सोमवार, 24 August 2026
GOLD ₹0 ▼ 0%
SENSEX 0 ▼ 0%
BITCOIN $0 ▼ 0%
38°C मुजफ्फरनगर
EDITION:
BREAKING
#ShahTimes #Muzaffarnagar #Bijnor #Moradabad #BreakingNews #Politics #Education #Crime #Sports #Business
Book Your Ads With Shah Times
None

वंदे मातरम बहस में अखिलेश यादव बोले, गाने से ज्यादा निभाना जरूरी

None 2025-12-08 21:20:54
वंदे मातरम बहस में अखिलेश यादव बोले, गाने से ज्यादा निभाना जरूरी

वंदे मातरम पर अखिलेश यादव का भाजपा पर तीखा हमला

वंदे मातरम के 150 साल पर अखिलेश यादव का सियासी प्रहार

संसद में वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर हुई चर्चा के दौरान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम गाने से ज्यादा उसे निभाना जरूरी है। इस बयान ने राष्ट्रवाद, सियासत और इतिहास के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी है।

संसद की बहस और एक पुराने गीत की नई गूंज

सोमवार को संसद के भीतर जब वंदे मातरम के १५० वर्ष पूरे होने पर चर्चा शुरू हुई, तो माहौल सिर्फ स्मृति का नहीं था, सियासत का भी था। एक तरफ इतिहास की बातें थीं, क्रांतिकारियों के किस्से थे, और दूसरी तरफ आज की राजनीति के सवाल थे। इसी बहस के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का भाषण आया, जिसने पूरे विमर्श को एक नई दिशा दे दी। उन्होंने साफ कहा कि वंदे मातरम गाना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है उसे निभाना।

https://youtube.com/shorts/9hW1pdbGoOw?si=FA66mGrmmoJBAG7Q

उनका यह वाक्य सुनने में सीधा लगा, लेकिन इसके भीतर एक बड़ा सवाल छुपा था। आखिर हम राष्ट्रभक्ति को किस नजर से देखते हैं। क्या वह सिर्फ मंच पर बोले गए शब्द हैं, या फिर स्कूल, अस्पताल, रोजगार और इंसाफ से जुड़ा व्यवहार भी राष्ट्रभक्ति का हिस्सा है।

आज़ादी के आंदोलन से आज की संसद तक

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में इतिहास की गलियों में लौटते हुए याद दिलाया कि किस तरह वंदे मातरम का नारा आज़ादी के आंदोलन में लोगों को जोड़ता था। जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया, तब यह गीत सिर्फ एक रचना नहीं रहा, बल्कि जनता की आवाज बन गया। क्रांतिकारी जब अंग्रेज़ों से टकराते थे तो उनके होंठों पर यही शब्द होते थे।

https://shahtimesnews.com/parliament-debate-on-vande-mataram-and-politics-of-new-india/

उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में अंग्रेज़ों को इस गीत से इतना डर लगता था कि जहां भी यह नारा सुनाई देता, वहां देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता था। स्कूलों में बच्चों ने भी जब इसे गाया तो जेल भेज दिए गए। इतना ही नहीं, कुछ वर्षों तक इस पर पाबंदी तक लगा दी गई।

यह बातें सुनते हुए संसद के भीतर बैठे कई सांसदों के चेहरे गंभीर हो गए। इतिहास के ये प्रसंग सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं, यह हमारे लोकतंत्र की जड़ों से जुड़े हैं।

“राष्ट्रवाद का शोर और ज़मीनी सच”

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि आज राष्ट्रवाद एक फैशन बन गया है। मंचों से बड़े-बड़े नारे लगते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। उन्होंने कहा कि जो लोग हर बात पर विवाद खड़ा करते हैं, जो समाज को बांटकर राजनीति करते हैं, क्या वही लोग असली राष्ट्रवादी हो सकते हैं।

यह सवाल सीधा था, लेकिन इसका जवाब आसान नहीं। आज का भारत सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और तेज़ नारों का भारत है। यहां राष्ट्रवाद अक्सर आवाज़ की ऊंचाई से मापा जाता है, व्यवहार की गहराई से नहीं। अखिलेश ने इसी फर्क को रेखांकित किया।

वंदे मातरम केवल गीत नहीं, एक जिम्मेदारी

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का मतलब यह नहीं कि आप किसी को दबाव में डालें कि वह इसे गाए या नहीं। इसका मतलब यह है कि आप उस भावना को अपने भीतर जिएं। अगर स्कूल बंद हो रहे हैं, अगर अस्पतालों में इलाज नहीं मिल रहा, अगर गरीब को न्याय नहीं मिल रहा, तो सिर्फ गीत गाने से कोई देशभक्त नहीं बन जाता।

यहां उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि हजारों प्राथमिक स्कूल बंद कर दिए गए। बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा। कुछ जगहों पर जब समाज के लोग खुद बच्चों को पढ़ाने आगे आए तो उन पर ही केस कर दिए गए। ऐसे में सवाल उठता है कि वंदे मातरम का भाव कहां गया।

एक बुजुर्ग की तरह समझाते हुए उन्होंने कहा कि देश प्रेम का मतलब केवल तिरंगे के साथ फोटो खिंचवाना नहीं है, बल्कि उस बच्चे के भविष्य की चिंता करना भी है जो स्कूल न जा पाने की वजह से पीछे रह जाता है।

सत्ता, इतिहास और अपने जैसा बनाने की कोशिश

अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि आज की सत्ता हर महान व्यक्ति, हर ऐतिहासिक प्रतीक को अपने हिसाब से ढालना चाहती है। वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा, लेकिन आज ऐसा माहौल बना दिया जाता है जैसे यह सिर्फ एक ही विचारधारा की संपत्ति हो।

उन्होंने भाजपा के शुरुआती दौर का जिक्र करते हुए कहा कि तब पार्टी को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द अपनाने पड़े थे। मंचों पर जयप्रकाश नारायण की तस्वीर लगाई गई। यह दिखाने की कोशिश हुई कि पार्टी एक समावेशी रास्ते पर चलेगी। आज सवाल यह है कि वह रास्ता कहां गया।

यह बात सुनकर संसद में बैठे कई सांसदों ने अपनी कुर्सियों पर हलचल की। सवाल सीधा था और जवाब टालने वाला नहीं।

“नारे नहीं, नीयत परखो”

अखिलेश के भाषण का एक अहम हिस्सा यह भी था कि असली राष्ट्रवाद नीयत से नापा जाता है, नारों से नहीं। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग खुद को सबसे बड़ा देशभक्त बताते हैं, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटो तो पता चलता है कि उनके पूर्वजों ने आज़ादी की लड़ाई में क्या भूमिका निभाई।

यहां उन्होंने मुखबिरी और जासूसी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग उस समय अंग्रेज़ों के लिए काम कर रहे थे, और आज खुद को राष्ट्रवाद का ठेकेदार बताते हैं। यह बात तीखी थी, लेकिन राजनीति में ऐसे तीखे सवाल अक्सर नई बहस का रास्ता खोलते हैं।

आज की पीढ़ी और वंदे मातरम का अर्थ

आज की पीढ़ी के लिए वंदे मातरम का मतलब क्या है। यह सवाल संसद के बाहर भी गूंज रहा है। एक युवा छात्र ने कहा कि उसने वंदे मातरम स्कूल में सुबह की प्रार्थना में गाया है, लेकिन उसे यह कभी नहीं बताया गया कि इसका भाव क्या है। उसके लिए यह बस एक रिवाज़ था।

अखिलेश यादव का कहना था कि यही सबसे बड़ी चुनौती है। गीत को रिवाज़ से निकालकर विचार बनाना होगा। जब तक युवा यह नहीं समझेगा कि देश से प्यार का मतलब सिर्फ जयकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है, तब तक बहस अधूरी रहेगी।

विभाजन की राजनीति बनाम एकता का सपना

उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि वंदे मातरम का मूल भाव समाज को जोड़ने का था। जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर लोग एक साथ खड़े हुए थे। आज वही गीत कुछ लोगों के लिए विभाजन का औज़ार बनता जा रहा है।

यह बात सुनने में कड़वी लग सकती है, लेकिन समाज में जो तनाव दिखता है, वह इस चिंता को मजबूत करता है। जब एक गीत, एक नारा या एक झंडा किसी को जोड़ने के बजाय डराने लगे, तब सवाल खड़े होना लाज़मी है।

सत्ता पक्ष की चुप्पी और विपक्ष के सवाल

संसद में इस पूरे भाषण के दौरान सत्ता पक्ष की तरफ से ज्यादा शोर नहीं हुआ। कुछ सांसदों ने टोका जरूर, लेकिन बहस का रुख नहीं बदला। यह भी अपने आप में एक संकेत था कि सवाल आसान नहीं थे।

विपक्ष ने इसके बाद यह भी पूछा कि क्या वंदे मातरम सिर्फ चुनावी मंच तक सीमित रह गया है। क्या इसे गरीब की रोटी, किसान की फसल, मजदूर की मजदूरी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

वंदे मातरम और संविधान का रिश्ता

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि वंदे मातरम का भाव हमें संविधान से मिला है। यह किसी एक पार्टी या समूह की विरासत नहीं है। यह पूरे देश की साझा धरोहर है। इसलिए इसके नाम पर किसी पर टिप्पणी करना, किसी को मजबूर करना, इसके मूल भाव के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति को इसके सारे शब्द याद हों। जरूरी यह है कि देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव हर दिल में हो। यही असली वंदे मातरम है।

आलोचना भी राष्ट्रभक्ति है?

इस बहस का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि आज आलोचना को भी अक्सर राष्ट्रद्रोह की नजर से देखा जाता है। अखिलेश यादव का कहना था कि अगर कोई सरकार से सवाल पूछता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह देश के खिलाफ है। कई बार सवाल पूछना भी देश के लिए जरूरी होता है।

यह बात लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ती है। अगर सब लोग सिर्फ तारीफ ही करें, तो गलतियों को ठीक कौन करेगा। यही सोच आज के राजनीतिक माहौल में चुनौती बन चुकी है।

गांव, गरीब और वंदे मातरम

अपने भाषण के एक हिस्से में उन्होंने गांवों की हालत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर गांव खाली हो रहे हैं, अगर किसान कर्ज में डूबा है, अगर नौजवान को नौकरी नहीं मिल रही, तो क्या सिर्फ नारे लगाकर इन समस्याओं को ढंका जा सकता है।

उन्होंने एक साधारण उदाहरण दिया। अगर किसी घर में भूखा बच्चा रो रहा हो और बाहर टीवी पर वंदे मातरम बज रहा हो, तो उस बच्चे के लिए पहले रोटी जरूरी है या गीत। यह उदाहरण सरल था, लेकिन असरदार था।

भाजपा पर सीधा आरोप

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में कई बार भाजपा का नाम लेते हुए कहा कि यह पार्टी विवाद की राजनीति पर आगे बढ़ती है। जहां शांति होती है, वहां भी मुद्दा खोजकर बहस खड़ी कर दी जाती है। उन्होंने इसे बांटो और राज करो की नीति से जोड़ते हुए कहा कि यह नीति आज भी अलग रूप में जिंदा है।

यह आरोप नया नहीं है, लेकिन वंदे मातरम जैसे संवेदनशील विषय के साथ जोड़कर कहना इसे और गंभीर बना देता है।

क्या वंदे मातरम राजनीति से ऊपर उठ पाएगा

सवाल यह भी है कि क्या वंदे मातरम जैसे गीत को हम राजनीति से अलग रख सकते हैं। एक ओर इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक कहा जाता है, दूसरी ओर हर चुनावी मौसम में इसका इस्तेमाल आरोप और प्रत्यारोप के लिए होता है।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि जब तक राजनीति में नंबर बनाने की होड़ रहेगी, तब तक कोई भी प्रतीक राजनीति से अछूता नहीं रह पाएगा। वंदे मातरम भी इसका अपवाद नहीं है।

संसद से सड़क तक जाती बहस

संसद में हुई यह बहस अब सड़क तक आ चुकी है। सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने नजरिए से इसे देख रहे हैं। कुछ लोग अखिलेश यादव के बयान का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ इसे विरोध की राजनीति बता रहे हैं।

लेकिन इतना तय है कि एक पुराने गीत ने एक नई पीढ़ी को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि राष्ट्रभक्ति आखिर होती क्या है।

 एक खुला सवाल

इस पूरी बहस के बाद कोई सीधा निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। वंदे मातरम के १५० साल पूरे होना एक ऐतिहासिक मौका जरूर है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है यह सोचना कि आने वाले ५० साल में हम इस गीत को किस रूप में देखेंगे।

क्या यह सिर्फ समारोहों की शोभा बनेगा या फिर सच में स्कूल, अस्पताल, खेत और फैक्टरी तक इसकी भावना पहुंचेगी। अखिलेश यादव के भाषण ने यही सवाल हमारे सामने रख दिया है। जवाब हमें ही देना है, अपने हर रोज के फैसलों से, अपने व्यवहार से और अपने देश के प्रति अपने कर्तव्य से।

-->

वंदे मातरम पर अखिलेश यादव का भाजपा पर तीखा हमला

वंदे मातरम के 150 साल पर अखिलेश यादव का सियासी प्रहार

संसद में वंदे मातरम के 150 साल पूरे होने पर हुई चर्चा के दौरान सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने भाजपा पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा कि वंदे मातरम गाने से ज्यादा उसे निभाना जरूरी है। इस बयान ने राष्ट्रवाद, सियासत और इतिहास के रिश्ते पर नई बहस छेड़ दी है।

संसद की बहस और एक पुराने गीत की नई गूंज

सोमवार को संसद के भीतर जब वंदे मातरम के १५० वर्ष पूरे होने पर चर्चा शुरू हुई, तो माहौल सिर्फ स्मृति का नहीं था, सियासत का भी था। एक तरफ इतिहास की बातें थीं, क्रांतिकारियों के किस्से थे, और दूसरी तरफ आज की राजनीति के सवाल थे। इसी बहस के बीच समाजवादी पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव का भाषण आया, जिसने पूरे विमर्श को एक नई दिशा दे दी। उन्होंने साफ कहा कि वंदे मातरम गाना जरूरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है उसे निभाना।

https://youtube.com/shorts/9hW1pdbGoOw?si=FA66mGrmmoJBAG7Q

उनका यह वाक्य सुनने में सीधा लगा, लेकिन इसके भीतर एक बड़ा सवाल छुपा था। आखिर हम राष्ट्रभक्ति को किस नजर से देखते हैं। क्या वह सिर्फ मंच पर बोले गए शब्द हैं, या फिर स्कूल, अस्पताल, रोजगार और इंसाफ से जुड़ा व्यवहार भी राष्ट्रभक्ति का हिस्सा है।

आज़ादी के आंदोलन से आज की संसद तक

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में इतिहास की गलियों में लौटते हुए याद दिलाया कि किस तरह वंदे मातरम का नारा आज़ादी के आंदोलन में लोगों को जोड़ता था। जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे पहली बार गाया, तब यह गीत सिर्फ एक रचना नहीं रहा, बल्कि जनता की आवाज बन गया। क्रांतिकारी जब अंग्रेज़ों से टकराते थे तो उनके होंठों पर यही शब्द होते थे।

https://shahtimesnews.com/parliament-debate-on-vande-mataram-and-politics-of-new-india/

उन्होंने यह भी कहा कि उस दौर में अंग्रेज़ों को इस गीत से इतना डर लगता था कि जहां भी यह नारा सुनाई देता, वहां देशद्रोह का मुकदमा दर्ज कर दिया जाता था। स्कूलों में बच्चों ने भी जब इसे गाया तो जेल भेज दिए गए। इतना ही नहीं, कुछ वर्षों तक इस पर पाबंदी तक लगा दी गई।

यह बातें सुनते हुए संसद के भीतर बैठे कई सांसदों के चेहरे गंभीर हो गए। इतिहास के ये प्रसंग सिर्फ किताबों तक सीमित नहीं हैं, यह हमारे लोकतंत्र की जड़ों से जुड़े हैं।

“राष्ट्रवाद का शोर और ज़मीनी सच”

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में सीधे तौर पर भाजपा पर निशाना साधते हुए कहा कि आज राष्ट्रवाद एक फैशन बन गया है। मंचों से बड़े-बड़े नारे लगते हैं, लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और है। उन्होंने कहा कि जो लोग हर बात पर विवाद खड़ा करते हैं, जो समाज को बांटकर राजनीति करते हैं, क्या वही लोग असली राष्ट्रवादी हो सकते हैं।

यह सवाल सीधा था, लेकिन इसका जवाब आसान नहीं। आज का भारत सोशल मीडिया, टीवी डिबेट और तेज़ नारों का भारत है। यहां राष्ट्रवाद अक्सर आवाज़ की ऊंचाई से मापा जाता है, व्यवहार की गहराई से नहीं। अखिलेश ने इसी फर्क को रेखांकित किया।

वंदे मातरम केवल गीत नहीं, एक जिम्मेदारी

उन्होंने कहा कि वंदे मातरम का मतलब यह नहीं कि आप किसी को दबाव में डालें कि वह इसे गाए या नहीं। इसका मतलब यह है कि आप उस भावना को अपने भीतर जिएं। अगर स्कूल बंद हो रहे हैं, अगर अस्पतालों में इलाज नहीं मिल रहा, अगर गरीब को न्याय नहीं मिल रहा, तो सिर्फ गीत गाने से कोई देशभक्त नहीं बन जाता।

यहां उन्होंने उत्तर प्रदेश का उदाहरण देते हुए कहा कि हजारों प्राथमिक स्कूल बंद कर दिए गए। बच्चों की पढ़ाई पर असर पड़ा। कुछ जगहों पर जब समाज के लोग खुद बच्चों को पढ़ाने आगे आए तो उन पर ही केस कर दिए गए। ऐसे में सवाल उठता है कि वंदे मातरम का भाव कहां गया।

एक बुजुर्ग की तरह समझाते हुए उन्होंने कहा कि देश प्रेम का मतलब केवल तिरंगे के साथ फोटो खिंचवाना नहीं है, बल्कि उस बच्चे के भविष्य की चिंता करना भी है जो स्कूल न जा पाने की वजह से पीछे रह जाता है।

सत्ता, इतिहास और अपने जैसा बनाने की कोशिश

अखिलेश यादव ने यह भी आरोप लगाया कि आज की सत्ता हर महान व्यक्ति, हर ऐतिहासिक प्रतीक को अपने हिसाब से ढालना चाहती है। वंदे मातरम को बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने लिखा, लेकिन आज ऐसा माहौल बना दिया जाता है जैसे यह सिर्फ एक ही विचारधारा की संपत्ति हो।

उन्होंने भाजपा के शुरुआती दौर का जिक्र करते हुए कहा कि तब पार्टी को समाजवाद और धर्मनिरपेक्षता जैसे शब्द अपनाने पड़े थे। मंचों पर जयप्रकाश नारायण की तस्वीर लगाई गई। यह दिखाने की कोशिश हुई कि पार्टी एक समावेशी रास्ते पर चलेगी। आज सवाल यह है कि वह रास्ता कहां गया।

यह बात सुनकर संसद में बैठे कई सांसदों ने अपनी कुर्सियों पर हलचल की। सवाल सीधा था और जवाब टालने वाला नहीं।

“नारे नहीं, नीयत परखो”

अखिलेश के भाषण का एक अहम हिस्सा यह भी था कि असली राष्ट्रवाद नीयत से नापा जाता है, नारों से नहीं। उन्होंने कहा कि आज कुछ लोग खुद को सबसे बड़ा देशभक्त बताते हैं, लेकिन इतिहास के पन्ने पलटो तो पता चलता है कि उनके पूर्वजों ने आज़ादी की लड़ाई में क्या भूमिका निभाई।

यहां उन्होंने मुखबिरी और जासूसी जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया। उन्होंने कहा कि कुछ लोग उस समय अंग्रेज़ों के लिए काम कर रहे थे, और आज खुद को राष्ट्रवाद का ठेकेदार बताते हैं। यह बात तीखी थी, लेकिन राजनीति में ऐसे तीखे सवाल अक्सर नई बहस का रास्ता खोलते हैं।

आज की पीढ़ी और वंदे मातरम का अर्थ

आज की पीढ़ी के लिए वंदे मातरम का मतलब क्या है। यह सवाल संसद के बाहर भी गूंज रहा है। एक युवा छात्र ने कहा कि उसने वंदे मातरम स्कूल में सुबह की प्रार्थना में गाया है, लेकिन उसे यह कभी नहीं बताया गया कि इसका भाव क्या है। उसके लिए यह बस एक रिवाज़ था।

अखिलेश यादव का कहना था कि यही सबसे बड़ी चुनौती है। गीत को रिवाज़ से निकालकर विचार बनाना होगा। जब तक युवा यह नहीं समझेगा कि देश से प्यार का मतलब सिर्फ जयकार नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है, तब तक बहस अधूरी रहेगी।

विभाजन की राजनीति बनाम एकता का सपना

उन्होंने अपने भाषण में यह भी कहा कि वंदे मातरम का मूल भाव समाज को जोड़ने का था। जाति, धर्म और भाषा से ऊपर उठकर लोग एक साथ खड़े हुए थे। आज वही गीत कुछ लोगों के लिए विभाजन का औज़ार बनता जा रहा है।

यह बात सुनने में कड़वी लग सकती है, लेकिन समाज में जो तनाव दिखता है, वह इस चिंता को मजबूत करता है। जब एक गीत, एक नारा या एक झंडा किसी को जोड़ने के बजाय डराने लगे, तब सवाल खड़े होना लाज़मी है।

सत्ता पक्ष की चुप्पी और विपक्ष के सवाल

संसद में इस पूरे भाषण के दौरान सत्ता पक्ष की तरफ से ज्यादा शोर नहीं हुआ। कुछ सांसदों ने टोका जरूर, लेकिन बहस का रुख नहीं बदला। यह भी अपने आप में एक संकेत था कि सवाल आसान नहीं थे।

विपक्ष ने इसके बाद यह भी पूछा कि क्या वंदे मातरम सिर्फ चुनावी मंच तक सीमित रह गया है। क्या इसे गरीब की रोटी, किसान की फसल, मजदूर की मजदूरी से नहीं जोड़ा जाना चाहिए।

वंदे मातरम और संविधान का रिश्ता

अखिलेश यादव ने यह भी कहा कि वंदे मातरम का भाव हमें संविधान से मिला है। यह किसी एक पार्टी या समूह की विरासत नहीं है। यह पूरे देश की साझा धरोहर है। इसलिए इसके नाम पर किसी पर टिप्पणी करना, किसी को मजबूर करना, इसके मूल भाव के खिलाफ है।

उन्होंने कहा कि जरूरी नहीं कि हर व्यक्ति को इसके सारे शब्द याद हों। जरूरी यह है कि देश के प्रति जिम्मेदारी का भाव हर दिल में हो। यही असली वंदे मातरम है।

आलोचना भी राष्ट्रभक्ति है?

इस बहस का एक दिलचस्प पहलू यह भी है कि आज आलोचना को भी अक्सर राष्ट्रद्रोह की नजर से देखा जाता है। अखिलेश यादव का कहना था कि अगर कोई सरकार से सवाल पूछता है, तो इसका मतलब यह नहीं कि वह देश के खिलाफ है। कई बार सवाल पूछना भी देश के लिए जरूरी होता है।

यह बात लोकतंत्र की बुनियाद से जुड़ती है। अगर सब लोग सिर्फ तारीफ ही करें, तो गलतियों को ठीक कौन करेगा। यही सोच आज के राजनीतिक माहौल में चुनौती बन चुकी है।

गांव, गरीब और वंदे मातरम

अपने भाषण के एक हिस्से में उन्होंने गांवों की हालत का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि अगर गांव खाली हो रहे हैं, अगर किसान कर्ज में डूबा है, अगर नौजवान को नौकरी नहीं मिल रही, तो क्या सिर्फ नारे लगाकर इन समस्याओं को ढंका जा सकता है।

उन्होंने एक साधारण उदाहरण दिया। अगर किसी घर में भूखा बच्चा रो रहा हो और बाहर टीवी पर वंदे मातरम बज रहा हो, तो उस बच्चे के लिए पहले रोटी जरूरी है या गीत। यह उदाहरण सरल था, लेकिन असरदार था।

भाजपा पर सीधा आरोप

अखिलेश यादव ने अपने भाषण में कई बार भाजपा का नाम लेते हुए कहा कि यह पार्टी विवाद की राजनीति पर आगे बढ़ती है। जहां शांति होती है, वहां भी मुद्दा खोजकर बहस खड़ी कर दी जाती है। उन्होंने इसे बांटो और राज करो की नीति से जोड़ते हुए कहा कि यह नीति आज भी अलग रूप में जिंदा है।

यह आरोप नया नहीं है, लेकिन वंदे मातरम जैसे संवेदनशील विषय के साथ जोड़कर कहना इसे और गंभीर बना देता है।

क्या वंदे मातरम राजनीति से ऊपर उठ पाएगा

सवाल यह भी है कि क्या वंदे मातरम जैसे गीत को हम राजनीति से अलग रख सकते हैं। एक ओर इसे राष्ट्रीय एकता का प्रतीक कहा जाता है, दूसरी ओर हर चुनावी मौसम में इसका इस्तेमाल आरोप और प्रत्यारोप के लिए होता है।

एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा कि जब तक राजनीति में नंबर बनाने की होड़ रहेगी, तब तक कोई भी प्रतीक राजनीति से अछूता नहीं रह पाएगा। वंदे मातरम भी इसका अपवाद नहीं है।

संसद से सड़क तक जाती बहस

संसद में हुई यह बहस अब सड़क तक आ चुकी है। सोशल मीडिया पर लोग अपने-अपने नजरिए से इसे देख रहे हैं। कुछ लोग अखिलेश यादव के बयान का समर्थन कर रहे हैं, तो कुछ इसे विरोध की राजनीति बता रहे हैं।

लेकिन इतना तय है कि एक पुराने गीत ने एक नई पीढ़ी को फिर से सोचने पर मजबूर कर दिया है कि राष्ट्रभक्ति आखिर होती क्या है।

 एक खुला सवाल

इस पूरी बहस के बाद कोई सीधा निष्कर्ष निकालना मुश्किल है। वंदे मातरम के १५० साल पूरे होना एक ऐतिहासिक मौका जरूर है, लेकिन उससे ज्यादा जरूरी है यह सोचना कि आने वाले ५० साल में हम इस गीत को किस रूप में देखेंगे।

क्या यह सिर्फ समारोहों की शोभा बनेगा या फिर सच में स्कूल, अस्पताल, खेत और फैक्टरी तक इसकी भावना पहुंचेगी। अखिलेश यादव के भाषण ने यही सवाल हमारे सामने रख दिया है। जवाब हमें ही देना है, अपने हर रोज के फैसलों से, अपने व्यवहार से और अपने देश के प्रति अपने कर्तव्य से।

ADVERTISEMENT
None

None

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

BREAKING NEWS

TRENDING

ताज़ा ख़बरें
BREAKING NEWS
ADVERTISEMENT

Your Ad Here
TRENDING
आज का ई-पेपर
मुजफ्फरनगर (12 पेज)
बिजनौर (10 पेज)
सहारनपुर (11 पेज)
मुरादाबाद (14 पेज)
Home Video Epaper Reel Menu
Chat With Us
SHAH TIMES
ख़बरें छुपाता नहीं, छापता है
🏠 होम ⚡ ब्रेकिंग न्यूज़ 📰 ताज़ा खबरें 🇮🇳 देश 🌍 दुनिया 🏛 राजनीति 🚔 क्राइम 📈 बिजनेस 🏏 स्पोर्ट्स 🎓 शिक्षा ❤️ स्वास्थ्य 📰 ई-पेपर