
भारत–अमेरिका ट्रेड डील: राहत भी, शर्तें भी
अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर लगाया गया अतिरिक्त पच्चीस प्रतिशत टैरिफ हटाया है, लेकिन रूसी तेल आयात पर सख्त चेतावनी बरकरार रखी है। दोनों देशों के बीच अंतरिम व्यापार ढांचे से बाजार पहुंच, कीमतों और सप्लाई चेन पर क्या असर पड़ेगा,भारत और अमेरिका के बीच अंतरिम समझौते ने कई उद्योगों को राहत दी है। टैरिफ हटने से कीमतें घटेंगी, निर्यात बढ़ेगा और अमेरिकी बाजार तक पहुंच आसान होगी। साथ ही रूसी तेल पर शर्तें भारत की रणनीतिक आज़ादी पर सवाल भी खड़े करती हैं,यही इस विश्लेषण का केंद्र है
📍New Delhi ✍️ Asif Khan
टैरिफ हटना, पर शर्तों की परछाईं
अमेरिकी प्रशासन ने भारत पर लगाया गया अतिरिक्त पच्चीस प्रतिशत टैरिफ हटा दिया है। कागज़ पर यह बड़ी राहत दिखती है। निर्यातक खुश हैं, बाज़ार में उम्मीद का शोर है। लेकिन साथ ही एक सख्त चेतावनी भी है। अगर भारत रूस से तेल का प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष आयात दोबारा शुरू करता है, तो वही टैरिफ लौट सकता है। यहीं से कहानी सीधी नहीं रहती। राहत के साथ शर्तें जुड़ी हों, तो सवाल पूछना ज़रूरी हो जाता है।
व्हाइट हाउस का आदेश और निगरानी का ढांचा
नए कार्यकारी आदेश में कहा गया है कि वाणिज्य मंत्री, राज्य और खजाना विभाग के साथ मिलकर लगातार निगरानी करेंगे। यह सिर्फ एक प्रशासनिक पंक्ति नहीं है। इसका मतलब है कि भारत की ऊर्जा नीति अब सिर्फ घरेलू ज़रूरतों से नहीं, बल्कि वॉशिंगटन की नज़र से भी तय होगी। यहां समझना होगा कि निगरानी शब्द जितना तकनीकी लगता है, उतना ही सियासी भी है।
मोदी–ट्रंप वार्ता और संयुक्त बयान
दो फरवरी को हुई प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति डोनल्ड ट्रंप की वार्ता के बाद दोनों देशों ने संयुक्त बयान जारी किया। बयान में सहयोग, भरोसे और साझेदारी की भाषा है। कहा गया कि यह समझौता दोनों देशों के लिए फायदेमंद होगा। लेकिन हर संयुक्त बयान की तरह इसमें भी कुछ बातें खुलकर कही गईं, कुछ इशारों में छोड़ी गईं।
किसानों की चिंता और भरोसे का दावा
सरकार का कहना है कि पारंपरिक अनाज और दुग्ध उत्पाद करने वाले किसानों को डरने की ज़रूरत नहीं है। गेहूं, चावल, दूध, पनीर और केले जैसे उत्पादों के आयात की अनुमति नहीं दी गई है। यह बात राहत देती है। गांव के किसान के लिए यह समझना आसान है कि उसकी फसल पर सीधा असर नहीं पड़ेगा। लेकिन साथ ही पशुचारा, सोयाबीन तेल, वाइन और कुछ फलों का आयात बढ़ेगा। यहां सवाल उठता है कि क्या अप्रत्यक्ष असर लंबे समय में महसूस होगा।
ट्रंप की घोषणा और भारतीय प्रतिक्रिया
राष्ट्रपति ट्रंप ने टैरिफ हटाने की घोषणा करते हुए दावा किया कि भारत ने रूस से पेट्रोलियम उत्पाद न खरीदने का वादा किया है। भारत सरकार ने इस पर सीधे शब्दों में खंडन या पुष्टि नहीं की। वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने इसे ऐतिहासिक कदम बताया। उनके अनुसार इससे भारतीय निर्यातकों के लिए दुनिया की सबसे बड़ी इकॉनमी के दरवाज़े खुलेंगे। यह दावा मजबूत है, लेकिन इसकी कीमत क्या है, यह बहस का विषय बना रहेगा।
कीमतें घटेंगी, पर किस कीमत पर
अमेरिका से आने वाली मशीनरी, इलेक्ट्रॉनिक्स, ड्राई फ्रूट्स, सोयाबीन तेल और शराब सस्ती होंगी। उपभोक्ता के तौर पर यह अच्छी खबर है। एक आम परिवार के लिए सस्ता इलेक्ट्रॉनिक सामान तुरंत फायदा देता है। लेकिन घरेलू उद्योगों के लिए मुकाबला भी बढ़ता है। सवाल यह है कि क्या हमारे उद्योग इतने तैयार हैं कि इस मुकाबले में टिक सकें।
निर्यात में अवसर और प्रतिस्पर्धा
ऑटोमोबाइल, विमानन पुर्जे, जेनेरिक दवाइयां और रत्न व आभूषण क्षेत्र को सबसे ज्यादा फायदा मिलने की बात कही जा रही है। अमेरिका में अठारह प्रतिशत का टैरिफ कुछ क्षेत्रों पर लागू होगा, जो अन्य एशियाई देशों से कम है। इससे भारतीय निर्यातकों को बढ़त मिल सकती है। लेकिन टेक्सटाइल और चमड़ा उद्योग के लिए यह राहत अधूरी लगती है।
अंतरिम समझौते की शर्तें
अंतरिम समझौते में कहा गया है कि अमेरिका कई अहम भारतीय उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क हटाएगा। बदले में भारत को ऑटोमोबाइल पुर्जों के लिए विशेष कोटा मिलेगा। यह लेनदेन सीधा दिखता है, लेकिन इसमें संतुलन बनाना आसान नहीं। कोटा आज राहत है, कल सीमा भी बन सकता है।
श्रम, रोज़गार और सामाजिक असर
सरकार का कहना है कि इससे एमएसएमई, किसान, मछुआरे, महिलाएं और युवा लाभान्वित होंगे। निर्यात बढ़ेगा, रोज़गार के मौके बनेंगे। यह सुनने में अच्छा लगता है। लेकिन ज़मीनी हकीकत में यह तभी संभव है जब कौशल, इंफ्रास्ट्रक्चर और फाइनेंस साथ चलें। सिर्फ बाज़ार खुलने से अपने आप रोज़गार नहीं बनता।
पशुचारे का मुद्दा और डेयरी सेक्टर
भारत में पशुचारे की कमी एक पुरानी समस्या है। अमेरिका से पशुचारा आयात खोलने से लागत घट सकती है। डेयरी किसान को राहत मिल सकती है। लेकिन यह भी सोचना होगा कि क्या हम अपनी कृषि नीति को इतना निर्भर बनाना चाहते हैं। आत्मनिर्भरता का सवाल यहां खुद सामने आ जाता है।
ऊर्जा सुरक्षा और रूसी तेल
रूसी तेल सस्ता है और संकट के समय भारत के काम आया है। अब उस पर शर्त लगना सिर्फ व्यापारिक फैसला नहीं है। यह रणनीतिक आज़ादी से जुड़ा मुद्दा है। अगर कल किसी और क्षेत्र में भी ऐसी शर्तें आईं, तो भारत कैसे संतुलन बनाएगा। यही वह जगह है जहां सवाल पूछना ज़रूरी है।
टेक्नोलॉजी और सप्लाई चेन
दोनों देश टेक्नोलॉजी कारोबार और सप्लाई चेन को मजबूत करने पर सहमत हुए हैं। डेटा सेंटर, जीपीयू और उन्नत उत्पाद इसमें शामिल हैं। यह भविष्य की दिशा दिखाता है। लेकिन टेक्नोलॉजी में साझेदारी तभी टिकाऊ होती है जब ज्ञान और उत्पादन दोनों में बराबरी हो।
नतीजे से पहले सवाल
यह समझौता राहत देता है, मौके खोलता है, लेकिन सीमाएं भी खींचता है। क्या भारत इन शर्तों के साथ अपने हित साध पाएगा। क्या यह डील दीर्घकाल में संतुलित रहेगी। जवाब अभी साफ नहीं हैं। इतना तय है कि यह सिर्फ टैरिफ हटने की खबर नहीं है, यह भारत की आर्थिक और रणनीतिक दिशा पर एक बड़ा संकेत है।





