📍मुजफ्फरनगर✍️ असिफ़ ख़ान
मुजफ्फरनगर में मतदाता सूची सुधार अभियान (SIR) की धीमी रफ्तार पर प्रशासन ने कड़ा रुख अपनाया। केवल 22.05% कार्य पूरा होने के बाद सिटी मजिस्ट्रेट समेत 22 अधिकारियों और बीएलओ को नोटिस। दो दिन में सुधार न होने पर कार्रवाई की चेतावनी।
मुजफ्फरनगर में एसआईआर प्रक्रिया (SIR Procedure) की सुस्त रफ्तार ने प्रशासन की सख्ती को न केवल जायज़ बनाया, बल्कि यह भी साबित किया कि शासन तब तक सक्रिय नहीं होता जब तक व्यवस्था पूरी तरह ढहने के कगार पर न आ जाए। ज़िला प्रशासन का नोटिस देना अचानक किया गया फैसला नहीं, बल्कि महीनों से खिंचती अनदेखी का नतीजा है।
मतदाता सूची का सुधार कोई साधारण सरकारी प्रक्रिया नहीं। यह उस भरोसे की नींव है जिस पर लोकतंत्र खड़ा होता है। लेकिन जब ज़िले में 21.12 लाख मतदाताओं में से सिर्फ़ 22.05 प्रतिशत डेटा पोर्टल पर अपलोड पाया गया, तो सवाल उठना स्वाभाविक था:
आख़िर यह देरी क्यों? ज़िम्मेदारी कौन लेगा? और कब तक व्यवस्था लापरवाही को इत्तिफ़ाक़ कहकर टालती रहेगी?
कार्रवाई केवल डर दिखाने के लिए?
सिटी मजिस्ट्रेट और 22 अफ़सरों को कारण बताओ नोटिस मिल चुका है।
दो दिन की मोहलत दी गई है।
संदेश साफ़ है:
या तो प्रदर्शन सुधारे, या परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहें।
लेकिन यहाँ एक गहरा सवाल छिपा है: क्या समस्या सिर्फ़ इन अधिकारियों की है, या फिर पूरा ढांचा ही जकड़न में है?
अगर बीएलओ field में दस्तक दे रहे हैं और नागरिक उन्हें बार-बार लौटा देते हैं, तो दोषी कौन?
अगर digital पोर्टल technical glitches से भरा है, तो क्या लापरवाही सिर्फ नीचे काम करने वालों की है?
ज़मीनी सच दोनों तरफ़ है
एक तरफ़ अफ़सरों की सुस्ती
दूसरी तरफ़ नागरिकों की उदासीनता
तीसरी तरफ़ प्रशासन की आधी-अधूरी तैयारी
जवाबदेही का असली मतलब
अमानत में खयानत सबसे बड़ा जुर्म।
और मतदाता सूची एक अमानत है।
किसी का नाम कट जाए, या किसी नए मतदाता का पंजीकरण न हो, तो नुकसान केवल आंकड़ों में नहीं होता।
वह एक इंसान की आवाज़ की ख़ामोशी है।
एक वोट का न होना चुनाव परिणाम बदल सकता है।
क्या दो दिन काफी हैं?
प्रशासन कहता है हाँ,
field workers कहते हैं नहीं,
और जनता अब तक समझ नहीं पाई कि यह मामला कितना संवेदनशील है।
अगर आखिरी दिन पर जागना ही नियति है, तो सुधार कहाँ से आएगा?
मुलाक़ातें और चेतावनियाँ
बुढ़ाना में एसडीएम अपूर्वा यादव ने मोहल्लों का दौरा कर चार बीएलओ को लापरवाही में पकड़ा।
जानसठ में बैठक बुलाई गई, deadlines दोहराई गईं, निर्देश पढ़े गए।
लेकिन बात सिर्फ़ पढ़ने और लिखने से नहीं बनती।
बात commitment की है।
बात उस एहसास की है कि एक नाम गलत सूची में दर्ज हो जाना democratic fraud जैसा दर्द देता है।
जनता की भूमिका
चुनाव केवल सरकार या प्रशासन की जिम्मेदारी नहीं।
यदि घरों में दस्तक देने वाला कर्मचारी बार-बार खाली हाथ लौटे,
तो क्या केवल अधिकारी दोषी कहलाएंगे?
समाज को भी जवाबदेही निभानी होगी।
जो बात सबसे अहम है
Transparency एक शब्द नहीं, काम करने का तरीका है।
Accountability सिर्फ़ सज़ा नहीं, भरोसा बहाल करने का मार्ग है।
और Democracy का सम्मान तभी होता है जब हर नाम सही जगह दर्ज होता है।
नतीजा
मुजफ्फरनगर की यह घटना चेतावनी है।
यदि समय रहते प्रणाली और मानसिकता दोनों नहीं बदले,
तो हर चुनाव के साथ लोकतंत्र का कद छोटा होता जाएगा।
अब और बहाने नहीं।
अब नतीजे चाहिए।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।