
India and Gaza Peace Board diplomatic discussion illustration Shah Times
ग़ाज़ा, वॉशिंगटन और नई दिल्ली, अमन की मेज़ पर भारत की कुर्सी
ग़ाज़ा सीज़फायर के बाद की सियासत
अमेरिका ने ग़ाज़ा बोर्ड ऑफ पीस में भारत को शामिल होने का दावतनामा दिया है। यह पहल सीज़फायर के बाद शांति, प्रशासन और पुनर्निर्माण की दिशा में एक नया ढांचा पेश करती है। सवाल यह है कि भारत इस मंच पर किस भूमिका में उतरेगा और इसके रणनीतिक निहितार्थ क्या होंगे।
📍 New Delhi ✍️ Asif Khan
अमेरिका का दावतनामा साधारण कूटनीतिक औपचारिकता नहीं है। यह संकेत है कि वॉशिंगटन ग़ाज़ा के भविष्य की बातचीत में नई दिल्ली को एक असरदार आवाज़ के रूप में देख रहा है। सवाल उठता है कि यह भरोसा किस आधार पर है। शायद इसलिए कि भारत ने हाल के वर्षों में संघर्ष क्षेत्रों पर संयमित भाषा, मानवीय सहायता और संवाद की वकालत की है। यह वही संतुलन है जो ग़ाज़ा जैसे संवेदनशील मसले में अहम माना जाता है।
युद्धविराम और ज़मीनी सच्चाई
काग़ज़ पर युद्धविराम है, लेकिन ज़मीनी ख़बरें अलग कहानी सुनाती हैं। हमले रुकने की बात कही जा रही है, मगर आम लोग अब भी असुरक्षा में जी रहे हैं। यह विरोधाभास नया नहीं है। पहले भी समझौते हुए, घोषणाएँ हुईं, लेकिन हालात में ठोस बदलाव कम दिखा। ऐसे में बोर्ड ऑफ पीस का दावा तभी विश्वसनीय होगा जब वह सिर्फ़ योजना नहीं, बल्कि अमल का रास्ता दिखाए।
बोर्ड की संरचना और मंशा
यह बोर्ड रोज़मर्रा के प्रशासन को देखने वाली तकनीकी समिति का अवलोकन करेगा। सुनने में यह व्यवस्था व्यावहारिक लगती है। बिजली, पानी, अस्पताल, स्कूल जैसे बुनियादी सवाल बिना शोर-शराबे के सुलझाए जाएँ, यही सोच है। लेकिन इतिहास बताता है कि तकनीकी फैसले भी राजनीतिक संदर्भ से अलग नहीं होते। जब ज़मीन पर भरोसे की कमी हो, तब हर फ़ैसला शक़ की निगाह से देखा जाता है।
भारत के लिए अवसर
भारत अगर इस बोर्ड में सक्रिय भूमिका निभाता है, तो वह खुद को एक ज़िम्मेदार वैश्विक भागीदार के रूप में स्थापित कर सकता है। मान लीजिए, भारत ग़ाज़ा के अस्पतालों के पुनर्निर्माण या शिक्षा ढांचे में मदद करता है। यह सिर्फ़ सहायता नहीं होगी, यह भरोसा बनाने की कोशिश होगी। ऐसे छोटे लेकिन ठोस कदम अक्सर बड़ी कूटनीति से ज़्यादा असरदार होते हैं।
जोखिम भी कम नहीं
हर अवसर के साथ जोखिम आता है। ग़ाज़ा का मसला भावनाओं से भरा है। किसी भी पक्ष को लगे कि भारत झुकाव दिखा रहा है, तो उसकी छवि प्रभावित हो सकती है। भारत की परंपरागत नीति संतुलन की रही है। इस संतुलन को बनाए रखना आसान नहीं होगा, ख़ासकर तब जब बोर्ड का नेतृत्व अमेरिकी योजना के तहत हो।
वित्तीय शर्तों की बहस
स्थायी सदस्यता के लिए एक अरब डॉलर की शर्त चर्चा में है। यह आंकड़ा बड़ा है, लेकिन असली सवाल पैसा नहीं, पारदर्शिता है। क्या यह धन सच में पुनर्निर्माण पर खर्च होगा। क्या स्थानीय आबादी की राय ली जाएगी। अगर जवाब साफ़ नहीं हैं, तो किसी भी देश के लिए आगे बढ़ना मुश्किल होगा।
अमेरिकी दृष्टि से भारत
वॉशिंगटन भारत को एक ऐसे देश के रूप में देख रहा है जो पश्चिम और वैश्विक दक्षिण के बीच पुल बन सकता है। यह भूमिका सुनने में आकर्षक है। लेकिन पुल बनने का मतलब है दोनों ओर का दबाव सहना। भारत को तय करना होगा कि वह सिर्फ़ प्रतीकात्मक मौजूदगी चाहता है या वास्तविक प्रभाव।
स्थिरता बनाम प्रभुत्व
ग़ाज़ा में स्थिरता की बात अक्सर बाहरी ढांचे से की जाती है। सवाल यह है कि क्या यह स्थिरता स्थानीय स्वायत्तता के साथ आएगी या किसी नए प्रभुत्व के साथ। अगर बोर्ड ऑफ पीस स्थानीय आवाज़ों को जगह नहीं देता, तो वह एक और असफल प्रयोग बन सकता है।
छोटे उदाहरण, बड़े संकेत
कभी-कभी राजनीति को समझने के लिए छोटे दृश्य काफी होते हैं। जैसे किसी स्कूल का फिर से खुलना या किसी परिवार का सुरक्षित घर लौटना। अगर बोर्ड इन छोटे बदलावों को संभव बनाता है, तो उसकी विश्वसनीयता बढ़ेगी। अगर नहीं, तो वह सिर्फ़ काग़ज़ी संस्था रह जाएगा।
भारत की आंतरिक बहस
भारत के भीतर भी मतभेद होंगे। कुछ इसे वैश्विक नेतृत्व का मौका मानेंगे, कुछ अनावश्यक उलझाव। यह बहस स्वस्थ है। लोकतंत्र में ऐसे फैसले सवालों के बिना नहीं होते। ज़रूरी है कि निर्णय भावनाओं से नहीं, तथ्यों से हो।
वैकल्पिक दृष्टिकोण
एक दृष्टि यह भी है कि भारत को पूरी सदस्यता के बजाय पर्यवेक्षक की भूमिका चुननी चाहिए। इससे वह योगदान दे सकेगा, लेकिन सीधे विवाद में नहीं फँसेगा। दूसरी ओर, सक्रिय भूमिका से ही वास्तविक बदलाव संभव है। यह दुविधा आसान नहीं है।
भविष्य की कसौटी
आख़िरकार, बोर्ड ऑफ पीस की सफलता इस बात से मापी जाएगी कि एक साल बाद ग़ाज़ा में हालात कैसे हैं। अगर आम लोगों की ज़िंदगी बेहतर होती है, तो यह पहल सही दिशा में होगी। अगर नहीं, तो यह भी उन योजनाओं की सूची में जुड़ जाएगी जो अच्छी नीयत के बावजूद नाकाम रहीं।निष्कर्ष की जगह सवाल
शायद इस समय किसी अंतिम निष्कर्ष से ज़्यादा सवाल ज़रूरी हैं। भारत क्या सिर्फ़ आमंत्रण स्वीकार करेगा या शर्तें भी रखेगा। क्या यह बोर्ड सच में शांति लाएगा या सिर्फ़ समय खरीदेगा। इन सवालों के जवाब आने वाले महीनों में मिलेंगे। तब तक, यह निमंत्रण भारत के लिए एक दर्पण है, जिसमें उसे अपनी वैश्विक भूमिका साफ़ दिख सकती है।






