंत दिल में जगह बना लेती है। यही वजह है कि ऐसी खबरों को बहुत जिम्मेदारी के साथ पेश किया जाना चाहिए।
मीडिया की भूमिका यहां बहुत अहम हो जाती है। अगर इसे चमत्कार की तरह पेश किया गया, तो लोगों की उम्मीदें जरूरत से ज्यादा बढ़ जाएंगी। और जब हकीकत उस उम्मीद पर खरी नहीं उतरी, तो निराशा और गहरी होगी। इसलिए जरूरी है कि हम इसे उम्मीद जरूर कहें, लेकिन चमत्कार नहीं।
यह भी जरूरी है कि सरकार और स्वास्थ्य नीति से जुड़े लोग इस शोध को गंभीरता से लें। अगर इस दिशा में समय रहते निवेश हुआ, तो यह देश के लिए एक बड़ी उपलब्धि बन सकती है। लेकिन अगर इसे सिर्फ खबर बनाकर छोड़ दिया गया, तो यह भी कई अधूरे सपनों की तरह किसी फाइल में दबकर रह जाएगी।
एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या हम मानसिक बीमारियों को अब भी उतनी ही गंभीरता से लेते हैं, जितनी शारीरिक बीमारियों को लेते हैं। अल्ज़ाइमर को आज भी कई घरों में उम्र का स्वाभाविक असर मानकर टाल दिया जाता है। जब तक समाज का नजरिया नहीं बदलेगा, तब तक किसी भी दवा का असर सीमित ही रहेगा।
यह खोज हमें यह याद भी दिलाती है कि विज्ञान और आस्था एक दूसरे के दुश्मन नहीं हैं। पान का पत्ता जिसे लोग पूजा में चढ़ाते हैं, वही अब प्रयोगशाला में परखा जा रहा है। यह मेल बताता है कि अगर नजरिया खुला हो, तो परंपरा और प्रगति एक साथ चल सकती हैं।
लेकिन इस पूरे उत्साह के बीच हमें यह सवाल भी पूछना चाहिए कि क्या हम सिर्फ इलाज पर ही बात करेंगे या रोकथाम पर भी उतना ही जोर देंगे। नियमित व्यायाम, संतुलित आहार, सामाजिक सक्रियता और सीखते रहने की आदतें अल्ज़ाइमर के खतरे को कम करने में अहम भूमिका निभाती हैं। अगर इस खबर के साथ ये बातें भी लोगों तक पहुंचें, तो इसका असर और व्यापक हो सकता है।
आज की तेज रफ्तार जिंदगी में बुज़ुर्ग अक्सर पीछे छूट जाते हैं। बच्चे अपने काम में इतने उलझ जाते हैं कि बात करने का वक्त भी नहीं निकलता। दिमाग को जो संवाद चाहिए, वह संवाद धीरे-धीरे कम होता जाता है। ऐसे में बीमारी केवल शरीर की नहीं, रिश्तों की भी हो जाती है।
इस शोध को इस बड़े सामाजिक परिप्रेक्ष्य में देखकर ही हम इसकी असली अहमियत को समझ सकते हैं। यह सिर्फ एक दवा की खोज नहीं है, बल्कि एक मौका है कि हम फिर से बुज़ुर्गों की सेहत, उनकी भूमिका और उनके सम्मान पर खुलकर बात करें।
पान का पत्ता शायद हमें यह भी सिखा रहा है कि जिन चीज़ों को हम रोजमर्रा में हल्के में लेते हैं, उन्हीं में कभी-कभी बड़े समाधान छुपे होते हैं। जरूरत है तो बस उन्हें ठीक नजर से देखने की।
अंत में यही कहा जा सकता है कि यह खोज उम्मीद की एक नई खिड़की जरूर खोलती है, लेकिन उस खिड़की के पार जाने का रास्ता अभी लंबा है। वहां तक पहुंचने के लिए वैज्ञानिक ईमानदारी, सामाजिक जिम्मेदारी और नीति की साफ सोच तीनों का साथ जरूरी है।
अगर यह तीनों साथ चले, तो हो सकता है कि आने वाले वक्त में पान का पत्ता सिर्फ पूजा की थाली या शादी की रस्म तक सीमित न रहे, बल्कि हजारों परिवारों की टूटी यादों को जोड़ने का जरिया बन जाए। और अगर ऐसा हुआ, तो यह केवल विज्ञान की नहीं, इंसानियत की भी जीत होगी।




