
Prime Minister Narendra Modi meets Jordan leadership during historic visit Shah Times
भारत–जॉर्डन रिश्तों के 75 साल और आगे की राह
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की जॉर्डन यात्रा केवल एक औपचारिक दौरा नहीं, बल्कि बदलते पश्चिम एशिया में भारत की रणनीतिक सोच, संतुलन और PM दीर्घकालिक हितों का स्पष्ट संकेत है। 37 वर्षों बाद हुए इस पूर्ण द्विपक्षीय दौरे ने पुराने रिश्तों को नई भाषा और नई दिशा दी है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
इतिहास के लंबे साए में एक नया कदम
जॉर्डन की धरती पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का कदम रखना सिर्फ एक राजनयिक तस्वीर नहीं है। यह उस इतिहास की याद भी दिलाता है जिसमें भारत और जॉर्डन ने एक दूसरे को दूर से समझा, लेकिन पास आने में वक्त लगा। सैंतीस साल का फासला अपने आप में सवाल खड़ा करता है कि आखिर यह देरी क्यों हुई। जवाब सीधा नहीं है। पश्चिम एशिया की राजनीति हमेशा उलझी रही, और भारत अक्सर संतुलन साधने की कोशिश में चुप्पी को सुरक्षित रास्ता मानता रहा। अब यह चुप्पी टूट रही है, और उसकी जगह संवाद ले रहा है।
गर्मजोशी भरा स्वागत और उसके मायने
अम्मान एयरपोर्ट पर प्रधानमंत्री का स्वागत केवल शिष्टाचार नहीं था। जॉर्डन के प्रधानमंत्री का खुद मौजूद होना एक साफ संदेश देता है कि यह रिश्ता औपचारिकता से आगे बढ़ चुका है। राजनीति में प्रतीक अहम होते हैं। जैसे किसी पुराने दोस्त का स्टेशन पर लेने आना यह जताता है कि रिश्ता अब भी जिंदा है। यही भाव इस स्वागत में दिखा।
75 साल का रिश्ता और बदलती प्राथमिकताएं
जब दोनों देश अपने राजनयिक रिश्तों की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मना रहे हैं, तो यह सवाल भी जरूरी है कि इन वर्षों में हमने क्या सीखा। जॉर्डन ने हमेशा क्षेत्रीय स्थिरता और संतुलन की बात की है। भारत ने भी यही रास्ता चुना। फर्क बस इतना है कि अब भारत खुलकर अपनी बात रखने लगा है। यह बदलाव अचानक नहीं आया। यह अनुभव से उपजा है।
किंग अब्दुल्ला से बातचीत और उसका संदेश
हुसैनिया पैलेस में हुई मुलाकात में केवल द्विपक्षीय मुद्दे नहीं थे। गाजा, क्षेत्रीय शांति और वैश्विक तनाव जैसे विषय चर्चा के केंद्र में रहे। यह साफ है कि भारत अब खुद को केवल एक दूर का पर्यवेक्षक नहीं मानता। वह सुनना भी चाहता है और बोलना भी। कुछ लोग कह सकते हैं कि इससे जोखिम बढ़ता है, लेकिन कूटनीति में जोखिम से भागना भी एक जोखिम होता है।
गाजा पर जॉर्डन की भूमिका और भारत का संतुलन
प्रधानमंत्री मोदी द्वारा गाजा मुद्दे पर जॉर्डन की भूमिका की सराहना एक संतुलित बयान था। भारत ने न तो किसी का पक्ष छोड़ा, न किसी को नाराज़ किया। यह आसान नहीं होता। जैसे किसी परिवार के झगड़े में दोनों पक्षों की बात सुनकर शांति की अपील करना। जॉर्डन इस क्षेत्र में एक मध्यस्थ की तरह देखा जाता है, और भारत इस भूमिका को समझता है।
आतंकवाद पर साझा रुख
भारत और जॉर्डन का आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट और साझा संदेश कोई नई बात नहीं है। लेकिन आज इसका संदर्भ बदल गया है। उग्रवाद अब केवल सीमा पार की समस्या नहीं रहा। यह विचारों और डिजिटल स्पेस में फैल रहा है। ऐसे में दोनों देशों का मॉडरेशन और संतुलन पर जोर देना महत्वपूर्ण है। सवाल यह है कि क्या केवल बयान काफी हैं। शायद नहीं। लेकिन बयान दिशा तय करते हैं।
व्यापार और निवेश की बात, लेकिन जमीन पर क्या
ट्रेड, फर्टिलाइज़र, डिजिटल टेक्नोलॉजी और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे शब्द सुनने में आकर्षक लगते हैं। हर दौरे में यह शब्द दोहराए जाते हैं। असली परीक्षा तब होगी जब छोटे कारोबारी, स्टार्टअप और युवा इन रिश्तों का फायदा महसूस करेंगे। अगर जॉर्डन में पढ़ रहा एक भारतीय छात्र या भारत में काम कर रहा एक जॉर्डन इंजीनियर यह कह सके कि हालात आसान हुए हैं, तभी यह साझेदारी सच्ची मानी जाएगी।
पीपल टू पीपल संपर्क की अहमियत
राजनयिक रिश्ते अक्सर नेताओं तक सीमित रह जाते हैं। लेकिन इस दौरे में भारतीय समुदाय से मुलाकात एक अलग संकेत देती है। यह याद दिलाता है कि रिश्ते कागजों से नहीं, लोगों से बनते हैं। जैसे किसी रिश्ते में केवल बड़े बुजुर्ग बात करें और युवा चुप रहें, तो रिश्ता आगे नहीं बढ़ता।
पश्चिम एशिया में भारत की नई पहचान
भारत अब पश्चिम एशिया में केवल ऊर्जा जरूरतों के लिए नहीं देखा जाना चाहता। वह एक जिम्मेदार भागीदार बनना चाहता है। जॉर्डन जैसे देश इस सोच के लिए सही मंच हैं। यहां न अतिवाद की भाषा चलती है, न अंधा समर्थन। यह संतुलन भारत की विदेश नीति से मेल खाता है।
आलोचना की गुंजाइश भी जरूरी
यह कहना भी जरूरी है कि हर यात्रा से तुरंत बड़े नतीजे की उम्मीद करना अव्यावहारिक है। कुछ लोग सवाल करेंगे कि क्या यह दौरा घरेलू चुनौतियों से ध्यान हटाने की कोशिश है। सवाल पूछना लोकतंत्र की ताकत है। लेकिन हर अंतरराष्ट्रीय पहल को संदेह की नजर से देखना भी सही नहीं।
इथियोपिया और ओमान की कड़ी
जॉर्डन के बाद इथियोपिया और ओमान की यात्रा इस बात का संकेत है कि भारत अफ्रीका और खाड़ी को एक ही रणनीतिक धागे में पिरो रहा है। यह धागा व्यापार, सुरक्षा और संस्कृति से जुड़ा है। अगर एक कड़ी कमजोर हुई, तो पूरी रणनीति प्रभावित हो सकती है।
भविष्य की राह और जिम्मेदारी
प्रधानमंत्री का यह कहना कि रिश्तों में गति और गहराई आएगी, एक वादा है। वादों की कीमत तभी होती है जब उन्हें निभाया जाए। भारत और जॉर्डन दोनों के लिए यह मौका है कि वे शब्दों को काम में बदलें। नहीं तो यह दौरा भी फाइलों में दर्ज एक तारीख बनकर रह जाएगा। नतीजे से पहले एक सवाल
क्या भारत पश्चिम एशिया में वह भरोसा कायम कर पाएगा जिसकी उसे जरूरत है। जवाब पूरी तरह हां या ना में नहीं है। यह एक प्रक्रिया है। जॉर्डन यात्रा उस प्रक्रिया का एक अहम कदम है। जैसे लंबी यात्रा में पहला मील पत्थर दिखाई दे, लेकिन मंजिल अभी दूर हो।




