मुजफ्फरनगर की एक दोना-पत्तल फैक्ट्री में 13 मजदूरों को बंधक बनाकर महीनों तक यातनाएं दी गईं। मजदूरों से जबरन काम कराया जाता था और विरोध करने पर उन्हें हंटर, डंडे और गर्म भाले से दागा जाता था। पुलिस ने 22 जून को छापेमारी कर मजदूरों को मुक्त कराया और दो आरोपियों को गिरफ्तार किया, जबकि मुख्य आरोपी फरार है।
मुजफ्फरनगर के एक छोटे से गांव की फैक्ट्री में चल रही क्रूरता की कहानी किसी हॉरर फिल्म से कम नहीं है। यहां काम करने वाले मजदूरों के लिए हर दिन एक नई यातना लेकर आता था। न कोई आज़ादी, न कोई आवाज़—बस डर, दर्द और बेबसी। जब पुलिस ने छापा मारा, तो अंदर का मंजर देखकर हर कोई सन्न रह गया। इंसानियत को शर्मसार कर देने वाले जख्म हर मजदूर के शरीर पर साफ दिखाई दे रहे थे।
तितावी क्षेत्र के माड़ी गांव में स्थित ‘किसान सरकार हाउस’ नाम की दोना-पत्तल फैक्ट्री में मजदूरों को बंधक बनाकर रखा गया था। उन्हें 10 से 12 हजार रुपए की नौकरी का लालच देकर लाया गया, लेकिन बाद में उनकी जिंदगी नरक बना दी गई। मजदूरों से 24 घंटे काम कराया जाता था। विरोध करने पर हंटर, बेल्ट और लोहे की रॉड से पीटा जाता था। इतना ही नहीं, उन्हें गर्म भाले से दागा जाता था।
जो मजदूर भागने की कोशिश करता, उस पर पिटबुल कुत्ता छोड़ दिया जाता था। यह सुनकर ही रूह कांप जाती है कि इंसानों को इस तरह जानवरों के हवाले किया जाता था। यह केवल डराने के लिए नहीं, बल्कि उन्हें हमेशा के लिए मानसिक और शारीरिक रूप से तोड़ देने की साजिश थी।
सीतापुर के जगदीश, औरैया के शिवम जाटव और नैनीताल के रामू जैसे कई मजदूरों ने अपनी दर्दभरी कहानी सुनाई। किसी का हाथ तोड़ दिया गया, तो किसी का कान खराब कर दिया गया।
उन्हें
न ठीक से खाना दिया
जाता था और न
ही सोने दिया जाता था। चोकर की सूखी रोटी
ही उनका भोजन थी।
🧾 पहचान मिटाने की साजिश
मजदूरों के आधार कार्ड जला दिए गए और मोबाइल फोन छीन लिए गए, ताकि वे किसी से संपर्क न कर सकें। यह साफ दर्शाता है कि यह सिर्फ शोषण नहीं, बल्कि सुनियोजित मानव तस्करी और बंधुआ मजदूरी का मामला है।
🚔 पुलिस बनी उम्मीद की किरण
22 जून की शाम पुलिस ने गुप्त सूचना के आधार पर छापेमारी की और 13 मजदूरों को मुक्त कराया। मौके से फैक्ट्री मालिक के पिता और सुपरवाइजर को गिरफ्तार किया गया।
एसएसपी
संजय वर्मा के नेतृत्व में
की गई इस कार्रवाई
को एक बड़ी सफलता
माना जा रहा है।
⚰️ मौत का रहस्य
मामले में तीन मजदूर लापता बताए जा रहे हैं, जिनमें से एक नेपाल के अर्जुन की लाश पहले ही मिल चुकी है। यह आशंका जताई जा रही है कि अत्याचार के कारण उनकी मौत हुई और शवों को लावारिस फेंक दिया गया।
🗣️ मजदूरों की जुबानी दर्द
मजदूरों ने पुलिस को भगवान बताते हुए कहा कि अगर वह समय पर नहीं आते, तो शायद वे जिंदा नहीं बचते।
उनकी
आंखों में आज भी डर
साफ झलकता है, लेकिन अब उम्मीद की
किरण भी दिखाई देती
है।
⚖️ कानून और व्यवस्था पर सवाल
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है—क्या प्रशासन को पहले इसकी जानकारी नहीं थी? अगर थी, तो कार्रवाई क्यों नहीं हुई?
बंधुआ
मजदूरी जैसे अपराध आज भी कैसे
जारी हैं, यह एक बड़ा
चिंतन का विषय है।
🏛️ सामाजिक और राजनीतिक असर
इस घटना के बाद प्रदेश में श्रम कानूनों और फैक्ट्री निरीक्षण व्यवस्था पर सवाल उठने लगे हैं। विपक्ष ने सरकार पर लापरवाही का आरोप लगाया है, जबकि प्रशासन सख्त कार्रवाई का दावा कर रहा है।
🌍 जमीनी हकीकत और चुनौती
ग्रामीण क्षेत्रों में गरीब मजदूरों को झूठे वादों के जरिए फंसाना आम बात बनती जा रही है। यह मामला उस कड़वी सच्चाई को उजागर करता है कि आज भी कई लोग आधुनिक गुलामी का शिकार हैं।
🔮 आगे क्या?
पुलिस अब मुख्य आरोपी की तलाश में जुटी है। साथ ही, लापता मजदूरों की जांच भी तेज कर दी गई है। प्रशासन ने ऐसे मामलों पर कड़ी निगरानी का आश्वासन दिया है।
मुजफ्फरनगर का यह मामला केवल एक अपराध नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है। जब तक सख्त कानून लागू नहीं होंगे और जागरूकता नहीं बढ़ेगी, तब तक ऐसे मामले सामने आते रहेंगे।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।