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4 नए लेबर कोड लागू, सरकार बोली ऐतिहासिक सुधार, 10 ट्रेड यूनियन आज करेंगे राष्ट्रव्यापी विरोध

None 2025-11-26 10:07:35
4 नए लेबर कोड लागू, सरकार बोली ऐतिहासिक सुधार, 10 ट्रेड यूनियन आज करेंगे राष्ट्रव्यापी विरोध

21 नवंबर 2025 से लागू लेबर कोड 29 पुराने कानूनों की जगह ले रहे

कामगार अधिकारों पर समर्थन और असहमति दोनों तेज

केंद्र सरकार ने 21 नवंबर 2025 से 4 नए लेबर कोड लागू कर 29 पुराने श्रम कानूनों को बदल दिया है। सरकार इसे मजदूर और उद्योग के लिए ऐतिहासिक सुधार बता रही है, वहीं 10 ट्रेड यूनियन इसे श्रमिक अधिकारों को कमजोर करने वाला कदम कहकर 26 नवंबर 2025 को राष्ट्रव्यापी प्रदर्शन कर रही हैं।

📍New Delhi ✍️ Asif Khan 

केंद्र सरकार ने श्रम नियमों के ढांचे में बड़े बदलाव किए हैं। 21 नवंबर 2025 से 4 नए लेबर कोड लागू किए जा चुके हैं, जो 29 पुराने श्रम कानूनों की जगह ले रहे हैं।

चार नए लेबर कोड कौन से हैं?

वेतन संहिता, 2019

औद्योगिक संबंध संहिता, 2020

सामाजिक सुरक्षा संहिता, 2020

व्यवसायिक सुरक्षा, स्वास्थ्य और कार्य शर्त संहिता, 2020

बदलाव की जरूरत क्यों पड़ी?

पुराने श्रम कानून आज़ादी के शुरुआती दौर की जरूरत के हिसाब से बनाए गए थे। तब और अब की काम की दुनिया में ज़मीन–आसमान का फर्क है। गिग जॉब, डिजिटल वर्क, कॉन्ट्रैक्ट हायरिंग, प्रवासी वर्कफोर्स जैसे पहलू पहले की व्यवस्था में साफ तौर पर नहीं थे। नियम इतने उलझे थे कि मजदूर अपने अधिकार समझ नहीं पाता था और कंपनियां अनुपालन को बोझ कहती थीं। नए कोड इसी खाई को पाटने की कोशिश हैं।

किसे फायदा मिलने की बात कही जा रही है?

लिखित नियुक्ति पत्र अब अनिवार्य – कामगार को पता होगा उसकी नौकरी की शर्तें और वेतन क्या हैं।

न्यूनतम वेतन का कानूनी अधिकार सभी श्रमिकों को, राज्यों और सेक्टर के अंतर को कम करते हुए।

गिग, प्लेटफॉर्म और प्रवासी श्रमिक भी पहली बार कवरेज में – ईएसआई, पीएफ, पेंशन, बीमा जैसे प्रावधानों का रास्ता खुलेगा।

महिला श्रमिकों को समान वेतन का स्पष्ट अधिकार और सुरक्षा–सहमति के साथ नाइट शिफ्ट का विकल्प।

40+ उम्र के श्रमिकों के लिए मुफ्त सालाना स्वास्थ्य जांच का प्रावधान।

Fixed-Term कर्मचारियों को 1 साल बाद ग्रेच्युटी का हक (पहले 5 साल था)।

काम की शर्तों में क्या बदला?

वेतन समय पर देना अब दायित्व, देरी पर दंड का प्रावधान।

ओवरटाइम का दोगुना भुगतान और काम के घंटे, छुट्टियां, सुरक्षा उपकरण जैसे पहलू एक कानून में समाहित।

खतरनाक सेक्टर (खनन, केमिकल, निर्माण) में हेल्थ और सेफ्टी गारंटी मजबूत करने की बात।

कंपनियों के लिए सिंगल रजिस्ट्रेशन, लाइसेंस और रिटर्न सिस्टम, जिससे प्रक्रिया सरल होगी।

10 ट्रेड यूनियन क्यों कर रहे हैं विरोध?

हिंद मजदूर सभा (HMS) के महासचिव हरभजन सिंह का कहना है कि कुछ प्रावधान कामगार हितों की रक्षा में कमजोर हैं। खासकर:

फैक्ट्री बंद करने और छंटनी की पूर्व अनुमति सीमा 100 से बढ़ाकर 300 कर्मचारी करना
अब 1 से 299 श्रमिकों वाले प्रतिष्ठान बिना सरकारी अनुमति के बंद या छंटनी कर सकते हैं, जो श्रमिक सुरक्षा को कमजोर करता है।

सभी कर्मचारियों के लिए हड़ताल से पहले 60 दिन का नोटिस अनिवार्य (पहले जरूरी सेवाओं में 15 महीने था)।
यूनियनों का तर्क है कि इससे विरोध का असर कमज़ोर होगा।

संगठनों का आरोप है कि कोड का फोकस नियोक्ता सुविधा ज्यादा, श्रमिक सुरक्षा कम की ओर झुक रहा है।

बढ़ती बेरोज़गारी के बीच ऐसे नियम छोटे उद्योगों के लिए छंटनी को आसान, लेकिन श्रमिकों के लिए जोखिम बढ़ाने वाले हैं।

विरोध कर रहे 10 प्रमुख संगठन

AITUC, INTUC, CITU, AIUTUC, HMS, AICCTU, SEWA, TUCC, LPF, UTUC (इन सभी ने 21 नवंबर 2025 के संयुक्त बयान में कोड की आलोचना की थी और 26 नवंबर को प्रदर्शन का आह्वान किया था)।

सरकार का पक्ष क्या है?

श्रम मंत्रालय के कई अधिकारी इसे राजनीति से प्रेरित विरोध मानते हैं। सरकार का तर्क:

विरोधी यूनियन का स्पष्ट राजनीतिक जुड़ाव है (CPI, कांग्रेस, DMK, SUCI आदि से)।

यह सुधार लेबर गवर्नेंस को आधुनिक, पारदर्शी और संगठित बनाते हैं।

नियमों के सरल होने से रोजगार और औद्योगिक प्रतिस्पर्धा में बढ़ोतरी की उम्मीद है।

सरकार के अनुसार, यूनियन फायदे को अनदेखा कर रही हैं, जबकि कोड लागू करने से पहले पर्याप्त विचार–विमर्श हुआ था।

रोजमर्रा पर क्या असर पड़ेगा?

अब एक फैक्ट्री मजदूर, रेस्तरां कर्मचारी या ऐप आधारित वर्कर साफ तौर पर यह कह सकेगा कि नियुक्ति पत्र उसका अधिकार है, न्यूनतम वेतन से कम देना गैरकानूनी है, ओवरटाइम का भुगतान दोगुना हो सकता है और सामाजिक सुरक्षा प्रावधान केवल संगठित सेक्टर तक सीमित नहीं हैं। दूसरी तरफ, यूनियन का सवाल भी सीधा है—अगर व्यवसाय को आसान बनाते हुए श्रमिक सुरक्षा की परत पतली हो जाए, तो संतुलन कहां रहा?

लेबर कोड सुधार की दिशा में बड़ा संरचनात्मक बदलाव हैं, इसमें दो राय नहीं। मजदूर अधिकारों को पहली बार लिखित–औपचारिक ढांचे में लाने और गिग/प्रवासी वर्ग तक सोशल सिक्युरिटी ले जाने से व्यवस्था समावेशी बनती है। वहीं, छंटनी और हड़ताल नोटिस से जुड़े प्रावधानों पर पुनर्विचार की मांग भी ठोस बहस का हिस्सा बन चुकी है।
बॉटम लाइन—यह बदलाव नई व्यवस्था की शुरुआत हैं, लेकिन इसकी असली सफलता इस बात पर टिकी होगी कि सरकार, उद्योग और श्रमिक संगठनों के बीच संतुलन लंबे दौर में कितना टिकता है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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