
राहुल गांधी का भाषण और बीजेपी की आपत्ति: लोकसभा में क्या टूटा
लोकसभा हंगामा और दस्तावेज़ की सियासत का असल सवाल
लोकसभा में राहुल गांधी के भाषण पर बीजेपी की आपत्ति क्यों हुई, डोकलाम बहस में नियम, सियासत और टकराव का पूरा विश्लेषण पढ़िए।
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
लोकसभा में धन्यवाद प्रस्ताव पर हुई बहस अचानक नियम, दस्तावेज़ और राष्ट्रवाद की टकराहट बन गई। सवाल यह नहीं कि किसने क्या कहा, बल्कि यह है कि संसद में सच कहने की गुंजाइश कितनी बची है।राहुल गांधी के भाषण के दौरान हुए हंगामे ने एक बार फिर संसद की कार्यसंस्कृति पर बहस छेड़ दी। अप्रकाशित किताब, मैग्जीन लेख, स्पीकर की भूमिका और सत्तापक्ष की आपत्तियों के बीच असल मुद्दा पीछे छूट गया। यह संपादकीय उसी खाली जगह को भरने की कोशिश है।
संसद में हंगामा क्यों इतना आसान हो गया
संसद लोकतंत्र का दिल कही जाती है। दिल धड़कता है, शोर करता है, लेकिन जब धड़कन की जगह सिर्फ शोर रह जाए, तो सवाल उठता है। सोमवार को लोकसभा में जो हुआ, वह अचानक नहीं था। यह कई वर्षों से जमा हो रही सियासी बेचैनी का नतीजा है। जैसे ही विपक्ष का नेता खड़ा हुआ, शब्दों से पहले शंकाएं खड़ी कर दी गईं। यहां मुद्दा डोकलाम था, लेकिन बहस दस्तावेज़ों की वैधता पर फिसल गई। यह वही पुरानी कहानी है, जहां असहज सवाल आने पर प्रक्रिया को ढाल बना लिया जाता है।
दस्तावेज़ का सवाल या सवाल से डर
राहुल गांधी ने जिस किताब का हवाला दिया, वह प्रकाशित नहीं थी। सरकार ने यहीं से अपनी आपत्ति खड़ी की। नियमों की बात सही है, लेकिन सवाल यह है कि क्या संसद में केवल वही सच बोला जा सकता है, जिस पर सरकारी मुहर हो। आम ज़िंदगी में भी ऐसा होता है। मोहल्ले में अगर कोई अनुभव सुनाता है, तो हम पहले यह नहीं पूछते कि उसका प्रमाण सरकारी फाइल में है या नहीं। हम सुनते हैं, फिर तय करते हैं। संसद में यह सुनने की आदत कमजोर पड़ती दिख रही है।
स्पीकर की कुर्सी और उसकी सीमाएं
स्पीकर ने नियम याद दिलाए। यह उनकी जिम्मेदारी है। लेकिन स्पीकर केवल रेफरी नहीं, लोकतंत्र के संरक्षक भी होते हैं। जब एक पक्ष लगातार बाधा डाले और दूसरा बोलने की जिद करे, तो संतुलन कठिन हो जाता है। यहां सवाल यह नहीं कि स्पीकर सही थे या गलत, बल्कि यह कि क्या नियमों की व्याख्या इतनी सख्त हो गई है कि बहस ही दम तोड़ दे।
डोकलाम एक भूगोल नहीं, एक भावना
डोकलाम केवल नक्शे की एक जगह नहीं है। यह भरोसे, सुरक्षा और पारदर्शिता से जुड़ा विषय है। जब कोई नेता इस पर सवाल उठाता है, तो स्वाभाविक है कि भावनाएं उफनें। सत्तापक्ष ने पूर्व सेना प्रमुख के पुराने बयान दिखाए, जिसमें कहा गया कि एक इंच जमीन नहीं गई। यह बयान अपनी जगह है। लेकिन लोकतंत्र में पुराने बयान अंतिम सत्य नहीं होते। सवाल पूछना देशद्रोह नहीं, बल्कि सतर्कता का संकेत है।
विपक्ष की भूमिका पर असहजता
विपक्ष का काम सिर्फ सरकार की तारीफ करना नहीं होता। उसका काम असुविधाजनक सवाल उठाना है। जब भी विपक्ष यह करता है, उसे देशहित के खिलाफ खड़ा कर दिया जाता है। यह आसान रास्ता है। लेकिन यह रास्ता लंबी दूरी तक लोकतंत्र को थका देता है। अगर हर सवाल पर हंगामा होगा, तो बहस की जगह सिर्फ आरोप बचेंगे।
सरकार का तर्क और उसकी मजबूती
सरकार यह कहती है कि राष्ट्रीय सुरक्षा पर गैर सत्यापित सामग्री नहीं पढ़ी जा सकती। यह तर्क पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। सुरक्षा संवेदनशील विषय है। लेकिन यहां संतुलन जरूरी है। अगर हर असहज तथ्य को असत्य कहकर खारिज कर दिया जाएगा, तो भरोसा कैसे बनेगा। भरोसा आदेश से नहीं, संवाद से बनता है।
संसद का गिरता धैर्य
करीब चवालीस मिनट तक भाषण की कोशिश और लगातार शोर। यह दृश्य नया नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में संसद का धैर्य छोटा हुआ है। जैसे सोशल मीडिया पर लोग पूरी बात पढ़े बिना प्रतिक्रिया दे देते हैं, वैसे ही संसद में भी आधी बात पर हंगामा शुरू हो जाता है। फर्क बस इतना है कि संसद का शोर देश की दिशा तय करता है।
जब नियम हथियार बन जाएं
नियम लोकतंत्र की रीढ़ हैं। लेकिन जब नियमों का इस्तेमाल केवल रोकने के लिए हो, तो वे हथियार बन जाते हैं। सवाल यह नहीं कि नियम हैं या नहीं। सवाल यह है कि उनका इस्तेमाल किस भावना से हो रहा है। अगर नियम बहस को बेहतर बनाने के लिए हों, तो वे उपयोगी हैं। अगर वे बहस रोकने के लिए हों, तो लोकतंत्र कमजोर होता है।
जनता क्या देख रही है
संसद का हर दृश्य जनता देखती है। वह यह नहीं गिनती कि किसने कौन सा नियम तोड़ा। वह यह देखती है कि उसके सवालों की बात हुई या नहीं। किसान, जवान, छात्र, कारोबारी। सबके मन में चीन, सीमा और सुरक्षा को लेकर सवाल हैं। जब संसद उन सवालों से बचती दिखती है, तो भरोसा दरकता है।
वैकल्पिक रास्ता क्या हो सकता था
कल्पना कीजिए, अगर राहुल गांधी को यह कहने दिया जाता कि उनके सवाल का सार क्या है, बिना किताब पढ़े। सरकार जवाब देती, बिना शोर के। बहस होती, रिकॉर्ड में जाती। असहमति रहती, लेकिन गरिमा बची रहती। यह असंभव नहीं था। बस इच्छा की कमी थी।
सियासत और राष्ट्रीय सुरक्षा की रेखा
राष्ट्रीय सुरक्षा को राजनीति से ऊपर होना चाहिए। यह वाक्य सुनने में अच्छा लगता है, लेकिन व्यवहार में कठिन है। हर सरकार सुरक्षा को अपनी उपलब्धि और हर विपक्ष उसे अपनी चिंता बनाता है। सच इन दोनों के बीच कहीं होता है। संसद का काम उस बीच के सच को ढूंढना है, न कि एक पक्ष चुनना।
आखिर में असली सवाल
इस पूरे घटनाक्रम का असली सवाल यह नहीं कि किस किताब का हवाला दिया गया। असली सवाल यह है कि क्या हमारी संसद सवाल सुनने के लिए तैयार है। अगर जवाब हां है, तो शोर कम करना होगा। अगर जवाब नहीं है, तो फिर हंगामा ही हमारी नई भाषा बन जाएगा। और तब नुकसान किसी एक दल का नहीं, लोकतंत्र का होगा।




