
Russian President Vladimir Putin during his India visit highlighting the evolving India-Russia partnership. Shah Times
पुतिन की भारत यात्रा और बदलता वैश्विक संतुलन
भारत और रूस के रिश्ते अब केवल रक्षा तक सीमित नहीं रहे। ऊर्जा, व्यापार, तकनीक और कूटनीति में नया संतुलन बन रहा है। यह लेख इसी बदलते समीकरण का गहराई से विश्लेषण करता है।
📍नई दिल्ली 🗓️6 दिसंबर 2025 ✍️ Asif Khan
पूर्व और पश्चिम के बीच भारत की राह
पुतिन की हालिया भारत यात्रा को केवल एक औपचारिक दौरा समझना बड़ी भूल होगी। यह वही पल है जहां दुनिया के बदलते राजनीतिक नक्शे में भारत अपनी जगह खुद तय करता हुआ दिखाई देता है। एक तरफ पश्चिमी दुनिया का दबाव, दूसरी तरफ पूर्व के पुराने रिश्ते, और बीच में भारत की अपनी जरूरते, अपनी मजबूरियां, और अपने फैसले। यह यात्रा असल में उसी संतुलन की कहानी है।
भारत और रूस का रिश्ता कोई नई दास्तान नहीं है। यह रिश्ता दशकों पुराने भरोसे, मुश्किल दिनों के साथ, और साझा तजुर्बों से बना है। जब दुनिया दो खेमों में बंटी हुई थी, तब भारत ने गुटनिरपेक्षता की राह चुनी, लेकिन जमीनी हकीकत में सोवियत संघ भारत के सबसे भरोसेमंद साथियों में रहा। रक्षा से लेकर भारी उद्योग तक, हर मोर्चे पर उस दौर की छाप आज भी दिखती है। भिलाई, बोकारो, और दुर्गापुर जैसे इस्पात संयंत्र सिर्फ कारखाने नहीं थे, बल्कि आत्मनिर्भरता के सपनों की बुनियाद थे।
आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं। भारत अब एक उभरती हुई महाशक्ति है। चौथी बड़ी अर्थव्यवस्था बनना केवल आंकड़ा नहीं, बल्कि एक नई जिम्मेदारी भी है। ऐसे में भारत की विदेश नीति भी स्वाभाविक तौर पर ज्यादा आत्मविश्वासी हो गई है। अब सवाल यह नहीं कि किसका साथ देना है, बल्कि यह है कि किस मुद्दे पर किसके साथ खड़ा होना है।
पुतिन की इस यात्रा में सबसे ज्यादा चर्चा तेल, व्यापार और रक्षा को लेकर हुई। रूस से सस्ता कच्चा तेल खरीदने का फैसला भारत के लिए सिर्फ आर्थिक नहीं, बल्कि रणनीतिक भी है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल के दाम आसमान छू रहे थे, तब रूस से आपूर्ति ने भारत को महंगाई के झटके से काफी हद तक बचा लिया। एक आम परिवार की रसोई में गैस का सिलेंडर, ट्रांसपोर्ट का किराया, और खाने-पीने की चीजों के दाम सीधे तेल से जुड़े होते हैं। ऐसे में यह फैसला केवल सरकार का नहीं, बल्कि आम अवाम की जेब से भी जुड़ा हुआ था।
यहां पश्चिमी देशों की नाराजगी भी अपनी जगह है। उनका तर्क है कि रूस पर दबाव डालने के लिए तेल खरीद कम होनी चाहिए। लेकिन भारत की दलील उतनी ही सीधी है कि जो देश अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता हो, वह भावनाओं से नहीं, गणनाओं से फैसले लेता है। यह वही जगह है जहां नैतिकता और राष्ट्रीय हित के बीच टकराव साफ दिखाई देता है।
रक्षा के मोर्चे पर भारत और रूस का रिश्ता अब भी मजबूत है। मिसाइल प्रणाली, पनडुब्बियां, और लड़ाकू विमान जैसे क्षेत्रों में रूस की तकनीक ने भारत की सैन्य ताकत को लंबे समय तक सहारा दिया है। लेकिन यह भी सच है कि भारत अब केवल एक सपाट खरीदार नहीं रहना चाहता। वह तकनीक चाहता है, साझेदारी चाहता है, और निर्माण में बराबरी चाहता है। संयुक्त उत्पादन और तकनीक हस्तांतरण इसी बदलाव के संकेत हैं।
इसके साथ ही भारत ने अमेरिका, फ्रांस और इस्राइल जैसे देशों से भी रक्षा सौदे किए हैं। इससे एक तरफ जहां विकल्प बढ़े, वहीं दूसरी तरफ यह संदेश भी गया कि भारत किसी एक धुरी पर नहीं टिकेगा। यह विविधता भारत की रणनीतिक आजादी का आधार बन चुकी है।
व्यापार का सवाल और भी पेचीदा है। आंकड़े साफ बताते हैं कि भारत और रूस के बीच व्यापार संतुलन अभी रूस के पक्ष में झुका हुआ है। इसका बड़ा कारण तेल आयात है। भारत अगर लंबी दूरी की उड़ानों वाले यात्री विमान, कृषि उत्पाद और प्रोसेस्ड फूड के क्षेत्र में निर्यात बढ़ाता है, तो यह झुकाव कुछ हद तक संतुलित हो सकता है। लेकिन इसमें समय लगेगा। व्यापार सिर्फ समझौतों से नहीं, बाजार की मांग और भरोसे से बढ़ता है।
यहां एक और परत है, जिसे अक्सर हम नजरअंदाज कर देते हैं। रूस आज जिस तरह पश्चिमी प्रतिबंधों से जूझ रहा है, उसमें भारत उसके लिए एक बड़ा आर्थिक सहारा बन चुका है। सवाल यह है कि क्या यह रिश्ता बराबरी पर टिका रहेगा या फिर किसी एक की मजबूरी दूसरे की ताकत बन जाएगी। इतिहास गवाह है कि जब रिश्तों में संतुलन बिगड़ता है, तो भरोसा भी डगमगाता है।
यूक्रेन युद्ध इस पूरे परिदृश्य की सबसे संवेदनशील कड़ी है। भारत ने बार-बार शांति की बात कही है, बातचीत और कूटनीति पर जोर दिया है, लेकिन किसी एक खेमे में खुलकर खड़ा होने से बचता रहा है। यह नीति कुछ लोगों को दोमुंही लग सकती है, लेकिन कूटनीति में यह अक्सर जरूरी होती है। जब आप दोनों पक्षों से बात कर पाते हैं, तभी मध्यस्थ की भूमिका निभा सकते हैं।
अब सवाल यह उठता है कि क्या भारत सच में इस युद्ध को खत्म कराने में कोई ठोस भूमिका निभा सकता है या यह केवल एक नैतिक अपील बनकर रह जाएगा। सच्चाई यह है कि बड़े टकराव सिर्फ अच्छे इरादों से नहीं सुलझते। वहां सैन्य, आर्थिक और राजनीतिक हितों का जाल इतना गहरा होता है कि हर कदम कई बार सोचना पड़ता है।
भारत की स्थिति कुछ हद तक एक ऐसे दोस्त की है जो दोनों तरफ बैठ सकता है, लेकिन किसी एक का पूरी तरह बन नहीं सकता। यही इसकी ताकत भी है और इसकी सीमा भी।
पुतिन की यात्रा का एक और अहम पहलू यह है कि यह पश्चिम को भी एक संकेत देता है। अमेरिका और यूरोप भारत को अपने रणनीतिक खेमे का अहम हिस्सा मानते हैं। इंडो-पैसिफिक, तकनीक, और सप्लाई चेन जैसे मुद्दों पर भारत उनकी योजनाओं का केंद्र है। ऐसे में रूस के साथ बढ़ती नजदीकी उन्हें असहज करती है। लेकिन भारत बार-बार यही कह रहा है कि साझेदारी का मतलब अधीनता नहीं होता।
ऊर्जा, रक्षा और व्यापार के अलावा शिक्षा, स्वास्थ्य और तकनीक जैसे क्षेत्रों में सहयोग की बात भी इस यात्रा में उठी। यह बदलाव का संकेत है। रिश्ते अब केवल सरकारों के बीच नहीं, समाजों के बीच बनने की ओर बढ़ रहे हैं। छात्र, डॉक्टर, इंजीनियर और शोधकर्ता इन रिश्तों को असली गहराई देते हैं।
लेकिन इस पूरी तस्वीर में कुछ सवाल भी हैं, जिनसे नजर नहीं चुराई जा सकती। रूस की अपनी आर्थिक सीमाएं, उसकी गिरती आबादी, और तकनीकी चुनौतियां भविष्य में उसके लिए मुश्किलें खड़ी कर सकती हैं। वहीं भारत की अर्थव्यवस्था तेजी से बढ़ रही है, लेकिन बेरोजगारी, असमानता और शिक्षा की गुणवत्ता जैसी समस्याएं अंदर से दबाव बनाती हैं। ऐसे में दोनों देशों की जरूरतें एक जैसी नहीं रह गई हैं।
एक और बड़ा सवाल नैतिकता का है। क्या केवल सस्ते तेल और हथियारों के लिए किसी युद्धग्रस्त देश के साथ खड़ा रहना ठीक है। इसका जवाब आसान नहीं है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में नैतिकता अक्सर आदर्शों की किताब में रहती है, जबकि फैसले यथार्थ की जमीन पर होते हैं।
पुतिन की यह यात्रा इसलिए भी अहम है क्योंकि यह दिखाती है कि दुनिया अब एक ध्रुवीय नहीं रही। शक्ति कई केंद्रों में बंटी है। अमेरिका, चीन, यूरोप, रूस और भारत सभी अपने-अपने दायरे में प्रभाव बढ़ाना चाहते हैं। ऐसे दौर में भारत का झुकाव किसी एक तरफ नहीं, बल्कि संतुलन की तरफ है।
यह संतुलन बनाए रखना आसान नहीं होगा। हर बड़े फैसले पर किसी न किसी को नाराज होना ही है। लेकिन शायद यही भारत की कूटनीति की असली परीक्षा है कि वह नाराजगी के बीच भी अपने हित साध सके।
अंत में यही कहा जा सकता है कि पुतिन की भारत यात्रा सिर्फ दो देशों की दोस्ती की तस्वीर नहीं है। यह उस दुनिया का आईना है जहां दोस्तियां भी बदल रही हैं, दुश्मनियां भी, और हितों की परिभाषा भी। भारत इस बदलती दुनिया में अपनी राह खुद बना रहा है। यह राह आसान नहीं है, लेकिन शायद यही इसकी पहचान भी है।




