
Debate on Board of Peace and UN reform during Gaza conflict, Shah Times
गाज़ा, बोर्ड ऑफ पीस और यूएन सुधार: शांति की दो सोच
गाज़ा संकट ने दुनिया के सामने शांति के दो अलग रास्ते रख दिए हैं. एक त्वरित समाधान का, दूसरा दीर्घकालिक संस्थागत सुधार का. सवाल यह है कि टिकाऊ शांति किस दिशा से आएगी.
दुनिया इस वक्त शांति शब्द का इस्तेमाल बहुत कर रही है, लेकिन उसका मतलब हर जगह एक जैसा नहीं है. गाज़ा में युद्धविराम की खबरें आती हैं, फिर अगले ही दिन हिंसा की सूचनाएं सामने आ जाती हैं. यह विरोधाभास बताता है कि शांति केवल घोषणा से नहीं आती. यह एक प्रक्रिया है, और उस प्रक्रिया को कौन दिशा देता है, यही असली सवाल है.
यहां दो सोच साफ दिखाई देती हैं. एक सोच कहती है कि जब आग लगी हो तो पहले पानी डालो, बाद में इमारत की मरम्मत की बात करेंगे. दूसरी सोच मानती है कि अगर इमारत की बुनियाद कमजोर है, तो हर बार आग लगेगी. गाज़ा संकट ने इन दोनों नजरियों को आमने सामने ला दिया है.
बोर्ड ऑफ पीस: त्वरित समाधान की अपील
डोनाल्ड ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस इसी पहली सोच का प्रतिनिधित्व करता है. यह एक ऐसा मॉडल है जो तुरंत नतीजे चाहता है. इसमें व्यक्तिगत नेतृत्व, प्रभाव और संसाधनों के इस्तेमाल पर भरोसा दिखता है. विचार यह है कि जब बड़े फैसले कुछ ताकतवर लोग लेंगे, तो काम तेज़ होगा.
इस सोच में एक आकर्षण है. आम आदमी की तरह सोचें तो जब घर में झगड़ा होता है, तो पहले किसी बड़े को बुलाया जाता है जो तुरंत मामला शांत कराए. बोर्ड ऑफ पीस इसी बड़े की भूमिका निभाने का दावा करता है. गाज़ा जैसे इलाकों में, जहां हालात हर दिन बदलते हैं, त्वरित फैसले कभी कभी राहत भी दे सकते हैं.
लेकिन यही सोच अपने साथ सवाल भी लाती है. क्या शांति किसी एक बोर्ड या कुछ चुनिंदा लोगों के भरोसे छोड़ी जा सकती है. क्या जिनकी ज़िंदगी दांव पर है, उनकी आवाज़ बिना सुने कोई स्थायी समाधान निकल सकता है.
प्रतिनिधित्व का खालीपन
बोर्ड ऑफ पीस की सबसे बड़ी आलोचना यही है कि इसमें स्थानीय प्रतिनिधित्व कमजोर दिखता है. गाज़ा के संदर्भ में देखें तो जिन लोगों ने दशकों से संघर्ष झेला है, वे इस ढांचे में निर्णायक भूमिका में नहीं हैं. यह वैसा ही है जैसे किसी मोहल्ले के बारे में फैसला शहर के दूसरे कोने में बैठे लोग कर लें. नीयत सही हो सकती है, लेकिन ज़मीनी सच्चाई अक्सर छूट जाती है.
इतिहास बताता है कि बिना स्थानीय भागीदारी के बने समाधान लंबे समय तक नहीं टिकते. अफगानिस्तान से लेकर इराक तक, उदाहरण मौजूद हैं. यह सवाल इसलिए भी अहम है क्योंकि बोर्ड ऑफ पीस को लेकर यह धारणा बन रही है कि यह मौजूदा वैश्विक संस्थाओं के विकल्प की तरह पेश किया जा रहा है.
भारत की सोच: संस्थाएं क्यों मायने रखती हैं
दूसरी तरफ भारत की रणनीति है, जो शांति को संस्थागत ढांचे से जोड़कर देखती है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और विदेश मंत्री एस जयशंकर बार बार यह कहते रहे हैं कि संयुक्त राष्ट्र को आज की दुनिया के अनुरूप बनाना ज़रूरी है. यह कोई नई मांग नहीं है, लेकिन गाज़ा जैसे संकट इसे और प्रासंगिक बना देते हैं.
संयुक्त राष्ट्र पर अक्सर धीमे होने का आरोप लगता है. फैसले अटक जाते हैं, वीटो का इस्तेमाल होता है. यह सब सच है. लेकिन सवाल यह भी है कि क्या इसका मतलब यह है कि संस्था को कमजोर कर दिया जाए, या फिर उसे बेहतर बनाया जाए. भारत दूसरी राह की बात करता है.
एक साधारण उदाहरण लें. अगर किसी शहर का ट्रैफिक सिस्टम खराब है, तो समाधान यह नहीं कि ट्रैफिक पुलिस हटा दी जाए. समाधान यह है कि नियम बदले जाएं, सिग्नल ठीक किए जाएं, और सभी को प्रतिनिधित्व मिले. भारत की यूएन सुधार मांग इसी तर्क पर खड़ी है.
ग्लोबल साउथ की आवाज़
भारत और ब्राज़ील जैसे देशों की चिंता सिर्फ अपनी सीट तक सीमित नहीं है. यह उस बड़ी आबादी की आवाज़ है जो एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका में रहती है. आज के ज़्यादातर संघर्ष इन्हीं क्षेत्रों में हो रहे हैं, लेकिन फैसले लेने की ताकत अब भी पुराने ढांचे के पास है.
यहां एक नैतिक सवाल भी उठता है. क्या जिन देशों पर फैसलों का असर सबसे ज़्यादा पड़ता है, उन्हें निर्णय प्रक्रिया में बराबरी का हक़ नहीं होना चाहिए. भारत का तर्क है कि बिना इस संतुलन के, वैश्विक व्यवस्था पर भरोसा कमजोर होता जाएगा.
त्वरित बनाम टिकाऊ शांति
अब मूल सवाल पर लौटें. त्वरित शांति या टिकाऊ शांति. बोर्ड ऑफ पीस त्वरित समाधान का वादा करता है. यूएन सुधार टिकाऊ व्यवस्था की बात करता है. दोनों में से किसी एक को पूरी तरह गलत कहना आसान नहीं है. समस्या तब पैदा होती है जब त्वरित समाधान खुद को अंतिम समाधान मानने लगता है.
गाज़ा में अगर कुछ महीनों के लिए हिंसा रुक भी जाए, लेकिन राजनीतिक और संस्थागत मुद्दे जस के तस रहें, तो टकराव दोबारा लौट सकता है. वहीं, सिर्फ संस्थागत सुधार की बात करते रहना और ज़मीनी हालात को अनदेखा करना भी अमानवीय होगा.
क्या दोनों रास्ते साथ चल सकते हैं
शायद असली चुनौती यही है कि क्या दुनिया इन दोनों सोच को साथ लेकर चल सकती है. त्वरित राहत और दीर्घकालिक सुधार. यह आसान नहीं है, लेकिन असंभव भी नहीं. इसके लिए जरूरी है कि तात्कालिक पहलें संस्थाओं को कमजोर करने के बजाय उन्हें मजबूत करने की दिशा में काम करें.
अगर बोर्ड ऑफ पीस जैसे मंच स्थानीय आवाज़ों को शामिल करें और यूएन के साथ पारदर्शी सहयोग करें, तो टकराव कम हो सकता है. वहीं, यूएन को भी यह स्वीकार करना होगा कि आज की दुनिया तेज़ फैसले चाहती है.
आखिर में
गाज़ा संकट ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि शांति कोई एक फॉर्मूला नहीं है. यह बहस का विषय है, प्रयोग का क्षेत्र है, और जिम्मेदारी की परीक्षा है. ट्रंप का बोर्ड ऑफ पीस और भारत की यूएन सुधार रणनीति इसी बड़ी बहस के दो ध्रुव हैं.
दुनिया किस रास्ते पर जाएगी, यह सिर्फ नेताओं के फैसलों से तय नहीं होगा. यह इस बात पर भी निर्भर करेगा कि वैश्विक समुदाय किस तरह की शांति चाहता है. तात्कालिक राहत या टिकाऊ व्यवस्था. शायद सच्चाई इन दोनों के बीच कहीं है.




