मुजफ्फरनगर में जनगणना कार्य को लेकर प्रशासन अब सख्त मोड में दिखाई दे रहा है। एडीएम वित्त एवं राजस्व अनिरुद्ध प्रताप सिंह के औचक निरीक्षण में कई कर्मचारी अनुपस्थित मिले, जबकि कार्यों की रफ्तार भी धीमी पाई गई। सवाल सिर्फ गैरहाजिरी का नहीं, बल्कि उस प्रशासनिक सिस्टम का है जिस पर भविष्य की सरकारी पॉलिसी, बजट और वेलफेयर स्कीम्स की बुनियाद टिकी होती है।
📍 मुजफ्फरनगर
📰 26 मई 2026
✍️ वसी सिद्दीकी
मुजफ्फरनगर में मंगलवार को हुआ एक प्रशासनिक निरीक्षण सामान्य सरकारी कार्रवाई से कहीं ज्यादा मायने रखता है। नगरपालिका परिषद में संचालित जनगणना सेल के औचक निरीक्षण के दौरान जिस तरह कई कर्मचारी अनुपस्थित मिले और कार्यों की रफ्तार धीमी पाई गई, उसने प्रशासनिक मशीनरी की जवाबदेही पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
अपर जिलाधिकारी वित्त एवं राजस्व तथा जिला जनगणना अधिकारी अनिरुद्ध प्रताप सिंह ने निरीक्षण के दौरान साफ लहजे में कहा कि जनगणना जैसा राष्ट्रीय महत्व का कार्य किसी भी तरह की लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगा। उनका यह बयान महज चेतावनी नहीं, बल्कि उस बढ़ती प्रशासनिक बेचैनी का संकेत है जो राज्य स्तर से लेकर जिला स्तर तक दिखाई दे रही है।
निरीक्षण के दौरान जनगणना सेल की उपस्थिति पंजिका, अभिलेख, कार्य प्रगति रिपोर्ट और कार्यालय संचालन व्यवस्था की समीक्षा की गई। शुरुआती जांच में यह सामने आया कि कई नामित कर्मचारी अब तक ड्यूटी ज्वाइन ही नहीं कर पाए थे। कुछ जगहों पर डेटा संकलन और रिपोर्टिंग प्रक्रिया भी शासन की अपेक्षाओं से पीछे पाई गई।
प्रशासनिक सूत्रों के मुताबिक, अधिकारियों को यह भी लगा कि निगरानी और जवाबदेही का सिस्टम उतना प्रभावी नहीं है जितना होना चाहिए। यही वजह रही कि एडीएम ने संबंधित विभागों को तत्काल सूची तैयार कर विभागीय कार्रवाई की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए।
आम नागरिक के लिए जनगणना केवल आंकड़ों का सरकारी अभ्यास लग सकती है, लेकिन हकीकत इससे कहीं बड़ी है। देश की आर्थिक योजनाएं, स्वास्थ्य बजट, शिक्षा ढांचा, संसाधनों का वितरण, शहरी विकास और सामाजिक कल्याण योजनाएं काफी हद तक जनगणना के आंकड़ों पर निर्भर करती हैं।
यही कारण है कि प्रशासन इसे “राष्ट्रीय महत्व का कार्य” कह रहा है। यदि डेटा संग्रह कमजोर होगा, तो भविष्य की नीतियों में भी असंतुलन का खतरा बढ़ जाएगा। ग्रामीण क्षेत्रों में संसाधनों की कमी हो या शहरी इलाकों में इंफ्रास्ट्रक्चर पर दबाव, दोनों स्थितियों की असली तस्वीर जनगणना से ही निकलती है।
यह मामला केवल कर्मचारियों की गैरहाजिरी तक सीमित नहीं दिखता। बड़ा सवाल यह है कि क्या सरकारी विभागों में अब भी कई कर्मचारी जनगणना जैसी प्रक्रियाओं को “रूटीन ड्यूटी” मानकर चल रहे हैं।
प्रशासनिक हलकों में लंबे समय से यह शिकायत रही है कि अतिरिक्त ड्यूटी के नाम पर कई कर्मचारी सक्रिय भागीदारी से बचने की कोशिश करते हैं। दूसरी तरफ कर्मचारी संगठनों का तर्क यह रहता है कि उन पर पहले से ही अत्यधिक कार्यभार मौजूद है।
यहां बहस दो हिस्सों में बंटी हुई दिखाई देती है। एक पक्ष कहता है कि सरकारी सिस्टम में अनुशासन जरूरी है। दूसरा पक्ष पूछता है कि क्या कर्मचारियों को पर्याप्त प्रशिक्षण, संसाधन और तकनीकी सहायता मिल रही है।
एडीएम अनिरुद्ध प्रताप सिंह का बयान इस पूरे मामले में स्पष्ट प्रशासनिक नैरेटिव स्थापित करता है। उन्होंने कहा कि शासन ने जनगणना कार्य को सर्वोच्च प्राथमिकता दी है और समय पर ड्यूटी ज्वाइन करना हर कर्मचारी की जिम्मेदारी है।
उन्होंने यह भी कहा कि जानबूझकर अनुपस्थित रहने वालों के खिलाफ कठोर विभागीय कार्रवाई होगी। प्रशासनिक भाषा में यह संदेश सीधा माना जाता है, क्योंकि विभागीय कार्रवाई कर्मचारियों की सर्विस रिकॉर्ड और भविष्य की पदोन्नति दोनों को प्रभावित कर सकती है।
यहीं से एक महत्वपूर्ण एडिटोरियल सवाल खड़ा होता है। क्या केवल सख्ती और विभागीय कार्रवाई जनगणना प्रक्रिया को तेज कर सकती है।
कई पूर्व प्रशासनिक अधिकारियों का मानना है कि निगरानी जरूरी है, लेकिन सिर्फ डर आधारित सिस्टम लंबे समय तक प्रभावी नहीं रहता। यदि कर्मचारियों को डिजिटल ट्रेनिंग, स्पष्ट दिशा-निर्देश और पर्याप्त तकनीकी सपोर्ट नहीं मिलेगा, तो जमीनी स्तर पर दिक्कतें बनी रह सकती हैं।
दूसरी तरफ प्रशासन का तर्क भी पूरी तरह खारिज नहीं किया जा सकता। यदि कर्मचारी नियुक्ति के बावजूद ड्यूटी ज्वाइन नहीं करते, तो सिस्टम की विश्वसनीयता पर असर पड़ता है। ऐसे में जवाबदेही तय करना प्रशासनिक मजबूरी बन जाती है।
आज की डिजिटल गवर्नेंस में डेटा ही सबसे बड़ी ताकत माना जाता है। सरकारें बजट, इंफ्रास्ट्रक्चर और वेलफेयर मॉडल डेटा के आधार पर तय करती हैं। यदि जनगणना डेटा अधूरा या कमजोर होगा, तो नीति निर्माण की पूरी दिशा प्रभावित हो सकती है।
यही वजह है कि दुनिया भर में जनगणना प्रक्रियाओं को बेहद गंभीर प्रशासनिक एक्सरसाइज माना जाता है। भारत जैसे विशाल और विविधता वाले देश में इसकी अहमियत और बढ़ जाती है।
मुजफ्फरनगर की यह कार्रवाई दूसरे जिलों के लिए भी संकेत मानी जा रही है। प्रशासनिक स्तर पर यह साफ दिखाई दे रहा है कि अब जनगणना कार्य में लापरवाही को “सामान्य गलती” की तरह नहीं देखा जाएगा।
इसका एक राजनीतिक और सामाजिक असर भी है। सरकारें अक्सर विकास योजनाओं के आंकड़ों के जरिए अपनी उपलब्धियां पेश करती हैं। यदि आधारभूत डेटा ही संदिग्ध हो जाए, तो पूरा विकास नैरेटिव कमजोर पड़ सकता है।
हालांकि इस बहस का दूसरा पहलू भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। कई सरकारी कर्मचारियों का कहना है कि उन्हें नियमित कार्यों के अलावा चुनाव ड्यूटी, सर्वे, आपदा प्रबंधन और अन्य प्रशासनिक जिम्मेदारियां भी निभानी पड़ती हैं।
ऐसे में कार्यभार बढ़ना स्वाभाविक है। सवाल यह है कि क्या प्रशासनिक सिस्टम ने जनगणना के लिए पर्याप्त मानव संसाधन और तकनीकी व्यवस्था पहले से तैयार की थी।
यही वह हिस्सा है जहां निष्पक्ष तज्ज़िया जरूरी हो जाता है। सिर्फ कर्मचारियों को दोषी ठहराना आसान रास्ता हो सकता है, लेकिन बेहतर प्रशासनिक मॉडल वही होगा जो जवाबदेही और संसाधन दोनों को संतुलित करे।
निरीक्षण के दौरान एडीएम ने रिकॉर्ड मेंटेनेंस, डेटा संकलन और रिपोर्टिंग सिस्टम को और अधिक प्रभावी बनाने के निर्देश दिए। यह संकेत देता है कि प्रशासन केवल उपस्थिति तक सीमित नहीं रहना चाहता, बल्कि पूरे वर्कफ्लो को मजबूत करने की कोशिश में है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि जनगणना जैसी प्रक्रिया में पारदर्शिता सबसे महत्वपूर्ण तत्व होती है। यदि डेटा संग्रह और रिपोर्टिंग में अस्पष्टता होगी, तो बाद में नीतिगत फैसलों पर भी सवाल उठ सकते हैं।
संभावना है कि आने वाले दिनों में अनुपस्थित कर्मचारियों की सूची तैयार होने के बाद विभागीय नोटिस जारी किए जाएं। साथ ही मॉनिटरिंग सिस्टम को और सख्त किया जा सकता है।
कुछ जिलों में डिजिटल ट्रैकिंग और रियल टाइम रिपोर्टिंग मॉडल पर भी काम चल रहा है। यदि ऐसे मॉडल प्रभावी साबित होते हैं, तो भविष्य में जनगणना कार्य अधिक पारदर्शी और तेज हो सकता है।
मुजफ्फरनगर का यह मामला केवल एक निरीक्षण रिपोर्ट नहीं है। यह उस बड़े प्रशासनिक संघर्ष की तस्वीर है जिसमें एक तरफ जवाबदेही की मांग है और दूसरी तरफ सरकारी सिस्टम की जमीनी चुनौतियां।
जनगणना लोकतंत्र की बुनियादी प्रक्रिया है। इसके आंकड़ों पर करोड़ों लोगों की योजनाएं, बजट और भविष्य निर्भर करता है। इसलिए प्रशासन की सख्ती समझी जा सकती है। लेकिन साथ ही यह भी जरूरी है कि सिस्टम कर्मचारियों को बेहतर संसाधन, स्पष्ट ट्रेनिंग और तकनीकी सहयोग दे।
सवाल सिर्फ यह नहीं कि कौन अनुपस्थित था। असली सवाल यह है कि क्या हमारा प्रशासनिक ढांचा इतनी बड़ी राष्ट्रीय प्रक्रिया को पूरी दक्षता और भरोसे के साथ संभालने के लिए तैयार है।
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Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।