
ईरान की रातें: जब खामोशी भी बम जैसी लगने लगे
जंग से पहले का ईरान: बाहर सुकून, भीतर बेचैनी
हमले की आशंका और ईरानी समाज का टूटा भरोसा
अमेरिकी हमले की आशंका ने ईरान के समाज को भीतर से हिला दिया है. सड़कों पर सामान्यता है, लेकिन दिलों में डर, अफवाह और अनिश्चितता का शोर है. यह विश्लेषण उसी अदृश्य दबाव को समझने की कोशिश है
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
ईरान और अमेरिका के दरमियान बढ़ते सैन्य तनाव ने आम ईरानियों की मानसिक शांति छीन ली है. राजनीतिक चालें, सैन्य तैनाती और कूटनीतिक बयानबाज़ी जंग की आहट पैदा कर रहे हैं. सवाल यह नहीं कि हथियार कितने हैं, सवाल यह है कि समाज कितना टूट चुका है.
खामोश शहर और बेचैन लोग
तेहरान की सुबह वैसी ही है जैसी हर दिन होती है. ट्रैफिक, स्कूल बसें, चाय की दुकानों पर हल्की गुफ़्तगू. लेकिन इस सुकून के नीचे एक अजीब सी घबराहट छुपी है. लोग खुलकर कुछ नहीं कहते, मगर आँखों में सवाल तैरते रहते हैं. क्या आज रात कुछ होगा. यह डर किसी अफ़वाह से शुरू होता है और फिर दिल में घर कर लेता है.
एक इंजीनियर मिलाद कहते हैं कि रात सबसे मुश्किल होती है. बिस्तर पर लेटकर इंसान अपने ख़यालों से लड़ता है. हर आवाज़ धमाके जैसी लगती है. यह सिर्फ़ फौजी तनाव नहीं, यह नफ़्सियाती दबाव है जो धीरे धीरे इंसान को थका देता है.
अफवाहें, सोशल मीडिया और टूटती नींद
आजकल जंगें सिर्फ़ बॉर्डर पर नहीं लड़ी जातीं. मोबाइल स्क्रीन भी एक मैदान बन चुकी है. सोशल मीडिया पर हर मैसेज, हर वीडियो एक नई कहानी गढ़ता है. कभी कहा जाता है कि हमला तय है, कभी बताया जाता है कि बस घंटे बचे हैं. सच्चाई क्या है, कोई नहीं जानता.
यहाँ एक आम मिसाल समझिए. जैसे अँधेरे कमरे में रस्सी को साँप समझ लिया जाए. डर असली लगता है, भले ही ख़तरा न हो. ईरान में यही हो रहा है. इंटरनेट बंदी के बाद जब नेटवर्क खुलता है, तो डर और तेज़ी से फैलता है. लोग दवाइयाँ, सूखा खाना जमा कर रहे हैं, सिर्फ़ एहतियात के नाम पर.
बाहर की सामान्यता, भीतर की टूटन
बाज़ार खुले हैं. पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें नहीं हैं. सरकार यही दिखाना चाहती है कि हालात कंट्रोल में हैं. लेकिन समाज का मूड कुछ और कहता है. बुज़ुर्ग शोहरेह पार्क में कसरत करती हैं, मगर बातचीत सिर्फ़ एक ही बात पर टिक जाती है. आज या कल.
यहाँ एक कड़वा सच सामने आता है. लगातार अनिश्चितता इंसान को अंदर से खोखला कर देती है. कुछ लोग कहते हैं कि हालात बदल जाएँ, चाहे जिस तरह. यह जुमला अपने आप में खतरनाक है, क्योंकि यह थकान और बेबसी का इज़हार है.
सियासत के मोहरे और आम आदमी
ईरान और अमेरिका की तनातनी कोई नई कहानी नहीं. लेकिन इस बार किरदार ज़्यादा हैं और दाँव भी बड़े. रजा पहलवी का नाम फिर चर्चा में है. अमेरिका में बैठकर ईरान में बदलाव की बातें करना आसान है. ज़मीन पर जीने वाले लोग इसकी कीमत चुकाते हैं.
अमेरिकी बयान सख़्त हैं, मगर उनमें दोहरा सुर भी है. एक तरफ़ दबाव, दूसरी तरफ़ बातचीत की बात. यह ambiguity जानबूझकर रखी जाती है. सवाल यह है कि क्या यह रणनीति सच में शांति लाती है या सिर्फ़ डर को बढ़ाती है.
फौजी तैनाती और शक्ति का प्रदर्शन
अमेरिकी नौसैनिक बेड़े की मौजूदगी महज़ सुरक्षा का दावा नहीं लगती. यह एक खुला संदेश है. ईरान इसे सीधी धमकी मानता है. जवाब में मिसाइलें, फास्ट बोट्स और होर्मुज में अभ्यास. यह सब एक शतरंज की बिसात जैसा है, जहाँ हर चाल जोखिम भरी है.
यहाँ तर्क और प्रतितर्क दोनों ज़रूरी हैं. अमेरिका कहता है कि यह deterrence है. ईरान कहता है कि यह provocation है. सच्चाई शायद इन दोनों के बीच कहीं है. लेकिन हर नई तैनाती गलती की गुंजाइश बढ़ा देती है. एक छोटा हादसा, और हालात हाथ से निकल सकते हैं.
रूस, चीन और बदलता संतुलन
रूस और चीन के साथ संयुक्त अभ्यास सिर्फ़ सैन्य गतिविधि नहीं, बल्कि एक सियासी संकेत है. ईरान अकेला नहीं दिखना चाहता. यह अमेरिका के लिए सीधा चैलेंज है. लेकिन यह भी सच है कि बड़े खिलाड़ी अक्सर छोटे समाजों की कीमत पर अपनी बाज़ी खेलते हैं.
यहाँ एक सवाल उठता है. क्या यह समर्थन ईरान को ज़्यादा सुरक्षित बनाता है, या उसे बड़े संघर्ष की तरफ़ धकेलता है. इतिहास बताता है कि alliances कभी कभी सुरक्षा कम और जोखिम ज़्यादा बढ़ा देते हैं.
क्या जंग तय है या अभी रास्ता बाकी है
विशेषज्ञों की राय बंटी हुई है. कुछ कहते हैं कि हमला सीमित होगा. कुछ मानते हैं कि जवाबी कार्रवाई इसे फैलने देगी. बीच में एक और रास्ता है, बातचीत का. यह रास्ता कम शोर करता है, इसलिए कमज़ोर लगता है.
ट्रंप का अंदाज़ हमेशा अनिश्चित रहा है. धमकी और डील, दोनों साथ चलते हैं. ईरान भी पूरी तरह झुकना नहीं चाहता. इस टकराव में सबसे ज़्यादा नुकसान उस आम आदमी का है, जो न नीति बनाता है, न युद्ध.
असली सवाल और अधूरा जवाब
आख़िर में सवाल हथियारों का नहीं, भरोसे का है. क्या अंतरराष्ट्रीय सियासत में इंसानी ज़िंदगियों की कोई क़ीमत है. ईरान की गलियों में बैठा इंसान यही सोच रहा है.
जंग मुमकिन है, मगर अनिवार्य नहीं. यह लाइन उम्मीद भी देती है और चेतावनी भी. अगर बात चीत ने जगह नहीं बनाई, तो डर हक़ीक़त बन सकता है. और तब इतिहास फिर लिखेगा कि चेतावनियाँ थीं, मगर सुनी नहीं गईं.




