
Editorial illustration on the new Gold Card policy by Shah Times.
अमेरिका की नई गोल्ड कार्ड पहल और इसके असर
अमेरिका के गोल्ड कार्ड प्रोग्राम ने नागरिकता, प्रवासन और ग्लोबल टैलेंट की राजनीति में नई हलचल पैदा कर दी है। यह नीति आकर्षक भी है और विवादित भी।
📍Washington ✍️ Asif Khan
अमेरिका में गोल्ड कार्ड की शुरुआत होते ही सियासी सरगर्मी बढ़ गई है। कई लोग इसे एक आकर्षक दरवाज़े की तरह देखते हैं, जहाँ योग्य लोग सीधे प्रवेश पा सकते हैं। दूसरी ओर कुछ लोग इसे एक ऐसी सीढ़ी मानते हैं जो सिर्फ़ उन लोगों के लिए रखी गई है जिनकी जेब भारी है। इन दोनों बातों के बीच सच शायद कहीं बीच में खड़ा है, थोड़ा सा मुस्कुराता हुआ, जैसे कह रहा हो कि असल तस्वीर अभी बाकी है।
नया रास्ता या नया तजुर्बा
गोल्ड कार्ड को उस क़िस्म के दस्तावेज़ की तरह पेश किया जा रहा है जो किसी क़ाबिल शख़्स को सीधा नागरिकता की तरफ़ ले जाएगा। इस योजना का ऐलान एक ऐसे वक़्त में हुआ है जब अमेरिका अपनी अर्थव्यवस्था, इनोवेशन और ग्लोबल टैलेंट को लेकर बेचैन है। सियासत में अक्सर कहा जाता है कि हर बड़ा फ़ैसला वक़्त की ज़रूरत से पैदा होता है, और ऐसा लगता है कि यह कार्ड भी उसी बेचैनी का जवाब है।
सरकार का कहना है कि यह ग्रीन कार्ड से बेहतर है। यह बयान सुनते ही बहुत से अमेरिकन छात्रों, सॉफ्टवेयर इंजीनियर्स और वैज्ञानिकों की आँखों में उम्मीद चमकती दिखाई दी। उन्हें लगता है कि अब “बैक-टु-इंडिया” या “बैक-टु-चाइना” जैसा दबाव शायद कम होगा।
इधर दूसरी तरफ़ आलोचक कह रहे हैं कि यह दरअसल एक “पे-टु-एंटर” स्कीम है। यानी अगर आप 15000 डॉलर डीएचएस प्रोसेसिंग और फिर लगभग 10 लाख डॉलर का भुगतान कर दें तो “क़ाबिलियत” अपने आप साबित हो जाती है। यह सवाल ज्यों का त्यों खड़ा रहता है कि क्या टैलेंट वाक़ई पैसे से मापा जा सकता है।
तिज़ारत, तजुर्बा और तसल्ली
ट्रंप प्रशासन का दावा है कि इस प्रोग्राम से अमेरिकी ट्रेज़री में अरबों डॉलर आएँगे। यहाँ एक दिलचस्प पहलू है। पैसा आना बुरा नहीं, पर जब नागरिकता जैसे संवेदनशील विषय को आर्थिक लाभ से जोड़ दिया जाए, तो सवाल उठना स्वाभाविक है।
अमरीकी कंपनियाँ, ख़ासकर टेक सेक्टर, उम्मीद कर रही हैं कि यह मॉडल “टैलेंट रिटेंशन” का नया हथियार बनेगा। एप्पल, गूगल और दूसरी कंपनियों के लिए यह किसी राहत की तरह है। उनके कई कर्मचारी पढ़ाई खत्म करते ही वापस जाने पर मजबूर होते थे। अब उन्हें लग रहा है कि यह कार्ड उन्हें अपने सर्वश्रेष्ठ दिमागों को सँभालकर रखने में मदद करेगा।
नैतिकता का झूला
मगर एक दूसरी हक़ीक़त भी है। कुछ लोग कह रहे हैं कि यह सिस्टम दुनिया को दो वर्गों में बाँट देगा। पहला वह जो पैसा देकर नागरिकता की सीढ़ियाँ चढ़ जाता है। दूसरा वह जो सालों की लाइन, वेटिंग लिस्ट और इंटरव्यू के बीच घूमता रहता है।
यहाँ एक आम इंसान का उदाहरण समझना आसान है। मान लीजिए एक छात्र, जिसने अमेरिका में पढ़ाई की, रिसर्च की और इनोवेशन में योगदान दिया। लेकिन उसके पास इतनी पूँजी नहीं कि वह इस कार्ड को हासिल कर सके। क्या उसके लिए रास्ता पहले जैसा मुश्किल ही रहेगा? यह सवाल किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था को असहज कर देता है।
छुटती हुई ज़मीन और बढ़ता हुआ कन्फ्यूज़न
दुनिया भर के प्रवासन विशेषज्ञ यह तर्क दे रहे हैं कि यह मॉडल कई देशों को इसी दिशा में धकेल देगा। वे डरते हैं कि आगे चलकर नागरिकता एक तरह का “प्रोडक्ट” बन सकती है, जिसे पैसे से खरीदा जा सके।
इस बहस में एक हल्की-सी विडम्बना भी है। अमेरिका हमेशा से मेरिट आधारित प्रवासन की बात करता रहा है। अब लोग पूछ रहे हैं कि मेरिट का मतलब क्या सिर्फ़ इन्वेस्टमेंट है? या वह मेहनत, पढ़ाई और समाज में योगदान भी है जो किसी विदेशी नागरिक ने अपने वर्षों से दिया?
प्रशासन का पक्ष
सरकार का कहना है कि यह सिर्फ़ पैसा नहीं है, बल्कि सख़्त बैकग्राउंड चेक, प्रोसेसिंग और योग्यता की पूरी सूची भी है। मंत्री हॉवर्ड लुटनिक ने जो बातें कही हैं, वे साफ़ करती हैं कि सिस्टम को सिर्फ़ एक “पेमेंट गेटवे” की तरह समझना गलत है। लेकिन जनता को भरोसा दिलाना आसान नहीं होता।
यहाँ राजनीति अपना रंग दिखाना शुरू करती है। ट्रंप प्रशासन इसे एक क्रांतिकारी निर्णय बता रहा है। विपक्ष इसे अमीरों की सुविधा का नया मार्ग कह रहा है। जनता इन दोनों के बीच फँसी हुई है, जैसे किसी चौराहे पर खड़ा यात्री जिसे तय ही नहीं कि कौन-सा रास्ता बेहतर है।
अंतरराष्ट्रीय प्रभाव
दुनिया के बड़े देश—भारत, चीन, फ्रांस—सभी इस योजना की ओर ध्यान से देख रहे हैं। कई भारतीय छात्र और पेशेवर उत्साहित हैं कि उन्हें शायद अब अमेरिकी सपने की तरफ़ जाने के लिए एक सीधा रास्ता मिलेगा। लेकिन वे यह भी सोच रहे हैं कि इतनी बड़ी राशि भरना संभव तो नहीं होगा।
यही वह जगह है जहाँ नीति पर एक गहरी बहस शुरू होती है। क्या यह कार्ड उन लोगों के लिए दरवाज़ा खोलता है जिनके पास वाक़ई दुनिया बदलने की क़ाबिलियत है? या फिर उन लोगों के लिए जो “काबिल” कम और “क़ाबिल-ए-तौसीअ” पूँजी ज़्यादा रखते हैं?
भविष्य की दिशा
गोल्ड कार्ड मॉडल चाहे अच्छा हो या बुरा, यह तय है कि इससे ग्लोबल प्रवासन राजनीति में एक नई बहस शुरू होगी। शायद आने वाले समय में दुनिया को उन नियमों पर फिर से सोचना पड़ेगा जिन्हें हम अभी तक स्थिर मानते आए थे।
अमेरिका यह दिखाना चाहता है कि वह प्रतिभाओं का स्वागत करता है। लेकिन वह यह भी दिखा रहा है कि स्वागत करने की कीमत तय की जा सकती है।
इस पूरी कहानी का अंत अभी नहीं लिखा गया। यह एक चलती हुई स्क्रिप्ट है, जिसके अगले दृश्य में और भी विवाद, और भी उम्मीदें और शायद कुछ अप्रत्याशित मोड़ शामिल होंगे।




