
राहुल गांधी का आरोप और वोटर लिस्ट पर बढ़ता तनाव
इलेक्शन सिस्टम पर अविश्वास की बहस और राहुल का दावा
SIR विवाद और लोकतंत्र की बुनियाद पर उठते सवाल
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
राहुल गांधी ने लोकसभा में वोटर लिस्ट, चुनाव आयोग और इंस्टीट्यूशनल कंट्रोल पर गंभीर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वोट की पवित्रता देश की असली ताकत है और किसी भी तरह की हेराफेरी लोकतांत्रिक ढांचे पर सीधा हमला है। SIR प्रक्रिया पर चल रही बहस ने सियासी गरमाहट और बढ़ा दी है।
सियासी बहस का असल मायना
लोकसभा में जिस लहज़े में बहस शुरू हुई, वह किसी आम दिन की बहस नहीं थी। राहुल गांधी ने शुरुआत ही उस बात से की जो हर आम इंसान की जुबान पर अक्सर आती है। उन्होंने कहा कि जब वोटर लिस्ट पर शक पैदा हो जाए, तो पूरा सिस्टम एक अजीब बेचैनी में घिर जाता है। यह बात कड़वी है, पर सच है कि जब मोहल्ले में कोई कहता है कि “मेरा नाम लिस्ट से गायब है”, तो लोग इसे किसी छोटे अफसर की गलती नहीं मानते। उन्हें लगता है कि कहीं ऊपर कुछ गड़बड़ हो रही है। यही जज़्बाती बेचैनी राहुल ने सदन में आवाज़ बनकर पेश की।
उन्होंने बहुत साफ कहा कि वोट की चोरी सिर्फ एक प्रशासनिक भूल नहीं बल्कि एक ऐसा अमल है जो मुल्क की रवायत के ख़िलाफ़ जाता है। उन्होंने इसे सबसे बड़ा खतरनाक अमल बताया, क्योंकि इससे लोगों का यकीन हिल जाता है। यह बात उस शख्स को समझाना आसान है जिसने अपने जीवन में किसी छोटे चुनाव में भी वोट डाला हो। जब आप लाइन में खड़े होकर अपनी पहचान साबित करते हैं, उंगलियों पर स्याही लगवाते हैं, तो इस पूरी प्रक्रिया में एक अजीब सी इज़्ज़त महसूस होती है। अगर उसी वोट का कोई मायना न रहे, तो आदमी भीतर से टूट जाता है।
इंस्टीट्यूशनल कंट्रोल का दावा और विरोध
राहुल का दूसरा बड़ा दावा इंस्टीट्यूशन्स पर कंट्रोल को लेकर था। उन्होंने कहा कि मुल्क के अहम ढांचे — यूनिवर्सिटीज़, रेगुलेटरी बॉडीज़, और एडमिनिस्ट्रेटिव पदों — पर डाले जा रहे दबाव का असर सिर्फ कागज़ पर नहीं बल्कि ज़मीनी हकीकत में दिखता है। उन्होंने जब कहा कि “चयन काबिलियत पर नहीं, बल्कि झुकाव पर हो रहा है”, तो यह महज़ एक सियासी तंज नहीं था। यह एक ऐसा मुद्दा है जिसे कई लोग अपने कॉलेजों और दफ़्तरों में महसूस करते हैं।
यहां एक साधारण मिसाल काम आती है। अगर किसी यूनिवर्सिटी में नया वाइस चांसलर सिर्फ इसलिए लाया जाए क्योंकि वह किसी विशेष विचारधारा से मेल खाता है, तो उस यूनिवर्सिटी के छात्रों की अकादमिक आज़ादी आप ही समझ सकते हैं कि कितनी प्रभावित होती है। छात्र चाहे किसी भी विचार के हों, उन्हें यह साफ महसूस होता है कि माहौल अब तटस्थ नहीं रहा। राहुल गांधी इसी व्यापक माहौल को उजागर कर रहे थे।
मुल्क के ताने-बाने की बात
जब राहुल ने कहा कि मुल्क “वोट से बुना ताना-बाना” है, तो यह एक शायरी जैसी लाइन लग सकती है। लेकिन यह लाइन अपनी जगह एक बहुत भारी बात कहती है। लोग अक्सर सोचते हैं कि मुल्क की एकता संस्कृति, भाषा, त्योहारों या इतिहास से बनती है। यह बातें ज़रूर जोड़ती हैं, लेकिन हर नागरिक को बराबरी से जोड़ने वाली सबसे मजबूत रस्सी यही वोट है। यही एक मौका है जब किसी अमीर और किसी गरीब की आवाज़ एक बराबर गिनी जाती है।
इसीलिए उन्होंने ज़ोर देकर कहा कि वोट का असर सिर्फ चुनाव तक सीमित नहीं। यह नागरिकों के बीच बनाए गए भरोसे को संभालता है। अगर वोट की पवित्रता पर दाग लगेगा, तो भरोसा लड़खड़ाएगा और उस भरोसे के बिना मुल्क की एकता महज़ कागज़ी रहेगी।
SIR प्रक्रिया और पारदर्शिता का सवाल
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन पर चल रही बहस में राहुल ने कहा कि जब कई राज्यों में शिकायतें आ रही हैं, तो यह सिर्फ अफ़वाह के तौर पर नहीं देखी जानी चाहिए। लोग जब देखते हैं कि किसी का नाम बार-बार हटाया जा रहा है या नए नाम बिना वजह जोड़े जा रहे हैं, तो यह एक शरीफ़ शहरी के लिए सवाल पैदा करता है। उन्होंने कहा कि ऐसी प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी लोगों की नज़रों में शंका पैदा करती है।
उन्होंने सवाल उठाया कि CCTV फुटेज सिर्फ 45 दिनों में क्यों नष्ट किया जाए। जब टेक्नोलॉजी के ज़माने में डेटा रखना आसान है, तो चुनावी फुटेज को इतने कम समय में मिटाने की क्या वजह है। एक आम इंसान भी मोबाइल में सालों का डेटा संभाल कर रख सकता है। ऐसी स्थिति में चुनाव जैसे अहम मामले में रिकॉर्ड इतने जल्द क्यों मिटाए जाएं? यह सवाल गूंजता है और सत्ता पक्ष इसका जवाब देने में हिचक दिखाता है।
सत्ता पक्ष की नाराज़गी और बहस का रुकना
जब राहुल ने संस्थागत कब्ज़े का ज़िक्र किया, तो सत्ता पक्ष की तरफ से कड़ी प्रतिक्रिया आई। वेल में नारे लगे, चेहरों पर ग़ुस्सा दिखा, और स्पीकर को बार-बार हस्तक्षेप करना पड़ा। यह शोर इस बात की निशानी था कि उनका निशाना कहीं न कहीं लगा है। बहस रुक-रुक कर चलती रही, लेकिन उनकी बातों ने जो असर पैदा करना था, वह पहले ही हो चुका था।
मुल्क की सियासत में यह नया नहीं कि सत्ता और विपक्ष किसी मुद्दे पर आमने-सामने हों। लेकिन इस बार मुद्दा वोट की पवित्रता था, जो हर नागरिक के दिल से जुड़ा हुआ है। और इसलिए यह बहस ज़्यादा संवेदनशील और ज़्यादा भारी थी।
दूसरी तरफ़ के तर्क
अब यह ज़रूरी है कि राहुल के तर्कों को एकतरफ़ा न माना जाए। सत्ता पक्ष का दावा है कि चुनावी सुधारों का मकसद प्रक्रिया को आसान, तेज़ और टेक्नोलॉजी आधारित बनाना है। उनका कहना है कि CCTV फुटेज रखने की समयसीमा को कम किया गया ताकि अनावश्यक डेटा बोझ से बचा जा सके। वे यह भी कहते हैं कि SIR पूरी तरह नियमों के अनुसार चल रहा है और विपक्ष जानबूझकर शंका पैदा कर रहा है।
सवाल यह है कि क्या जनता इस स्पष्टीकरण से संतुष्ट है? कई लोग मानते हैं कि सुधार ज़रूरी हैं, लेकिन किसी भी सुधार में पारदर्शिता और जवाबदेही उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है। अगर इन दोनों की कमी रही, तो सुधार भी शक पैदा करेंगे।
आख़िर सच किस तरफ़ है?
सच शायद इन दोनों दावों के बीच कहीं बैठा है। वोटर लिस्ट में सुधार ज़रूरी है, लेकिन उसे लेकर लोगों को यकीन दिलाना और भी ज़रूरी। इंस्टीट्यूशन्स पर भरोसा किसी दिन में नहीं बनता, और अगर उस भरोसे को हिलाया जाए तो उसे वापस बनाना कई साल ले जाता है। राहुल गांधी का तर्क इसी भरोसे की लड़ाई को आवाज़ देता है।
इस बहस का असली मतलब यही है कि मुल्क की असल ताकत वोटर नहीं खो सकते। वोटरों का भरोसा नहीं टूटना चाहिए। और जो भी ताकत इस भरोसे को ज़रा भी कम करे, चाहे वह सत्ता हो, सिस्टम हो या कोई संस्था, उसे सवालों का जवाब देना ही होगा।






