
सफेद तिल या काले तिल हेल्थ के लिए कौन से फायदेमंद है,आइए जानते हैं?

भारतीय रसोई में तिल का उपयोग सदियों से होता आ रहा है। मकर संक्रांति से लेकर आयुर्वेदिक नुस्खों तक, तिल को पोषण और परंपरा—दोनों का प्रतीक माना गया है। लेकिन अक्सर लोगों के मन में यह सवाल रहता है कि सफेद तिल बेहतर हैं या काले तिल? इस सवाल का जवाब सीधा नहीं, बल्कि सेहत की ज़रूरतों पर निर्भर करता है।
पोषण का खज़ाना हैं तिल
तिल के दोनों प्रकार—सफेद और काले—प्रोटीन, अच्छे फैट, फाइबर, कैल्शियम, आयरन और एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं। इनमें मौजूद तिल का तेल हृदय स्वास्थ्य के लिए लाभकारी माना जाता है।
सफेद तिल
हल्के, स्वादिष्ट और एनर्जी देने वाले
सफेद तिल स्वाद में हल्के होते हैं और पचाने में अपेक्षाकृत आसान माने जाते हैं।
मुख्य लाभ
• इनमें कैल्शियम और मैग्नीशियम अच्छी मात्रा में होता है, जो हड्डियों और दाँतों के लिए उपयोगी है।
• ये शरीर को तुरंत ऊर्जा देने में मदद करते हैं, इसलिए सर्दियों में लड्डू या चटनी के रूप में खूब इस्तेमाल होते हैं।
• त्वचा और बालों के लिए भी इन्हें लाभकारी माना जाता है।
काले तिल
औषधीय गुणों से भरपूर
काले तिल आयुर्वेद में विशेष स्थान रखते हैं।
मुख्य लाभ
• इनमें आयरन की मात्रा अधिक होती है, इसलिए इन्हें खून की कमी से जुड़ी समस्याओं में सहायक माना जाता है।
• काले तिल एंटीऑक्सीडेंट्स से भरपूर होते हैं, जो शरीर को अंदर से मज़बूत बनाने में मदद करते हैं।
• पाचन तंत्र को सक्रिय रखने और ठंड के मौसम में शरीर को गर्म रखने में उपयोगी माने जाते हैं।
कौन से तिल है ज़्यादा फायदेमंद?
• यदि आप रोज़मर्रा के भोजन में हल्का और स्वादिष्ट विकल्प चाहते हैं, तो सफेद तिल बेहतर हैं।
• अगर उद्देश्य औषधीय लाभ, आयरन की पूर्ति या सर्दियों में शरीर को मज़बूती देना है, तो काले तिल ज़्यादा उपयुक्त माने जाते हैं।
पोषण विशेषज्ञों का कहना है कि किसी एक को “बेहतर” कहना ठीक नहीं। संतुलित आहार में दोनों प्रकार के तिल शामिल किए जाएँ, तो शरीर को अधिक व्यापक लाभ मिल सकता है।
निष्कर्ष
सफेद हों या काले—तिल भारतीय खान-पान का अनमोल हिस्सा हैं। ज़रूरत और स्वाद के अनुसार इनका सही उपयोग ही स्वस्थ जीवन की कुंजी है।







