आईआईटी बॉम्बे के छात्र साहिल वाकोड़े की 18 सितंबर को मौत के बाद कैंपस में विरोध हुआ। परिवार के आरोपों पर एफआईआर दर्ज हुई। डीन सूर्यनारायण दुल्ला हटाए गए और 18 मांगों पर प्रशासन ने कार्रवाई का भरोसा दिया।
📍 मुंबई, महाराष्ट्र
🗓️ 22 सितंबर 2026
✍️ Mohd Naved
आईआईटी बॉम्बे में 20 वर्षीय बीटेक छात्र साहिल वाकोड़े की मौत के बाद शुरू हुआ विवाद अब संस्थान की प्रशासनिक व्यवस्था और छात्र कल्याण तक पहुंच गया है। 18 सितंबर को छात्र की मौत के बाद कैंपस में विरोध प्रदर्शन हुए। इसके बीच संस्थान ने प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला को डीन ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर्स के पद से हटा दिया।
यह कार्रवाई छात्र संगठनों की 18 सूत्रीय मांगों और मामले की जांच के बीच हुई है। दुल्ला अभी संस्थान में प्रोफेसर बने हुए हैं। उनके खिलाफ पुलिस ने छात्र के परिवार की शिकायत के आधार पर मामला दर्ज किया है। मामले में आरोपों की जांच जारी है और किसी भी आरोप को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना गया है।
साहिल वाकोड़े कौन थे?
साहिल वाकोड़े आईआईटी बॉम्बे के एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग में दूसरे वर्ष के बीटेक छात्र थे। 18 सितंबर को वह संस्थान के पवई कैंपस स्थित हॉस्टल के कमरे में मृत पाए गए।
उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार मौत से कुछ घंटे पहले एक मिड-सेमेस्टर परीक्षा के दौरान उनके पास मोबाइल फोन होने का मामला सामने आया था। संस्थान की शुरुआती सूचना में परीक्षा के दौरान कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवा के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया गया था।
हालांकि, बाद में संस्थान ने अपने शुरुआती बयान को लेकर माफी मांगी। आईआईटी बॉम्बे ने कहा कि घटना से जुड़े तथ्य और परिस्थितियां संबंधित अधिकारियों की जांच के अधीन हैं।
परिवार ने क्या आरोप लगाए?
साहिल के परिवार ने आरोप लगाया कि उनके साथ संस्थान में जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न हुआ था। परिवार की शिकायत के बाद पुलिस ने आत्महत्या के लिए उकसाने और अनुसूचित जाति एवं अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण कानून से जुड़ी धाराओं के तहत मामला दर्ज किया।
इन आरोपों की स्वतंत्र जांच अभी जारी है। इसलिए यह कहना तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगा कि छात्र की मौत का कारण जातिगत भेदभाव ही साबित हो चुका है।
कुछ छात्रों और साहिल के परिचितों ने भी अलग-अलग दावे किए हैं। कुछ ने जातिगत उत्पीड़न के आरोपों से असहमति जताई और परीक्षा तथा शैक्षणिक दबाव से जुड़े पहलुओं की ओर ध्यान दिलाया। पुलिस जांच के पूरा होने से पहले इन अलग-अलग दावों के आधार पर अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला की भूमिका क्या थी?
प्रोफेसर सूर्यनारायण दुल्ला उस परीक्षा से जुड़े थे, जिसके दौरान साहिल के पास मोबाइल फोन होने की बात सामने आई थी। इसके बाद उनका नाम छात्र के परिवार की शिकायत और पुलिस की प्राथमिकी में आया।
छात्रों ने दुल्ला के खिलाफ कार्रवाई की मांग की। तीन दिनों तक कैंपस में विरोध प्रदर्शन के बाद आईआईटी बॉम्बे ने उन्हें डीन ऑफ एडमिनिस्ट्रेटिव अफेयर्स के पद से तत्काल प्रभाव से हटा दिया।
यहां एक अहम तथ्य है। दुल्ला को संस्थान से पूरी तरह बर्खास्त नहीं किया गया है। वह प्रोफेसर और एनर्जी साइंस एंड इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख के रूप में काम कर रहे हैं। आगे की कार्रवाई जांच के नतीजों और संस्थागत प्रक्रिया के आधार पर होने की बात कही गई है।
छात्रों ने क्यों शुरू किया विरोध?
साहिल की मौत के बाद आईआईटी बॉम्बे में छात्रों ने लगातार तीन दिनों तक प्रदर्शन किया। प्रदर्शनकारियों ने मामले की स्वतंत्र जांच, संस्थागत जवाबदेही, परीक्षा और अनुशासन संबंधी नियमों की समीक्षा तथा छात्र कल्याण व्यवस्था में सुधार की मांग की।
छात्रों ने कुल 18 सूत्रीय मांगों का चार्टर प्रशासन के सामने रखा। इसमें संबंधित प्रोफेसर के खिलाफ कार्रवाई, मामले की स्वतंत्र जांच, संस्थान की शुरुआती सार्वजनिक सूचना को लेकर माफी और छात्र शिकायत निवारण व्यवस्था को मजबूत करने जैसी मांगें शामिल थीं।
18 मांगों पर क्या हुआ?
20 सितंबर की रात आईआईटी बॉम्बे के निदेशक प्रोफेसर शिरीष केदारे ने प्रदर्शन कर रहे छात्रों के साथ लंबी बैठक की। रिपोर्टों के अनुसार बैठक के दौरान छात्रों की 18 सूत्रीय मांगों के चार्टर पर निदेशक के हस्ताक्षर हुए।
मांगों में मामले की जांच और दोषी पाए जाने वाले संबंधित पक्षों के खिलाफ कार्रवाई का प्रावधान भी था। छात्रों ने जांच के लिए समयसीमा और रिपोर्ट सार्वजनिक करने की मांग रखी थी।
हालांकि संस्थान की ओर से यह भी स्पष्ट किया गया कि प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित फैसले नियमानुसार लिए जाएंगे। यानी मांगों पर हस्ताक्षर को हर आरोप की पुष्टि या किसी व्यक्ति को दोषी ठहराने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
आईआईटी बॉम्बे ने अपने शुरुआती बयान पर माफी क्यों मांगी?
साहिल की मौत के बाद आईआईटी बॉम्बे की शुरुआती सार्वजनिक सूचना में परीक्षा से जुड़े घटनाक्रम का विवरण दिया गया था। छात्रों और प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि इस तरह की जानकारी मृत छात्र का पक्ष सुने बिना सार्वजनिक करना अनुचित था।
इसके बाद संस्थान ने माफी जारी की। आईआईटी बॉम्बे ने कहा कि मौत से पहले की परिस्थितियां जांच के अधीन हैं और शुरुआती संचार में उन परिस्थितियों पर टिप्पणी करना उचित नहीं था।
यह बदलाव मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए महत्वपूर्ण है। संस्थान ने बाद की सूचना में जांच पूरी होने तक घटनाक्रम के बारे में अंतिम निष्कर्ष से बचने का संकेत दिया।
क्या आईआईटी बॉम्बे के निदेशक ने इस्तीफा दिया?
इस मामले में सोशल मीडिया और कुछ रिपोर्टों के बीच निदेशक प्रोफेसर शिरीष केदारे के इस्तीफे की खबर भी सामने आई थी। आईआईटी बॉम्बे ने इसे स्पष्ट रूप से गलत बताया।
संस्थान ने कहा कि निदेशक ने इस्तीफा नहीं दिया है। इसलिए वर्तमान स्थिति में निदेशक के इस्तीफे की खबर को तथ्य के रूप में पेश करना सही नहीं होगा।
फैकल्टी ने दुल्ला के समर्थन में क्या कहा?
विवाद के बीच आईआईटी बॉम्बे के फैकल्टी फोरम के एक हिस्से ने प्रोफेसर दुल्ला के समर्थन में बयान दिया। उनका पक्ष है कि परीक्षा के दौरान दुल्ला ने संस्थान के निर्धारित नियमों के अनुसार अपनी जिम्मेदारी निभाई।
फैकल्टी की ओर से निष्पक्ष जांच की मांग भी सामने आई है। इससे मामला केवल प्रशासन और छात्रों के बीच विवाद तक सीमित नहीं रहा, बल्कि संस्थान के भीतर भी अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आए हैं।
पुलिस जांच में अब क्या अहम है?
पुलिस के सामने अब कई पहलुओं की जांच महत्वपूर्ण होगी। इसमें परीक्षा के दौरान वास्तव में क्या हुआ, साहिल के साथ उस समय किस तरह की बातचीत हुई, परिवार द्वारा लगाए गए जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के आरोपों में कितना तथ्य है तथा मौत से पहले की घटनाओं का आपस में क्या संबंध था, जैसे सवाल शामिल हैं।
मामले की जांच मुंबई पुलिस की अपराध शाखा को सौंपे जाने की रिपोर्ट भी सामने आई है। परिवार और छात्रों की ओर से निष्पक्ष जांच की मांग लगातार उठाई जा रही है।
मामले में सबसे जरूरी सावधानी क्या है?
इस पूरे प्रकरण में कई दावे एक साथ सामने आए हैं। एक तरफ परिवार ने जातिगत भेदभाव और उत्पीड़न के आरोप लगाए हैं। दूसरी तरफ कुछ छात्रों ने इन आरोपों से असहमति जताई है। वहीं परीक्षा के दौरान मोबाइल फोन और कृत्रिम बुद्धिमत्ता आधारित सेवा के इस्तेमाल से जुड़ा संस्थान का शुरुआती पक्ष भी जांच का हिस्सा है।
इन सभी पहलुओं को अलग-अलग देखना जरूरी है। किसी एफआईआर में नाम होना दोष सिद्ध होने के बराबर नहीं है। इसी तरह किसी संस्थान का प्रशासनिक अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई करना भी जांच पूरी होने से पहले आपराधिक दोष सिद्ध नहीं करता।
छात्र कल्याण पर फिर बड़ी बहस
साहिल वाकोड़े की मौत ने आईआईटी बॉम्बे में छात्र कल्याण, परीक्षा अनुशासन और शिकायत निवारण की व्यवस्था पर बहस तेज कर दी है। छात्रों की मांगों में मानसिक स्वास्थ्य सेवाओं को मजबूत करने और शिकायतों के लिए अधिक प्रभावी व्यवस्था बनाने की बातें भी शामिल हैं।
यह मुद्दा केवल एक परीक्षा विवाद तक सीमित नहीं है। उच्च शिक्षण संस्थानों में अनुशासन लागू करने और छात्रों की गरिमा, मानसिक स्वास्थ्य तथा शिकायतों की सुनवाई के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए, यह व्यापक सवाल भी इस घटनाक्रम से जुड़ गया है।
अब आगे क्या होगा?
आईआईटी बॉम्बे ने दुल्ला को प्रशासनिक पद से हटा दिया है, लेकिन उनकी संस्थागत और शैक्षणिक भूमिका बनी हुई है। आगे की कार्रवाई जांच के निष्कर्षों और संबंधित प्रक्रियाओं पर निर्भर करेगी।
दूसरी ओर पुलिस जांच और छात्रों की मांगों पर संस्थान की कार्रवाई इस मामले की अगली दिशा तय करेगी। निदेशक के इस्तीफे की खबर को संस्थान ने खारिज किया है।
साहिल वाकोड़े की मौत से जुड़े मामले में अभी कई सवालों के जवाब जांच से सामने आने बाकी हैं। इसलिए इस वक्त सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि संस्थान ने प्रशासनिक स्तर पर कार्रवाई की है, पुलिस मामला दर्ज है और घटना की परिस्थितियों की जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।