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प्रशासन का प्रदर्शनकारियों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव दुर्भाग्यपूर्ण :मौलाना अरशद मदनी

None 2024-02-11 19:48:23
प्रशासन का प्रदर्शनकारियों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव दुर्भाग्यपूर्ण :मौलाना अरशद मदनी

प्रदर्शनकारियों पर पुलिस की अंधाधुंध फायरिंग एक बर्बरतापूर्ण कृत्य

नई दिल्ली,(Shah Times) ।  हल्द्वानी पुलिस के एक्शन की कड़े शब्दों में निंदा करते हुए जमीअत उलमा-ए-हिंद के अध्यक्ष हजरत मौलाना सैय्यद अरशद मदनी ने कहा कि हल्द्वानी में जो कुछ हुआ वह बहुत दुखद है, मौलाना मदनी ने कहा कि जमीअत उलमा-ए-हिंद का जो प्रतिनिधि मण्डल प्रभावित क्षेत्रों की समीक्षा के लिए आज हल्द्वानी के दौरे पर गया था, उसने जो रिपोर्ट दी है वह बहुत दुखद है और यह बात आईने की भांति स्पष्ट हो कर सामने आ गई है ।

रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस और प्रशासन की भूमिका बेहद खराब रही है पुलिस क्रूरता और हिंसा की सारी हदें तोड़ते हुए लोगों को गिरफ्तार कर रही है यहां तक कि दरवाजे भी तोड़ रही है और जबरन घरों में घुसकर पुरुषों और महिलाओं की पिटाई कर रही है। यह क्रूरता की पराकाष्ठा है और कोई भी न्यायपूर्ण समाज इसे बर्दाश्त नहीं कर सकता। इस संबंध में हमने कल उत्तराखंड के डीजीपी को पत्र लिखकर मांग की है कि वह इस मामले पर तत्काल ध्यान दें और न केवल पुलिस द्वारा निर्दोष नागरिकों पर किए जा रहे अत्याचार को रोकें बल्कि गिरफ्तारियों का जो सिलसिला शुरू हो गया है उसे भी तुरंत रोका जाना चाहिए और पूरे घटना की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए।

    मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि पुलिस और प्रशासन ने अगर ईमानदारी से इस मामले को सुलझाने का प्रयास किया होता तो शायद इस घटना को रोका जा सकता था, लेकिन ऐसा करने की बजाए पुलिस ने शक्ति प्रदर्शन को प्राथमिकता दी, जिससे स्थिति और बिगड़ गई जिसमें पांच निर्दोष लोगों को अपनी जिंदगी से हाथ धोना पड़ा।

https://shahtimesnews.com/shah-times-delhi-11-feb-24/

मौलाना अरशद मदनी ने यह भी कहा कि जब मामला न्यायालय में था तो प्रशासन को मस्जिद और मदरसे को घ्वस्त करने की इतनी जल्दी क्यों थी ? मेरी सूचना के अनुसार इस केस की सुनवाई 8 फरवरी को हाईकोर्ट में 11 बजे हुई थी और कोर्ट ने 14 फरवरी को इसकी पुनः सुनवाई की तारीख़ दी थी, प्रशासन को उस समय तक प्रतीक्षा करनी चाहीए थी, लेकिन उसी दिन अर्थात 8 फरवरी को शाम लगभग 5 बजे मस्जिद और मदरसे को ध्वस्त करने के लिए नगर निगम और प्रशासन के लोग पहुंच गए और तत्परता का प्रदर्शन किया गया। इससे यह दुखद वास्तविकता सामने आगई कि प्रशासन की नीयत ठीक नहीं थी। 

    मौलाना अरशद मदनी ने कहा कि हमें जो सूचनाएं दी गई हैं उसके अनुसार यह भूमि 1937 में ब्रिटिश शासन काल में एक व्यक्ति को लीज पर दी गई थी, जिस पर मुसलमान आबाद हुए और मस्जिद और मदरसे का भी निर्माण कर लिया। उन्होंने कहा कि पुलिस कार्रवाई पर अब यह दलील दी जा रही है कि स्थानीय लोग हिंसा पर उतारू थे और अपने घरों की छतों से पथराव कर रहे थे, जिस पर नियंत्रण पाने के लिए पुलिस को फायरिंग करनी पड़ी। यह भी बात भी फैलाई जा रही है कि पुलिस पर योजनाबद्ध तरीक़े से हमला किया गया। ज़ाहिर है कि इस प्रकार की बातें अब मामले की लीपापोती करने और फायरिंग को उचित ठहराने के लिए की जा रही हैं। स्थानीय लोग तो प्रशासन के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे थे और यह कोई अपराध नहीं है। संविधान ने देश के हर नागरिक को प्रदर्शन का अधिकार दिया है। मूल प्रश्न यह है कि बात यहां तक क्यों पहुंची? प्रशासन का कर्तव्य था कि इस तरह की कार्रवाई से पहले वह स्थानीय लोगों से बातचीत करती, उन्हें विश्वास में लेती और वास्तविक स्थिति से अवगत करती, मगर ऐसा कुछ भी नहीं हुआ।

      अचानक नगर निगम के लोग जब बुलडोजर लेकर पहुंचे तो स्थानीय लोगों ने प्रदर्शन किया जिसको दबाने के लिए पुलिस ने लाठी चार्ज किया और फारिंग शुरू कर दी। उन्होंने कहा कि देश के इतिहास में यह कोई पहली घटना नहीं है, हर जगह मुसलमानों के खिलाफ पुलिस कानून व्यवस्था स्थापित करने के बजाए एक पार्टी बन जाती है, लेकिन अगर मामला इसके विपरीत हो तो वो ऐसा नहीं करती। मौलाना मदनी ने कहा कि प्रशासन के पास प्रदर्शन को देखने के दो मापदंड हैं। मुस्लिम अल्पसंख्यक प्रदर्शन करे तो अक्षम्य अपराध है परन्तु यदि बहुसंख्यक लोग प्रदर्शन करें और सड़कों पर उतरकर हिंसक कृत्य करें और पूरी-पूरी रेलगाड़ियां और स्टेशन फूंक डालें तो उन्हें तितरबितर करने के लिए हल्का लाठीचार्ज भी नहीं किया जाता। प्रशासन का प्रदर्शन करने वालों के बीच धर्म के आधार पर भेदभाव दुर्भाग्यपूर्ण है। उन्होंने कहा कि हाल ही में सेना में कॉन्ट्रैक्ट नौकरियों के खिलाफ होने वाला हिंसक प्रदर्शन इसका प्रमाण है।

  प्रदर्शनकारियों ने जगह-जगह ट्रेनों में आग लगाई, सरकारी संपत्ति को नुकसान पहुंचाया, पुलिस पर पथराव किया तो वही पुलिस जो मुसलमानों के खिलाफ सभी सीमाएं तोड़ देती है मूक दर्शक बनी रही, इस हिंसक प्रदर्शन को लेकर जो लोग गिरफ्तार किए गए थे उनके खिलाफ ऐसी हल्की धाराएं लगाई थीं कि थाने से ही उनकी ज़मानत हो गई थी, इसके सैकड़ों उदाहरण प्रस्तुत किए जा सकते हैं। हम इसके खिलाफ लम्बे समय से आवाज उठा रहे हैं लेकिन दुर्भाग्य से हर मामले को धार्मिक ऐनक से देखा जाने लगा है।


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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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