
Finance Minister presenting Budget 2026 with focus on digital economy and customs duty changes | Shah Times
बजट 2026 का सच: राहत, जोखिम और डेटा की राजनीति
बजट 2026 में सरकार ने कस्टम ड्यूटी कटौती, टेक्नोलॉजी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़ा दांव खेला है. सवाल यह है कि ये फैसले आम नागरिक, उद्योग और भविष्य की अर्थव्यवस्था को कैसे प्रभावित करेंगे. यह संपादकीय उसी असर की परतें खोलता है.
बजट 2026 राहत और जोखिम दोनों लेकर आया है. कुछ वस्तुएं सस्ती होंगी, कुछ सेक्टर महंगे होंगे. क्लाउड और एआई पर टैक्स छूट भारत को डेटा हब बनाने की कोशिश है, लेकिन इसके सामाजिक और आर्थिक नतीजे तुरंत नहीं दिखेंगे.
बजट का पहला संदेश: राहत दिखती है, भरोसा नहीं
बजट 2026 का भाषण सुनते हुए पहली अनुभूति राहत की थी. कस्टम ड्यूटी घटाने की खबरें आम आदमी को तुरंत समझ आती हैं. जूते, कपड़े, मोबाइल बैटरियां, सोलर ग्लास जैसी चीजें सस्ती होंगी. सुनने में यह अच्छा लगता है. लेकिन यहीं रुकना ठीक नहीं. बजट सिर्फ कीमतों की सूची नहीं होता. यह एक सोच है, एक दिशा है, और कई बार एक जोखिम भी.
जब सरकार कहती है कि भारत में बनने वाली चीजों पर ड्यूटी घटाई जा रही है, तो मंशा साफ दिखती है. घरेलू मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देना. मगर सवाल यह है कि क्या हमारी फैक्ट्रियां इतनी तैयार हैं कि इस मौके का पूरा फायदा उठा सकें. अगर उत्पादन क्षमता नहीं बढ़ी, तो सस्ती चीजों का लाभ सीमित रह जाएगा.
सस्ती चीजें और आम घर का गणित
जूते, बैग, कपड़े. ये ऐसी चीजें हैं जो हर घर की जरूरत हैं. कच्चे चमड़े और उससे जुड़े सामान पर ड्यूटी कट का मतलब है कि बाजार में दाम कुछ नीचे आएंगे. लेकिन अनुभव बताता है कि हर टैक्स कट सीधे ग्राहक तक नहीं पहुंचता. बीच में सप्लाई चेन है, मुनाफा है, और कई बार मौका देखकर कीमत रोक लेने की आदत भी.
मोबाइल बैटरियां और लिथियम आयन सेल सस्ती होने से फोन की कीमत घट सकती है. लेकिन क्या कंपनियां यह बचत पूरी तरह ग्राहक को देंगी. शायद नहीं, या कम से कम तुरंत नहीं. यहां बजट का असर मनोवैज्ञानिक ज्यादा है. बाजार को संकेत मिलता है कि सरकार लागत कम करना चाहती है.
शिक्षा और विदेश पढ़ाई का फैसला
विदेश में पढ़ाई के लिए टीसीएस दर घटाकर दो प्रतिशत करना एक ऐसा फैसला है जो सीधे मिडल क्लास को छूता है. जिन परिवारों के बच्चे बाहर पढ़ने जाते हैं, उनके लिए यह राहत है. लेकिन यहां भी एक सवाल है. क्या यह कदम देश के भीतर उच्च शिक्षा को मजबूत करने के साथ जुड़ा है. अगर नहीं, तो यह सिर्फ बाहर जाने को आसान बना रहा है, अंदर सुधार को नहीं.
जहां महंगाई चुपचाप बढ़ेगी
बजट की हर कहानी में एक साइड नोट होता है. शराब, स्क्रैप और खनिज पर ड्यूटी बढ़ाना उसी नोट का हिस्सा है. शराब महंगी होगी, यह सरकार के लिए राजस्व का आसान रास्ता है. लेकिन स्क्रैप और खनिज पर बढ़ी ड्यूटी उद्योग की लागत बढ़ा सकती है. इसका असर स्टील, निर्माण और इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा. यानी कुछ चीजें सस्ती होंगी, तो कुछ की कीमत पीछे के रास्ते से बढ़ेगी.
डिजिटल दांव: क्लाउड और डेटा का खेल
बजट 2026 का सबसे चर्चित हिस्सा क्लाउड और एआई से जुड़ा फैसला है. विदेशी क्लाउड कंपनियों को 2047 तक टैक्स छूट, बशर्ते वे भारत के डेटा सेंटर इस्तेमाल करें. सुनने में यह एक दूरदर्शी कदम लगता है. सरकार भारत को डेटा और एआई का केंद्र बनाना चाहती है.
लेकिन यहां दो पहलू हैं. पहला आर्थिक. निवेश आएगा, बड़े डेटा सेंटर बनेंगे, नौकरियां पैदा होंगी. दूसरा राजनीतिक और सामाजिक. डेटा भारत में रहेगा, नियमों के दायरे में. इससे निगरानी आसान होगी. सवाल यह है कि संतुलन कैसे बनेगा.
आम यूजर के लिए इसका मतलब क्या है
ईमानदारी से कहें तो आम यूजर की जिंदगी कल से नहीं बदलेगी. यह नीति स्तर का फैसला है. असर धीरे आएगा. कुछ ऐप्स और वेबसाइट तेज हो सकती हैं, खासकर वीडियो और गेमिंग में. लेकिन हर यूजर को फर्क महसूस होगा, यह मान लेना जल्दबाजी है.
डिजिटल सर्विस की लागत कंपनियों के लिए कम हो सकती है. पर इतिहास बताता है कि बचत पहले बैलेंस शीट में जाती है, ग्राहक तक बाद में. कुछ सेवाएं सस्ती होंगी, कई वैसी ही रहेंगी.
डेटा सुरक्षा: भरोसा और सच्चाई
डेटा भारत में रहने से यह मान लिया गया है कि सुरक्षा बढ़ जाएगी. यह आधा सच है. नियमों का पालन आसान होगा, लेकिन सुरक्षा सिर्फ लोकेशन से नहीं आती. टेक्नोलॉजी, प्रोसेस और जवाबदेही भी उतनी ही जरूरी है. यूजर को यह समझना होगा कि डेटा देश में है, इसका मतलब यह नहीं कि वह पूरी तरह सुरक्षित है.
एआई और रोजगार का सवाल
सरकार का दावा है कि एआई पर फोकस से नौकरियां बनेंगी. यह सच भी है और अधूरा भी. कुछ नई नौकरियां आएंगी, खासकर टेक और सपोर्ट में. लेकिन एआई कई पारंपरिक नौकरियों को बदल भी देगा. बजट इस बदलाव को स्वीकार करता दिखता है, पर तैयारी का रोडमैप साफ नहीं करता.
डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और भविष्य
इंटरनेट, नेटवर्क, फाइव जी और आगे की तकनीक. इन सब पर निवेश बढ़ाना जरूरी था. बजट ने इस जरूरत को माना है. मजबूत नेटवर्क के बिना एआई और क्लाउड सिर्फ शब्द रह जाते हैं. यहां सरकार का रुख सकारात्मक है. लेकिन असली परीक्षा जमीन पर होगी. गांव, छोटे शहर और कमजोर नेटवर्क वाले इलाके अभी भी इंतजार में हैं.
बजट एक शुरुआत है, जवाब नहीं
बजट 2026 कई सवालों का जवाब नहीं देता, लेकिन बहस की दिशा तय करता है. सस्ती चीजें राहत देती हैं, डिजिटल फैसले भविष्य का संकेत हैं. फिर भी, हर वादा समय और अमल की कसौटी पर खरा उतरना होगा. आम आदमी के लिए असली बजट वह होता है जो उसकी रोजमर्रा की जिंदगी में दिखे. बाकी सब आंकड़े और भाषण हैं.




