
सरकारी नौकरियों में जनरल कैटेगरी पर सुप्रीम कोर्ट की दो टूक
आरक्षण पर सुप्रीम कोर्ट: ओपन कैटेगरी सभी के लिए खुली
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी भर्तियों में जनरल या ओपन कैटेगरी को लेकर दो अहम फैसलों में अपनी पुरानी व्यवस्था को दोहराया है। कोर्ट ने कहा कि जनरल कैटेगरी का आधार सिर्फ मेरिट है, न कि जाति या वर्ग।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों की पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों और प्रतियोगी परीक्षाओं से जुड़े मामलों में जनरल या ओपन कैटेगरी की परिभाषा को लेकर दो अलग-अलग मामलों में स्पष्ट रुख अपनाया है। अदालत ने यह दोहराया कि जनरल कैटेगरी किसी जाति, वर्ग या समूह के लिए आरक्षित नहीं होती, बल्कि यह पूरी तरह मेरिट आधारित होती है। इन फैसलों का सीधा असर भर्ती प्रक्रियाओं, चयन सूचियों और कैटेगरी आधारित कट-ऑफ के तरीके पर पड़ता है।
न्यायमूर्ति दीपांकर दत्ता और ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की पीठ ने 19 दिसंबर को राजस्थान हाई कोर्ट के एक फैसले को बरकरार रखते हुए कहा कि ओपन कैटेगरी का मतलब ही यह है कि उसमें शामिल होने की एकमात्र शर्त योग्यता है। वहीं, एक अन्य मामले में न्यायमूर्ति जे के माहेश्वरी और विजय बिश्नोई की पीठ ने कर्नाटक से जुड़े विवाद में यह स्पष्ट किया कि यदि किसी उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण में आरक्षण की छूट ली है, तो उसे अनारक्षित पद के लिए नहीं गिना जा सकता।
जनरल या ओपन कैटेगरी पर अदालत की स्पष्टता
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनरल, ओपन या अनारक्षित शब्दों का अर्थ यह नहीं है कि ये पद किसी विशेष सामाजिक समूह के लिए सुरक्षित हैं। अदालत के अनुसार, ये पद सभी योग्य उम्मीदवारों के लिए खुले होते हैं, चाहे वे किसी भी जाति, वर्ग या लिंग से आते हों। चयन का आधार केवल मेरिट होता है।
अदालत ने यह भी साफ किया कि यदि कोई आरक्षित श्रेणी का उम्मीदवार बिना किसी रियायत या छूट के सामान्य कट-ऑफ से अधिक अंक हासिल करता है, तो उसे जनरल कैटेगरी की सीट पर ही रखा जाएगा। इस स्थिति में उसे आरक्षित कोटे में समायोजित नहीं किया जाएगा।
‘डबल बेनिफिट’ की दलील पर कोर्ट का रुख
इन मामलों में एक अहम तर्क यह रखा गया था कि यदि आरक्षित श्रेणी के उम्मीदवारों को जनरल कैटेगरी में शामिल किया जाता है, तो उन्हें दोहरा लाभ मिलता है। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि जब कोई उम्मीदवार बिना किसी विशेष छूट के सामान्य कट-ऑफ पार करता है, तो यह कोई अतिरिक्त लाभ नहीं माना जा सकता।
कोर्ट ने दोहराया कि आवेदन पत्र में किसी आरक्षित श्रेणी का उल्लेख कर देना अपने आप में उम्मीदवार को केवल आरक्षित पद के लिए सीमित नहीं कर देता। यह केवल यह दर्शाता है कि उम्मीदवार को आरक्षित श्रेणी के अंतर्गत भी प्रतिस्पर्धा का अधिकार है।
राजस्थान हाई कोर्ट भर्ती से जुड़ा मामला
यह मामला राजस्थान हाई कोर्ट और जिला अदालतों में हुई भर्ती प्रक्रिया से संबंधित था। अगस्त 2022 में जूनियर ज्यूडिशियल असिस्टेंट और क्लर्क ग्रेड टू के कुल 2756 पदों के लिए परीक्षा आयोजित की गई थी। चयन प्रक्रिया में 300 अंकों की लिखित परीक्षा और 100 अंकों का टाइपिंग टेस्ट शामिल था।
मई 2023 में जब परिणाम घोषित हुए, तो यह सामने आया कि कई आरक्षित श्रेणियों के कट-ऑफ अंक सामान्य श्रेणी से अधिक थे। कुछ उम्मीदवारों ने सामान्य कट-ऑफ पार कर लिया था, लेकिन अपनी श्रेणी के कट-ऑफ तक नहीं पहुंच पाने के कारण उन्हें अगले चरण से बाहर कर दिया गया।
हाई कोर्ट का फैसला और सुप्रीम कोर्ट की मुहर
इन उम्मीदवारों ने इस प्रक्रिया को चुनौती देते हुए कहा कि मेरिट को नजरअंदाज किया गया है। राजस्थान हाई कोर्ट ने फैसला सुनाते हुए कहा कि जो उम्मीदवार सामान्य कट-ऑफ पार करते हैं, उन्हें ओपन कैटेगरी में शामिल किया जाना चाहिए, भले ही वे किसी आरक्षित श्रेणी से आते हों।
सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट के इस फैसले को बरकरार रखा और भर्ती प्रक्रिया में अपनाई गई “डबल बेनिफिट” की दलील को स्वीकार नहीं किया। अदालत ने कहा कि मेरिट के आधार पर चयन संविधान के अनुच्छेद 14 और 16 के अनुरूप है।
कर्नाटक से जुड़ा दूसरा मामला
दूसरा मामला भारतीय वन सेवा परीक्षा से संबंधित था, जो दो चरणों में आयोजित होती है। प्रारंभिक परीक्षा के बाद मुख्य परीक्षा और साक्षात्कार होता है। इस मामले में एक अनुसूचित जाति के उम्मीदवार ने प्रारंभिक परीक्षा में रियायती कट-ऑफ का लाभ लिया था।
अंतिम मेरिट सूची में उस उम्मीदवार की रैंक सामान्य श्रेणी के एक अन्य उम्मीदवार से बेहतर थी। हालांकि, कैडर आवंटन के समय सामान्य श्रेणी के लिए उपलब्ध पद सीमित थे। केंद्र सरकार ने सामान्य श्रेणी के उम्मीदवार को जनरल इनसाइडर पद दिया और अनुसूचित जाति के उम्मीदवार को दूसरे राज्य का कैडर आवंटित किया।
सुप्रीम कोर्ट ने कर्नाटक मामले में क्या कहा
कर्नाटक हाई कोर्ट ने पहले अनुसूचित जाति के उम्मीदवार के पक्ष में फैसला दिया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उस फैसले को रद्द कर दिया। अदालत ने कहा कि भारतीय वन सेवा परीक्षा एक संयुक्त चयन प्रक्रिया है और प्रारंभिक चरण में ली गई किसी भी छूट को बाद के चरणों में नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
कोर्ट के अनुसार, यदि किसी उम्मीदवार ने चयन प्रक्रिया के किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ लिया है, तो उसे अनारक्षित पदों के लिए विचार योग्य नहीं माना जा सकता।
पूर्व फैसलों का हवाला
सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेशों में इंदिरा साहनी और सौरव यादव मामलों का उल्लेख किया। अदालत ने कहा कि इन मामलों में पहले ही यह स्पष्ट किया जा चुका है कि ओपन कैटेगरी सभी के लिए खुली है और इसमें शामिल होने की शर्त सिर्फ मेरिट है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि भर्ती प्रक्रियाओं में ‘ओपन’, ‘जनरल’ या ‘अनारक्षित’ जैसे शब्दों की सही व्याख्या और व्यवहारिक उपयोग जरूरी है, ताकि चयन प्रक्रिया में भ्रम न हो।
भर्ती प्रक्रियाओं पर असर
इन फैसलों के बाद यह स्पष्ट हो गया है कि भर्ती एजेंसियों को कट-ऑफ तय करते समय और शॉर्टलिस्टिंग करते समय मेरिट को प्राथमिकता देनी होगी। यदि कोई उम्मीदवार बिना किसी छूट के सामान्य मानकों पर खरा उतरता है, तो उसे ओपन कैटेगरी में शामिल करना होगा।
साथ ही, यदि किसी उम्मीदवार ने प्रारंभिक या किसी भी चरण में आरक्षण का लाभ लिया है, तो उसे जनरल सीट के लिए नहीं गिना जाएगा।
अदालत का संदेश
सुप्रीम कोर्ट ने इन दोनों फैसलों के जरिए यह दोहराया है कि जनरल कैटेगरी का उद्देश्य सभी योग्य उम्मीदवारों को समान अवसर देना है। अदालत ने कहा कि यह व्यवस्था न तो किसी वर्ग के खिलाफ है और न ही किसी के पक्ष में, बल्कि यह संविधान में निहित समानता के सिद्धांत को लागू करने का तरीका है।





