
सुप्रीम कोर्ट का रुख सराहनीय, देश की एकता जरूरी- अरशद मदनी
उदयपुर फाइल्स पर अरशद मदनी की कानूनी जंग को मिली राहत
उदयपुर फाइल्स पर सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी: अभिव्यक्ति की आज़ादी बनाम सामाजिक सौहार्द
New Delhi,(Shah Times)। सुप्रीम कोर्ट ने ‘उदयपुर फाइल्स’ फिल्म की रिलीज़ पर रोक को बरकरार रखते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमाओं के साथ आती है। मौलाना अरशद मदनी ने इसे देश की शांति के लिए सही कदम बताया।
भूमिका: जब फिल्म बनाम संवैधानिक मर्यादाएं आमने-सामने हों
भारत के न्यायिक इतिहास में जब भी किसी रचनात्मक अभिव्यक्ति और सामाजिक सौहार्द के बीच टकराव होता है, तब अदालत की भूमिका अत्यंत निर्णायक हो जाती है। “उदयपुर फाइल्स” फिल्म को लेकर सुप्रीम कोर्ट में चल रही सुनवाई उसी संवेदनशील समीकरण को उजागर करती है, जहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम देश की एकता और कानून व्यवस्था के बीच संतुलन बनाने की कोशिश की जा रही है।
फिल्म पर अदालत की प्राथमिक टिप्पणी: जोखिम का संकेत
सुप्रीम कोर्ट ने 16 जुलाई 2025 को “उदयपुर फाइल्स” के रिलीज़ पर रोक बरकरार रखते हुए यह साफ संकेत दिया कि फिल्म की सामग्री और उसका संभावित सामाजिक असर न्यायपालिका की चिंताओं में है। वरिष्ठ वकील गौरव भाटिया द्वारा सेंसर सर्टिफिकेट के आधार पर फिल्म रिलीज़ की मांग को अदालत ने ठुकरा दिया। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय मौलाना अरशद मदनी की पुनर्विचार याचिका पर निर्णय नहीं करता, तब तक फिल्म पर लगे स्टे को हटाना उचित नहीं होगा।
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मौलाना अरशद मदनी की भूमिका और अदालत की सहमति
जमीयत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष मौलाना अरशद मदनी ने फिल्म को लेकर पहले दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी, जिसमें उन्होंने फिल्म के आपत्तिजनक अंशों पर रोक लगाने की मांग की। हाईकोर्ट ने केवल दो दिन में फिल्म पर अंतरिम रोक लगाते हुए सेंसिटिव कंटेंट को हटाने का निर्देश दिया। सुप्रीम कोर्ट ने इसी आधार पर कहा कि चूंकि मामला अभी मंत्रालय के समक्ष लंबित है, इसलिए जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लिया जा सकता।
मौलाना मदनी ने अदालत की इस समझदारी पर संतोष जताते हुए कहा कि फिल्म का मौजूदा स्वरूप देश की शांति और कानून व्यवस्था को प्रभावित कर सकता है। उन्होंने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी—“फिल्म की देरी से कोई हानि नहीं होगी, लेकिन अगर रिलीज़ से सामाजिक सौहार्द बिगड़ा तो यह बड़ा नुकसान होगा”—उनकी कानूनी लड़ाई को मजबूत करती है।
कपिल सिब्बल की आपत्ति: फिल्म में घृणा और पक्षपात का आरोप
सुनवाई के दौरान वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल, जो मौलाना मदनी की ओर से कोर्ट में पेश हुए, ने कहा कि उन्होंने स्वयं यह फिल्म देखी है और यह एक विशेष समुदाय के खिलाफ नफरत को बढ़ावा देती है। सिब्बल ने आग्रह किया कि कोर्ट स्वयं फिल्म देखे ताकि वह यह समझ सके कि इसका प्रभाव कितना विषैला हो सकता है। उनका कहना था कि जो भी जज इस फिल्म को देखेगा, वह इसकी रिलीज़ की अनुमति नहीं देगा।
फिल्म निर्माताओं की आपत्तियां और कोर्ट की असहमति
फिल्म निर्माता की ओर से वकील गौरव भाटिया ने दलील दी कि फिल्म को सेंसर बोर्ड से प्रमाणपत्र मिल चुका है और रिलीज़ रुकने से आर्थिक नुकसान हो रहा है। उन्होंने दिल्ली हाईकोर्ट के आदेश को असंवैधानिक बताया। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने इन दलीलों को नामंज़ूर करते हुए कहा कि मामले की गंभीरता को देखते हुए न्यायिक प्रक्रिया को समय दिया जाना चाहिए।
न्यायपालिका पर फिल्म की टिप्पणियां और लंबित मामलों का ज़िक्र
एक और अहम पहलू यह रहा कि वरिष्ठ वकील मेनका गुरुस्वामी ने सुप्रीम कोर्ट को बताया कि फिल्म में न केवल एक समुदाय के विरुद्ध नफरत फैलाई गई है, बल्कि न्यायपालिका पर भी आपत्तिजनक टिप्पणियां की गई हैं। इसके अलावा फिल्म में ज्ञानवापी और कन्हैयालाल हत्याकांड जैसे मामलों का ज़िक्र भी है जो अभी न्यायिक प्रक्रिया में हैं। उन्होंने आशंका जताई कि फिल्म की रिलीज़ निष्पक्ष ट्रायल को प्रभावित कर सकती है।
फिल्म की समीक्षा और निष्पक्ष न्याय की चुनौती
यह मामला उन जटिल परिस्थितियों की मिसाल है, जहां एक ओर फिल्म निर्माता अपनी रचनात्मक अभिव्यक्ति की आज़ादी की दुहाई देते हैं, वहीं दूसरी ओर याचिकाकर्ता इस अभिव्यक्ति को घृणा फैलाने वाला मानते हैं। जब कोई रचना न्यायपालिका पर टिप्पणी करती है या लंबित मामलों को अपने कथानक में शामिल करती है, तो यह न्याय की निष्पक्षता को खतरे में डाल सकता है।
अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बनाम सामाजिक जिम्मेदारी
भारतीय संविधान अनुच्छेद 19(1)(a) के तहत सभी नागरिकों को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता दी गई है, लेकिन अनुच्छेद 19(2) के तहत इस पर कुछ युक्तिसंगत प्रतिबंध भी लगाए जा सकते हैं, जैसे कि देश की एकता, सार्वजनिक व्यवस्था, नैतिकता आदि की रक्षा के लिए। ‘उदयपुर फाइल्स’ जैसे मामलों में यही संघर्ष सामने आता है—अभिव्यक्ति की आज़ादी और सामाजिक जिम्मेदारी के बीच संतुलन।
आने वाले फैसले की दिशा
फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने अगली सुनवाई की तारीख 21 जुलाई तय की है, लेकिन अब इस मामले ने न केवल न्यायपालिका के विवेक की परीक्षा ली है, बल्कि यह भी स्पष्ट कर दिया है कि भारत जैसे विविधताओं वाले लोकतंत्र में कोई भी रचना—चाहे वह फिल्म हो या लेख—ऐसी होनी चाहिए जो समाज को जोड़ने का काम करे, न कि तोड़ने का।
मौलाना अरशद मदनी की ओर से उठाए गए मुद्दे केवल एक समुदाय की चिंता नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की नींव को सुरक्षित रखने की कोशिश हैं। अदालत का रुख यह दिखाता है कि देश की न्याय व्यवस्था अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सामाजिक सौहार्द दोनों को लेकर संवेदनशील है।




