
PSLV-C62 mission failure explained Shah Times
पीएसएलवी की लगातार नाकामी और भारत की अंतरिक्ष साख
पीएसएलवी संकट और इसरो की परीक्षा,अंतरिक्ष में भरोसे की दरार
पीएसएलवी सी 62 की नाकामी ने भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं। लगातार दूसरी विफलता सिर्फ तकनीकी नहीं बल्कि संस्थागत पारदर्शिता और भरोसे की भी परीक्षा है।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
पीएसएलवी की साख और एक टूटा हुआ भरोसा
पीएसएलवी को आम लोग भारत का वर्कहॉर्स कहते थे। जैसे मोहल्ले की वह पुरानी साइकिल जो हर दिन बिना शिकायत के काम कर जाती है। मगर दो लगातार नाकामियों ने इस भरोसे में दरार डाल दी है। सी 61 और फिर सी 62, दोनों में तीसरे चरण की गड़बड़ी सामने आना कोई मामूली इत्तेफाक नहीं लगता। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि रॉकेट क्यों फेल हुआ, सवाल यह है कि सिस्टम ने इन जोखिमों को पहले क्यों नहीं पहचाना।
यहाँ हमें यह भी याद रखना चाहिए कि इसरो की कामयाबी हमेशा सस्ते और भरोसेमंद मिशनों से जुड़ी रही है। जब दुनिया के बड़े खिलाड़ी महंगे प्रोजेक्ट में उलझे रहते हैं, तब भारत ने कम बजट में भी नाम बनाया। अब अगर वही भरोसा हिलने लगे तो असर सिर्फ एक मिशन पर नहीं, पूरी नीति पर पड़ता है।
तकनीकी खराबी या संस्थागत थकान
आधिकारिक बयान कहता है कि तीसरे चरण में चैंबर प्रेशर गिर गया। यह सुनने में तकनीकी लगता है, मगर इसके पीछे इंसानी फैसले भी होते हैं। डिजाइन में बदलाव, क्वालिटी चेक, सप्लायर की जिम्मेदारी, यह सब मिल कर एक सिस्टम बनाते हैं। अगर एक कड़ी भी कमजोर हुई तो पूरी चेन टूट सकती है।
कभी किसी घर में पुरानी वायरिंग से शॉर्ट सर्किट होता है तो हम सिर्फ फ्यूज नहीं बदलते, पूरी लाइन चेक करते हैं। इसी तरह पीएसएलवी की समस्या को भी सिर्फ एक नोजल या एक लाइनिंग तक सीमित करना शायद अधूरी सच्चाई होगी। सवाल यह है कि क्या इसरो के अंदर समीक्षा की संस्कृति उतनी ही खुली है जितनी पहले थी।
पारदर्शिता की कमी और जनता का हक
पहले फेलियर एनालिसिस रिपोर्ट सार्वजनिक होती थी। लोग पढ़ते थे, बहस करते थे, और वैज्ञानिकों पर भरोसा बढ़ता था। अब रिपोर्टें बंद दरवाजों के पीछे चली गई हैं। यह बदलाव चिंता पैदा करता है। अंतरिक्ष कार्यक्रम जनता के पैसों से चलता है, इसलिए जनता को यह जानने का हक है कि गलती कहाँ हुई।
सोचिए अगर किसी ट्रेन का एक्सीडेंट हो और रेलवे सिर्फ इतना कहे कि तकनीकी दिक्कत थी, तो क्या लोग चुप बैठेंगे। नहीं, वे सवाल करेंगे। वही सवाल यहाँ भी जरूरी हैं। पारदर्शिता कमजोरी नहीं, ताकत होती है।
निजी कंपनियां और नई चुनौती
भारत ने हाल के सालों में निजी अंतरिक्ष कंपनियों को आगे बढ़ाया है। स्टार्टअप, छोटे सैटेलाइट, विदेशी क्लाइंट, यह सब पीएसएलवी की साख पर टिका था। जब दो बार लगातार नाकामी होती है तो विदेशी ग्राहक भी सोचने लगते हैं। वे पूछते हैं कि क्या हमारा पेलोड सुरक्षित रहेगा।
यह केवल तकनीकी नहीं बल्कि बाजार का सवाल भी है। अंतरिक्ष अब सिर्फ विज्ञान नहीं, व्यापार भी है। अगर भरोसा टूटा तो ग्राहक दूसरी जगह चले जाएंगे। तब नुकसान सिर्फ इसरो को नहीं, पूरे देश को होगा।
क्या यह सिर्फ बदकिस्मती है
कुछ लोग कह सकते हैं कि दो नाकामियां सिर्फ खराब किस्मत हैं। मगर विज्ञान में बार बार एक ही जगह गड़बड़ी होना पैटर्न बन जाता है। तीसरा चरण बार बार क्यों फेल हो रहा है, यह पूछना जरूरी है।
यह भी मुमकिन है कि डिजाइन को अपग्रेड करते वक्त कुछ नया रिस्क जुड़ गया हो। हर नई टेक्नोलॉजी अपने साथ अनिश्चितता लाती है। मगर तब सवाल यह है कि क्या टेस्टिंग उतनी सख्त थी जितनी होनी चाहिए थी।
इसरो की संस्कृति और भीतर की आवाजें
इसरो हमेशा टीमवर्क और ईमानदार आत्म समीक्षा के लिए जाना जाता रहा है। वैज्ञानिक खुल कर बोलते थे, जूनियर भी सीनियर से सवाल पूछ सकता था। अगर आज दबाव बढ़ा है, समय कम है, और राजनीतिक उम्मीदें ज्यादा हैं, तो यह संस्कृति कमजोर हो सकती है।
जब लक्ष्य सिर्फ समय पर लॉन्च करना बन जाए और सवाल पूछने की जगह कम हो जाए, तब गलतियां छिप सकती हैं। यह बात किसी पर आरोप नहीं है, बल्कि सिस्टम को आईना दिखाना है।
भविष्य की राह क्या हो
सबसे पहला कदम खुली जांच है। रिपोर्ट सार्वजनिक हो, विशेषज्ञों को बोलने दिया जाए, और मीडिया को सही जानकारी मिले। दूसरा, तीसरे चरण की पूरी डिजाइन और सप्लाई चेन की स्वतंत्र समीक्षा होनी चाहिए।
तीसरा, निजी कंपनियों के साथ मिल कर नई टेस्टिंग सुविधाएं बनानी होंगी। जैसे एक कार कंपनी हर नए मॉडल को हजारों किलोमीटर चलाकर परखती है, वैसे ही हर नए मोटर और नोजल को असली हालात में टेस्ट करना जरूरी है।
निराशा के बीच उम्मीद
इतिहास देखिए तो हर बड़े अंतरिक्ष कार्यक्रम ने नाकामियां देखी हैं। नासा, स्पेस एक्स, सबने गलतियां कीं। फर्क यह है कि उन्होंने उनसे सीखा। भारत भी सीख सकता है।
पीएसएलवी की 90 प्रतिशत से ज्यादा सफलता दर यूं ही नहीं बनी। यह मेहनत और दिमाग का नतीजा थी। अब वक्त है उसी ईमानदारी को फिर से जिंदा करने का।
एक आम नागरिक की नजर से
जब कोई किसान बीज बोता है और फसल खराब हो जाती है तो वह अगली बार मिट्टी और पानी दोनों पर ज्यादा ध्यान देता है। इसरो भी उसी मोड़ पर है। दो नाकामियां यह कह रही हैं कि जमीन को फिर से परखो।
अंतरिक्ष सिर्फ वैज्ञानिकों का सपना नहीं, यह देश का आत्मविश्वास है। अगर रॉकेट रास्ता भटकता है तो हमारी उम्मीदें भी हिलती हैं। इसलिए सवाल पूछना देशद्रोह नहीं, जिम्मेदारी है।
पीएसएलवी सी 62 की नाकामी एक चेतावनी है। यह बताती है कि तकनीक, प्रबंधन और पारदर्शिता तीनों को साथ चलना होगा। अगर इसरो इस मौके को सुधार में बदल ले तो भविष्य फिर से उजला हो सकता है। वरना छोटी दरार बड़ी खाई बन सकती है।





