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22 सितंबर को इतिहास रचने की तैयारी, पहली बार पृथ्वी की कक्षा में जाएगी स्टारशिप
Harish Qureshi
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2026-09-16 15:34:33
स्पेसएक्स ने स्टारशिप की 14वीं परीक्षण उड़ान के लिए 22 सितंबर 2026 का लक्ष्य रखा है। यह पहली बार होगा जब कंपनी इस विशाल रॉकेट को पृथ्वी की कक्षा में भेजने का प्रयास करेगी। मिशन में 26 स्टारलिंक उपग्रहों की तैनाती भी प्रस्तावित है।
स्टारबेस, टेक्सास | 16 सितंबर 2026
By Mohd Haris
स्टारशिप की पहली कक्षीय उड़ान की तैयारी
एलोन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स अब अपने सबसे महत्वाकांक्षी रॉकेट परीक्षणों में से एक की तैयारी कर रही है। कंपनी ने स्टारशिप की अगली परीक्षण उड़ान के लिए 22 सितंबर 2026 का लक्ष्य रखा है।
इस मिशन की खास बात यह है कि स्पेसएक्स पहली बार स्टारशिप को पृथ्वी की कक्षा में पहुंचाने का प्रयास करेगी। इससे पहले की उड़ानों में वाहन अंतरिक्ष तक पहुंचा, लेकिन पृथ्वी की पूरी कक्षा में प्रवेश नहीं कर पाया था।
यह मिशन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?
स्टारशिप स्पेसएक्स का अगली पीढ़ी का विशाल दो-चरणीय रॉकेट सिस्टम है। इसका दीर्घकालिक उद्देश्य एक ऐसे प्रक्षेपण तंत्र को विकसित करना है जिसके दोनों प्रमुख हिस्सों को बार-बार इस्तेमाल किया जा सके।
कंपनी के लिए कक्षा में पहुंचना केवल एक और परीक्षण नहीं होगा। इससे स्टारशिप की लंबी अवधि की अंतरिक्ष उड़ान, कक्षीय संचालन और वापसी से जुड़ी तकनीकों की वास्तविक परिस्थितियों में जांच का रास्ता खुलेगा।
रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित मिशन लगभग 10 घंटे का हो सकता है और इसमें स्टारशिप को लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर भेजकर करीब 6 बार पृथ्वी की परिक्रमा कराने की योजना है।
26 स्टारलिंक उपग्रह भी भेजे जाएंगे
इस उड़ान में स्टारशिप केवल कक्षा तक पहुंचने का प्रयास नहीं करेगी। स्पेसएक्स ने स्टारलिंक की तीसरी पीढ़ी के 26 उपग्रहों को भी तैनात करने की योजना बनाई है।
यह मिशन इसलिए भी अहम है क्योंकि पहली बार स्टारशिप को उपग्रह तैनाती के व्यावहारिक काम में इस्तेमाल किया जाएगा।
टेकक्रंच की रिपोर्ट के मुताबिक प्रस्तावित उड़ान में 26 स्टारलिंक वी3 उपग्रह तैनात किए जाने हैं।
पिछली उड़ान से क्या बदला?
स्टारशिप की पिछली परीक्षण उड़ान जुलाई 2026 में हुई थी। उस मिशन में वाहन अंतरिक्ष तक पहुंचा था, लेकिन उसने पृथ्वी की कक्षा पूरी नहीं की।
अब स्पेसएक्स का लक्ष्य उससे आगे बढ़कर वास्तविक कक्षीय उड़ान का प्रयास करना है। इसका मतलब है कि इस बार मिशन में ज्यादा जटिल चरण शामिल होंगे।
इनमें प्रक्षेपण, दोनों चरणों का अलग होना, बूस्टर की वापसी प्रक्रिया, स्टारशिप का कक्षीय प्रवेश, उपग्रहों की तैनाती और अंत में नियंत्रित वापसी शामिल है।
करीब 10 घंटे का मिशन
प्रस्तावित योजना के मुताबिक स्टारशिप लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में जाएगी और करीब 6 परिक्रमा पूरी करने का प्रयास करेगी।
इसके बाद वाहन को पृथ्वी के वायुमंडल में वापस लाने और प्रशांत महासागर में चिली के पश्चिमी हिस्से के पास उतारने की योजना है।
यह पूरी प्रक्रिया लगभग 10 घंटे तक चल सकती है। हालांकि अंतरिक्ष अभियानों में वास्तविक अवधि परिस्थितियों और मिशन के प्रदर्शन के अनुसार बदल सकती है।
बूस्टर के लिए भी बड़ा परीक्षण
इस मिशन में केवल स्टारशिप के ऊपरी चरण की परीक्षा नहीं होगी। सुपर हेवी बूस्टर की तकनीक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।
स्पेसएक्स बूस्टर के प्रक्षेपण, चरण-विभाजन, वापस मुड़ने की प्रक्रिया और लैंडिंग से जुड़े संचालन का परीक्षण करेगी।
यानी मिशन की सफलता केवल इस बात पर निर्भर नहीं करेगी कि स्टारशिप कक्षा तक पहुंचती है या नहीं। बूस्टर और ऊपरी चरण के बीच पूरा संचालन भी इस परीक्षण का महत्वपूर्ण हिस्सा होगा।
मंजूरी अभी जरूरी
स्पेसएक्स ने 22 सितंबर का लक्ष्य घोषित किया है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि उस तारीख को प्रक्षेपण निश्चित रूप से होगा।
रिपोर्टों के मुताबिक उड़ान नियामकीय मंजूरी पर निर्भर है। एविएशन वीक के अनुसार संघीय विमानन प्रशासन से मिशन लाइसेंसिंग प्रक्रिया जुड़ी हुई है।
इसलिए मौसम, तकनीकी तैयारी या नियामकीय कारणों से तारीख में बदलाव संभव है।
स्टारशिप का बड़ा लक्ष्य
स्पेसएक्स स्टारशिप को पूरी तरह पुन: इस्तेमाल किए जा सकने वाले कक्षीय प्रक्षेपण तंत्र के रूप में विकसित करना चाहती है।
यदि यह तकनीक सफल होती है तो बड़े पेलोड को अंतरिक्ष में भेजने की लागत और प्रक्षेपण की आवृत्ति को प्रभावित करने की क्षमता रखती है।
लेकिन यह लक्ष्य अभी विकास और परीक्षण के चरण में है। किसी एक सफल परीक्षण के आधार पर पूर्ण पुन: उपयोग की क्षमता या नियमित परिचालन सफलता को स्थापित नहीं माना जा सकता।
चंद्रमा और मंगल से भी जुड़ी है योजना
स्टारशिप को केवल पृथ्वी की कक्षा के लिए विकसित नहीं किया जा रहा है। स्पेसएक्स की दीर्घकालिक योजनाओं में चंद्रमा और मंगल से जुड़े मिशन भी शामिल हैं।
ऐसे मिशनों के लिए बड़े पेलोड को अंतरिक्ष में ले जाने, लंबे समय तक संचालन करने और वाहन को दोबारा इस्तेमाल करने की क्षमता महत्वपूर्ण होगी।
इसी वजह से कक्षीय उड़ान का परीक्षण कंपनी के व्यापक अंतरिक्ष कार्यक्रम के लिए एक अहम तकनीकी पड़ाव माना जा रहा है।
पहली कोशिश में क्या जोखिम हैं?
किसी नए भारी-भरकम रॉकेट को पहली बार कक्षा में भेजना अत्यधिक जटिल तकनीकी चुनौती होती है। प्रक्षेपण के दौरान इंजन, ईंधन प्रबंधन, चरण-विभाजन और मार्गदर्शन से लेकर कक्षीय प्रवेश तक कई प्रणालियों को एक साथ काम करना पड़ता है।
इसके बाद वातावरण में दोबारा प्रवेश भी अलग स्तर की चुनौती है। वाहन को अत्यधिक गति और तापमान का सामना करना पड़ता है।
इसीलिए स्पेसएक्स इस उड़ान को परीक्षण के तौर पर देख रही है। इसका उद्देश्य केवल परिणाम हासिल करना नहीं, बल्कि वास्तविक उड़ान से तकनीकी जानकारी प्राप्त करना भी है।
22 सितंबर को क्या होगा?
मौजूदा योजना के अनुसार स्टारशिप को टेक्सास स्थित स्टारबेस से प्रक्षेपित किया जाना है। लॉन्च विंडो स्थानीय समयानुसार सुबह 7:15 बजे खुलने की योजना है और यह करीब 75 मिनट की होगी।
भारतीय समय के अनुसार यह समय लगभग शाम 5:45 बजे बनता है।
हालांकि वास्तविक प्रक्षेपण का समय तकनीकी और नियामकीय परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।
मिशन सफल हुआ तो क्या बदलेगा?
अगर मिशन अपने प्रमुख उद्देश्यों को पूरा करता है तो स्पेसएक्स के लिए यह स्टारशिप विकास कार्यक्रम में महत्वपूर्ण प्रगति होगी।
सबसे पहले कंपनी को यह प्रमाण मिलेगा कि स्टारशिप लंबी अवधि की कक्षीय उड़ान और उपग्रह तैनाती जैसे जटिल कार्य कर सकती है।
इसके बाद आने वाली उड़ानों में पुन: उपयोग, अधिक पेलोड, तेज प्रक्षेपण चक्र और जटिल अंतरिक्ष अभियानों की दिशा में आगे बढ़ने का आधार तैयार हो सकता है।
लेकिन सफलता की परिभाषा आसान नहीं
इस मिशन को केवल सफल या असफल के दो खानों में देखना तकनीकी तस्वीर को सरल बना देगा।
किसी परीक्षण में कुछ उद्देश्य पूरे होना और कुछ तकनीकी लक्ष्य अधूरे रहना संभव है। उदाहरण के लिए उपग्रह तैनाती सफल हो सकती है, जबकि वापसी के किसी चरण में समस्या आ सकती है।
इसीलिए अंतरिक्ष विशेषज्ञ मिशन के प्रत्येक चरण के प्रदर्शन का अलग-अलग मूल्यांकन करते हैं।
स्पेसएक्स के लिए कारोबारी महत्व
स्टारशिप की तकनीकी सफलता का कारोबारी महत्व भी है। बड़े और भारी पेलोड को अपेक्षाकृत कम लागत में अंतरिक्ष तक पहुंचाने की क्षमता विकसित करना वाणिज्यिक अंतरिक्ष बाजार को प्रभावित कर सकता है।
इस मिशन में स्टारलिंक उपग्रहों की तैनाती इसलिए खास है क्योंकि यह स्टारशिप को केवल परीक्षण वाहन से आगे एक संभावित परिचालन प्रक्षेपण प्रणाली के रूप में परखने की दिशा में कदम है।
हालांकि नियमित व्यावसायिक संचालन तक पहुंचने के लिए अभी कई परीक्षण और तकनीकी सत्यापन बाकी हैं।
अंतरिक्ष उद्योग की नजर स्टारशिप पर
स्पेसएक्स की स्टारशिप परियोजना पर दुनिया भर के अंतरिक्ष उद्योग की नजर बनी हुई है। इसका आकार, पुन: उपयोग की महत्वाकांक्षा और संभावित पेलोड क्षमता इसे मौजूदा भारी रॉकेट प्रणालियों से अलग बनाती है।
लेकिन इसकी वास्तविक क्षमता का आकलन नियमित सफल उड़ानों और पुन: उपयोग के प्रमाण के बाद ही किया जा सकेगा।
22 सितंबर का प्रस्तावित परीक्षण इसी लंबी प्रक्रिया का अगला चरण है।
निष्कर्ष
स्पेसएक्स ने स्टारशिप की 14वीं परीक्षण उड़ान के लिए 22 सितंबर 2026 का लक्ष्य रखा है। इस बार कंपनी पहली बार स्टारशिप को पृथ्वी की कक्षा में भेजने का प्रयास करेगी।
करीब 10 घंटे के प्रस्तावित मिशन में लगभग 275 किलोमीटर की ऊंचाई पर उड़ान, करीब 6 कक्षीय चक्कर और 26 स्टारलिंक वी3 उपग्रहों की तैनाती की योजना है।
यह मिशन सफल रहा तो स्टारशिप कार्यक्रम के लिए एक अहम तकनीकी पड़ाव होगा। लेकिन अंतिम परिणाम आने तक इसे केवल प्रस्तावित परीक्षण के रूप में देखना उचित है, क्योंकि नियामकीय मंजूरी, तकनीकी तैयारी और वास्तविक उड़ान परिस्थितियां मिशन की दिशा बदल सकती हैं।
Harish Qureshi
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।