इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला, उत्तर प्रदेश में हुक्का बार पर रोक, स्मोकिंग एरिया में भी नहीं इजाज़त
Asif Khan
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2026-09-29 20:08:48
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी में डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर भी रेस्तरां द्वारा हुक्का सर्विस देने को नियम 4(3) और सिगरेट्स एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट, 2003 यानी कोटपा की व्यवस्था के खिलाफ माना है।
📍Lucknow 🗓️ 29 सितंबर 2026 ✍️ Asif khan
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने यूपी में हुक्का सर्विस पर क्या कहा?
लखनऊ: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ बेंच ने उत्तर प्रदेश में रेस्तरां और दूसरे प्रतिष्ठानों द्वारा डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर हुक्का सर्विस उपलब्ध कराने के खिलाफ अहम फैसला दिया है। अदालत ने माना कि ऐसी सर्विस प्रोहिबिशन ऑफ स्मोकिंग इन पब्लिक प्लेसेज़ रूल्स, 2008 के 2017 में संशोधित नियम 4(3) और सिगरेट्स एंड अदर टोबैको प्रोडक्ट्स एक्ट, 2003 यानी कोटपा की व्यवस्था के खिलाफ है।
जस्टिस शेखर बी. सराफ और जस्टिस अब्धेश कुमार चौधरी की डिवीजन बेंच ने हुक्का बार और रेस्तरां में हुक्का सर्विस से संबंधित याचिकाओं पर फैसला दिया। रिपोर्ट के मुताबिक अदालत के सामने कुल 81 रिट याचिकाएं थीं। इन्हें खारिज कर दिया गया।
स्मोकिंग एरिया का मतलब हुक्का सर्विस की अनुमति नहीं
इस मामले का एक अहम कानूनी सवाल डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया की सीमा से जुड़ा था।
अदालत ने स्पष्ट किया कि कानून के तहत ऐसा क्षेत्र धूम्रपान के लिए एक सीमित अपवाद है। इसका अर्थ यह नहीं है कि रेस्तरां वहां अपनी सामान्य कमर्शियल सर्विस जारी रख सकता है।
2017 के संशोधन के बाद नियम 4(3) में डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर किसी भी सर्विस की अनुमति नहीं है। अदालत ने इसी संशोधित भाषा को हुक्का सर्विस के सवाल पर निर्णायक माना।
हुक्का तैयार करना भी ‘सर्विस’
याचिकाकर्ताओं की तरफ से यह दलील भी सामने आई कि हुक्का उपकरण को किराये पर दिया जा सकता है या सेल्फ-सर्विस व्यवस्था अपनाई जा सकती है।
बेंच इससे सहमत नहीं हुई।
अदालत के विश्लेषण के मुताबिक ग्राहक के लिए हुक्का तैयार करना, उसे असेंबल करना, पहुंचाना, जलाना, दोबारा भरना और मेंटेन करना कारोबारी सर्विस के दायरे में आता है। इसी आधार पर सेल्फ-सर्विस और रेंटल मॉडल वाली दलीलों को भी स्वीकार नहीं किया गया।
साफ हवा के अधिकार पर अदालत का ज़ोर
फैसले में संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत गैर-धूम्रपान करने वाले लोगों के साफ हवा में सांस लेने के अधिकार को अहम माना गया। अदालत ने इसे प्रतिष्ठान के अनुच्छेद 19(1)(जी) के तहत कारोबार के अधिकार से जुड़े कमर्शियल हित के मुकाबले सार्वजनिक स्वास्थ्य के संदर्भ में देखा।
यहां एक अहम फर्क समझना ज़रूरी है। फैसला केवल इस सवाल पर नहीं था कि कोई व्यक्ति हुक्का पी सकता है या नहीं। अदालत के सामने मुख्य कानूनी मुद्दा यह था कि क्या कोई रेस्तरां डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर हुक्का को कमर्शियल सर्विस के तौर पर उपलब्ध करा सकता है। अदालत का जवाब नकारात्मक रहा।
लाइसेंस पर भी अहम स्थिति
अदालत ने यह भी माना कि फूड सेफ्टी डिपार्टमेंट और म्युनिसिपल कॉरपोरेशन के पास हुक्का बार चलाने की विशेष अनुमति देने वाला अलग वैधानिक अधिकार नहीं है।
दूसरी तरफ, अदालत ने कोटपा के तहत पुलिस की एनफोर्समेंट शक्तियों को स्वीकार किया। इनमें लागू कानूनी प्रावधानों के मुताबिक सर्च, सीज़र, कॉन्फिस्केशन और पेनल्टी से संबंधित कार्रवाई शामिल है।
2020 से चल रहा था विवाद
इस विवाद का एक पुराना संदर्भ भी है।
27 अगस्त 2020 को कोविड-19 महामारी के दौरान हाई कोर्ट ने उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव को बार, रेस्तरां और कैफे में हुक्का सर्व करने की अनुमति नहीं देने का निर्देश दिया था। उस आदेश में सभी जिलाधिकारियों तक निर्देश पहुंचाने और अनुपालन की बात कही गई थी।
बाद की मुकदमेबाज़ी में प्रतिष्ठानों की ओर से यह सवाल उठाया गया कि महामारी के दौरान लागू प्रतिबंध को स्थायी रोक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।
मौजूदा फैसले में अदालत ने मुद्दे को महामारी की पाबंदियों से आगे जाकर मौजूदा तंबाकू नियंत्रण कानून और 2017 में संशोधित नियम 4(3) के आधार पर परखा।
पहले अलग परिस्थिति में आया था आदेश
फरवरी 2026 में हाई कोर्ट की एक दूसरी बेंच ने एक मामले में कथित हर्बल मिश्रण के संदर्भ में कहा था कि राज्य मिश्रण की जांच करे। अगर उसमें तंबाकू या तंबाकू डेरिवेटिव नहीं मिलता है तो उस मामले में अनुमति की आवश्यकता नहीं होगी।
मौजूदा फैसला व्यापक कानूनी प्रश्न पर केंद्रित है। इसमें डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया के भीतर ‘सर्विस’ देने पर नियम 4(3) की रोक की व्याख्या की गई है। अदालत के अनुसार वहां फूड, बेवरेज, टोबैको प्रोडक्ट, हर्बल प्रोडक्ट और हुक्का समेत किसी तरह की सर्विस उपलब्ध नहीं कराई जा सकती।
आगे क्या होगा?
अदालत ने सभी संबंधित याचिकाएं खारिज कर दीं और फैसले की कॉपी उत्तर प्रदेश के मुख्य सचिव और पुलिस महानिदेशक को जानकारी तथा ज़रूरी अनुपालन के लिए भेजने का निर्देश दिया।
बेंच ने राज्य सरकार से सार्वजनिक स्वास्थ्य की सुरक्षा के लिए ज़रूरी कदम उठाने की अपेक्षा भी जताई, जिसमें दूसरे राज्यों की तर्ज़ पर डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया में हुक्का सर्विस के लिए सख्त सज़ा से संबंधित नोटिफिकेशन पर विचार शामिल है। इसे जारी हो चुका नया नोटिफिकेशन नहीं समझा जाना चाहिए। अदालत ने राज्य से इस दिशा में विचार की अपेक्षा जताई है।
इस फैसले का व्यावहारिक असर उत्तर प्रदेश के उन रेस्तरां और प्रतिष्ठानों पर पड़ेगा जो डेज़िग्नेटेड स्मोकिंग एरिया का हवाला देकर हुक्का सर्विस उपलब्ध करा रहे थे।
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Asif Khan
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक,
अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।