
कनाडा में बदला रुख, अजीत डोभाल ने खालिस्तानी नेटवर्क को घेरा
अजीत डोभाल के दबाव में कनाडा, खालिस्तानी नेटवर्क पर सख्ती तय
अजीत डोभाल और कनाडा के सुरक्षा नेतृत्व के बीच हुई बातचीत ने खालिस्तानी नेटवर्क पर ओटावा के नजरिये को बदल दिया है। अब इन गतिविधियों को फ्री स्पीच नहीं, बल्कि संगठित अपराध माना जा रहा है।
📍 Ottawa ✍️ Asif Khan
कनाडा का यू-टर्न: खालिस्तानी नेटवर्क पर कूटनीति की सर्जिकल चाल
रिश्तों की जमी बर्फ
भारत और कनाडा के ताल्लुक़ात पिछले कुछ बरसों से अजीब सन्नाटे में थे। बाहर से मुस्कान थी, अंदर अविश्वास। दिल्ली बार बार कहती रही कि ओटावा की ज़मीन पर कुछ ऐसे नेटवर्क पनप रहे हैं जो भारत की एकता को चुनौती देते हैं। जवाब में कनाडा अक्सर यही दोहराता रहा कि यह सब तआबीर और इज़हार की आज़ादी का मामला है। लेकिन सवाल यह था कि जब इज़हार बंदूक, धमकी और ड्रग मनी से जुड़ जाए, तब क्या वह आज़ादी रह जाती है। यही सवाल अब इस पूरे विमर्श के केंद्र में है।
कूटनीति का बदलता मिज़ाज
अजीत डोभाल की हालिया बातचीत को साधारण मीटिंग कहना हक़ीक़त से दूर होगा। यह एक तरह की सर्जिकल कूटनीति थी। न शोर, न कैमरे, बस टेबल पर रखे गए ठोस तथ्य। ओटावा के लिए यह पल आत्ममंथन का था। यह मान लेना आसान नहीं था कि जिन समूहों को अब तक राजनीतिक आवाज़ माना गया, वे असल में संगठित अपराध का चेहरा हैं। लेकिन जब सबूत सामने हों, तब इनकार भी अपनी साख खो देता है।
फ्री स्पीच बनाम पब्लिक सेफ्टी
यहां एक बुनियादी टकराव दिखता है। हर लोकतंत्र अभिव्यक्ति की आज़ादी पर गर्व करता है। लेकिन हर आज़ादी की एक सीमा होती है। अगर कोई समूह सोशल मीडिया पर नफरत फैलाए, फंड इकट्ठा करे, हथियार खरीदे और हिंसा की योजना बनाए, तो उसे किस खांचे में रखा जाए। अब कनाडा ने साफ कहा है कि ऐसे मामलों में पब्लिक सेफ्टी प्राथमिकता होगी। यह बदलाव सिर्फ भारत के लिए नहीं, खुद कनाडा के लिए भी अहम है।
संगठित अपराध की पहचान
डोभाल ने जिस बिंदु पर ज़ोर दिया, वह था नेटवर्क की फाइनेंसिंग। ड्रग तस्करी, खासकर फेंटानिल, सिर्फ एक स्वास्थ्य संकट नहीं, बल्कि सुरक्षा संकट भी है। जब नशे का पैसा राजनीति को फंड करे, तब मामला विचारधारा से आगे बढ़ जाता है। कनाडा में यह सच धीरे धीरे स्वीकार किया जा रहा है कि इन नेटवर्क्स का ढांचा गैंग्स जैसा है। भर्ती, फंडिंग, डराना धमकाना, सब कुछ एक पैटर्न में चलता है।
रियल टाइम इंटेलिजेंस का मतलब
अब बात सिर्फ बयानबाज़ी तक सीमित नहीं है। सिक्योरिटी और लॉ एनफोर्समेंट संपर्क अधिकारियों की तैनाती एक ठोस कदम है। इसका मतलब यह हुआ कि सूचनाएं फाइलों में नहीं सड़ेंगी। अगर वैंकूवर या ब्रैम्पटन में कुछ पक रहा है, तो उसकी भनक दिल्ली तक पहुंचेगी। यह भरोसे की वह डोर है जो पिछले वर्षों में कमजोर पड़ गई थी।
साइबर स्पेस की जंग
आज की लड़ाई मैदान में कम, स्क्रीन पर ज़्यादा लड़ी जाती है। ऑनलाइन कट्टरता, डिजिटल चंदा और वर्चुअल धमकियां किसी सीमा को नहीं मानतीं। कनाडा का यह मानना कि साइबर पॉलिसी पर समन्वय ज़रूरी है, देर से लिया गया लेकिन सही फैसला है। सवाल यह है कि क्या यह निगरानी संतुलित रहेगी। न तो निर्दोष आवाज़ें दबें, न ही नफरत की दुकानें खुली रहें।
प्रवासी समुदाय की चुप्पी
एक कम चर्चा में रहने वाला पहलू प्रवासी भारतीयों की हालत है। कई परिवार सालों से दबाव में जी रहे थे। चंदा न देने पर धमकी, विरोध करने पर सामाजिक बहिष्कार। ये बातें अक्सर बाहर नहीं आतीं। अगर कनाडा सच में इन नेटवर्क्स पर शिकंजा कसता है, तो सबसे बड़ी राहत इन्हीं आम लोगों को मिलेगी। यही कसौटी होगी कि बदलाव ज़मीन पर कितना उतरता है।
काउंटरपॉइंट: क्या यह स्थायी है
यह सवाल उठना लाज़मी है। क्या यह यू टर्न किसी एक सरकार या एक नेतृत्व तक सीमित है। राजनीति में रुख बदलते देर नहीं लगती। अगर कल दबाव कम हुआ, तो क्या ओटावा फिर पुराने तर्कों पर लौटेगा। भारत को भी यह समझना होगा कि कूटनीति में सतर्कता स्थायी साथी है। भरोसा बने, लेकिन आंखें खुली रहें।
व्यापार और सुरक्षा का रिश्ता
मार्च में होने वाला उच्च स्तरीय दौरा सिर्फ प्रतीकात्मक नहीं है। ऊर्जा, खनिज और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्र भविष्य की कहानी लिखेंगे। लेकिन डोभाल का संदेश साफ था। व्यापार और आतंक एक साथ नहीं चल सकते। यह सीधी बात है, और शायद इसी सीधापन ने असर किया। जब आर्थिक साझेदारी दांव पर हो, तब सुरक्षा को नज़रअंदाज़ करना किसी के हित में नहीं।
भारत की रणनीति का सबक
यह पूरा प्रकरण एक बड़ा सबक देता है। शोरगुल वाली डिप्लोमेसी हमेशा कारगर नहीं होती। कभी कभी शांत कमरे में रखे गए तथ्य ज़्यादा बोलते हैं। भारत ने यहां भावनाओं से नहीं, डेटा से बात की। यही वजह है कि आरोप प्रत्यारोप की जगह अब सहयोग की भाषा सुनाई दे रही है।
आगे की राह
अब असली परीक्षा शुरू होती है। वादों को अमल में बदलना, नेटवर्क्स पर केस बनाना, और कानूनी प्रक्रिया को अंजाम तक पहुंचाना। अगर यह सब हुआ, तो यह सिर्फ भारत कनाडा रिश्तों की जीत नहीं होगी, बल्कि उस विचार की जीत होगी कि लोकतंत्र खुद को बचाने के लिए सख्ती दिखा सकता है।
आख़री सोच
कनाडा का बदला हुआ रुख किसी एहसान का नतीजा नहीं, बल्कि बदलती हक़ीक़त की पहचान है। खालिस्तानी नेटवर्क को राजनीतिक आंदोलन कहना खुद लोकतंत्र के साथ नाइंसाफी थी। अब जब तस्वीर साफ हो रही है, तो उम्मीद है कि यह स्पष्टता टिकाऊ साबित होगी। कूटनीति का असली इम्तिहान यहीं है।





