अमेरिकी अपील कोर्ट ने ट्रंप के ज्यादातर टैरिफ गैरकानूनी बताए, राष्ट्रपति ने फैसले को खारिज कर सुप्रीम कोर्ट जाने का ऐलान किया।
New Delhi, (Shah Times)।अमेरिका की सियासत में एक बार फिर डोनाल्ड ट्रंप का विवाद सुर्ख़ियों में है। अमेरिकी अपील कोर्ट ने हाल ही में अपने ऐतिहासिक फ़ैसले में राष्ट्रपति ट्रंप द्वारा लगाए गए ज्यादातर टैरिफ को ग़ैरक़ानूनी क़रार दिया। अदालत का कहना है कि राष्ट्रपति के पास आपातकालीन शक्तियाँ तो हैं, मगर उन शक्तियों में "टैरिफ या टैक्स लगाने" का हक़ शामिल नहीं है।
ट्रंप ने इस फ़ैसले को पूरी तरह रिजेक्ट करते हुए कहा कि टैरिफ अब भी लागू रहेंगे। उनका दावा है कि अगर अदालत का फ़ैसला कायम रहा, तो यह अमेरिका को बर्बादी की ओर धकेल देगा। यह मुद्दा न सिर्फ़ अमेरिकी इकोनॉमी बल्कि पूरी वैश्विक ट्रेड पॉलिसी को हिला देने वाला साबित हो रहा है।
डोनाल्ड ट्रंप की आर्थिक नीति का सबसे बड़ा स्तंभ "टैरिफ वॉर" रहा है।
चीन, कनाडा, मैक्सिको और भारत जैसे देशों पर उन्होंने भारी टैरिफ लगाए।
उनकी दलील थी कि "Made in America" प्रोडक्ट्स को बचाने के लिए टैरिफ अनिवार्य हैं।
ट्रंप ने IEEPA (International Emergency Economic Powers Act, 1977) का सहारा लिया।
मगर अदालत का कहना है कि IEEPA कभी भी राष्ट्रपति को अनलिमिटेड टैरिफ लगाने का अधिकार देने के लिए नहीं बनाया गया था।
वॉशिंगटन डीसी स्थित US Court of Appeals for the Federal Circuit ने साफ़ कहा:
राष्ट्रपति के पास नेशनल इमरजेंसी घोषित करने का अधिकार है।
लेकिन टैक्स और टैरिफ का अधिकार केवल कांग्रेस को है।
IEEPA का इस्तेमाल दुश्मन देशों पर प्रतिबंध और संपत्ति ज़ब्त करने तक सीमित है, टैरिफ के लिए नहीं।
यह फ़ैसला ट्रंप की पूरी इकोनॉमिक स्ट्रैटेजी के लिए करारा झटका है।
ट्रंप ने Truth Social पर लिखा कि:
"सभी टैरिफ अभी भी लागू हैं।"
"यह फैसला बेहद पक्षपाती है।"
"अगर टैरिफ हटे तो अमेरिका तबाह हो जाएगा।"
उनकी भाषा में "इमोशनल ब्लैकमेल" का अंदाज़ साफ़ झलकता है। वे खुद को "राष्ट्र का रक्षक" बताकर टैरिफ को नेशनल इंटरेस्ट से जोड़ते हैं।
ट्रंप ने भारत पर 50% तक टैरिफ लगा दिया था।
Indian Shrimp Exports पर भारी असर पड़ा।
रुपये पर दबाव बढ़ा और यह रिकॉर्ड निचले स्तर पर गया।
निवेश कंपनी Jefferies ने इसे ट्रंप की निजी खुन्नस बताया।
चीन, जापान और यूरोपियन यूनियन के साथ अमेरिका के रिश्ते पहले से तनावपूर्ण हैं। इस कोर्ट फ़ैसले ने टैरिफ वॉर को और जटिल बना दिया।
कानूनी बाधा – अगर सुप्रीम कोर्ट भी अपील खारिज करता है तो ट्रंप की पूरी टैरिफ पॉलिसी ध्वस्त हो जाएगी।
वैश्विक विश्वसनीयता – अमेरिका अपने सहयोगियों के बीच "अनप्रीडिक्टेबल पार्टनर" बन चुका है।
घरेलू राजनीति – टैरिफ मुद्दा ट्रंप के चुनावी नैरेटिव का अहम हिस्सा है। अगर ये हाथ से गया तो उनकी "Economic Nationalism" कमज़ोर पड़ेगी।
अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग लंबे समय से दबाव में है।
चीन और दूसरे देशों ने अनुचित टैरिफ और सब्सिडी से अमेरिकी किसानों व प्रोड्यूसर्स को नुक़सान पहुँचाया।
टैरिफ हटने से अमेरिकी वर्कर्स और इंडस्ट्री और कमज़ोर हो सकते हैं।
यानी अदालत का फ़ैसला कानूनी दृष्टि से सही है, लेकिन आर्थिक दृष्टि से अमेरिका के लिए ख़तरनाक साबित हो सकता है।
अमेरिका अब एक क़ानूनी बनाम आर्थिक दुविधा में फँसा है।
अदालत का फ़ैसला संविधान और लोकतंत्र की बुनियाद को मज़बूत करता है।
लेकिन अगर टैरिफ पूरी तरह हटे, तो अमेरिकी इकोनॉमी और वर्कफोर्स पर भारी दबाव पड़ेगा।
सुप्रीम कोर्ट का अंतिम फैसला तय करेगा कि ट्रंप की "Economic Nationalism" बची रहेगी या इतिहास बन जाएगी।
भारत जैसे देशों के लिए यह डबल-एज्ड स्वॉर्ड है। एक ओर अमेरिकी बाज़ार खुल सकता है, दूसरी ओर निवेश और मुद्रा पर अस्थिरता बढ़ सकती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।