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आज़म–अखिलेश मुलाक़ात: सियासत का इम्तिहान या रिश्तों का इकरार?

None 2025-10-08 07:36:49
आज़म–अखिलेश मुलाक़ात: सियासत का इम्तिहान या रिश्तों का इकरार?

रामपुर से उठती सियासी हवा में पुराने रिश्तों की तपिश

अखिलेश की पहल, आज़म की नाराज़गी और सपा की अग्निपरीक्षा

📍 रामपुर, | 🗓️8 अक्टूबर 2025
|✍️ आसिफ़ ख़ान

सियासत में कभी वफ़ादारी का इम्तिहान होता है, तो कभी मौक़ों का हिसाब। लम्बे वक़्त बाद अखिलेश यादव की रामपुर यात्रा और आज़म ख़ान से मुलाक़ात ने एक बार फिर इस सवाल को ज़िंदा कर दिया है — क्या राजनीति में रिश्तों की अहमियत अब भी बाक़ी है या सब कुछ सिर्फ़ सियासी मजबूरियों का खेल बन चुका है? यह मुलाक़ात न सिर्फ़ एक नेता और पार्टी के बीच की दूरियों को पाटने की कोशिश है, बल्कि उस भरोसे को भी परखने का वक़्त है जो कभी समाजवादी आंदोलन की रूह हुआ करता था।

राजनीति में कोई भी मुलाक़ात यूँ ही नहीं होती। हर मुस्कुराहट के पीछे कोई मक़सद छिपा होता है और हर चुप्पी कुछ कहती है।आज रामपुर में जब अखिलेश यादव ने आज़म ख़ान के घर जाकर उनसे मुलाक़ात करेंगे ,तो तस्वीरें तो महज़ कुछ मिनटों की होगी, मगर उनके मायने बहुत गहरे होंगे।

आज़म ख़ान, जिन्होंने लम्बे अरसे तक समाजवादी पार्टी की पहचान को एक मजबूत चेहरा दिया, अब अपने ही घर में कुछ अजनबी महसूस करते हैं। 23 महीने जेल में गुज़ारने के बाद उनकी निगाहें उसी पार्टी पर थीं, जिसके लिए उन्होंने दशकों तक मेहनत की, लोगों से लड़े, और कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा। मगर जेल से बाहर आने के बाद उनका दर्द कई बार लफ़्ज़ों में छलका — “मुझे ताबेदारी से निज़ात मिली।” यह एक जुमला नहीं, बल्कि बीते सालों की तकलीफ़ों का बयान था।

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उनकी नाराज़गी के कई वज़ह हैं। जेल के दिनों में पार्टी का कोई बड़ा नेता हाल पूछने तक नहीं आया। ना अखिलेश यादव, ना कोई वरिष्ठ नेता रामपुर पहुँचा। उस वक़्त उनके समर्थकों ने महसूस किया कि सपा ने अपने पुराने साथी को अकेला छोड़ दिया। यही बात आज भी उनके दिल में चुभती है।

फिर टिकट बँटवारे का मसला आया। रामपुर की राजनीति में आज़म की राय को दरकिनार किया गया। जिन चेहरों को उन्होंने वर्षों तक तैयार किया, वही लोग अब दूसरे खेमों में नज़र आने लगे। यह सब कुछ किसी भी अनुभवी नेता के लिए असहज है। और यही वजह है कि कभी वे अखिलेश की तारीफ़ करते हैं, तो कभी इशारों में उनसे दूरी भी जताते हैं।

राजनीति में ऐसे मोड़ अक्सर आते हैं जब नेता अपनी आत्मा की सुनने लगता है। शायद आज़म भी अब वही कर रहे हैं — अपने आत्मसम्मान की खोज।

अखिलेश यादव के लिए यह मुलाक़ात महज़ एक सियासी यात्रा नहीं बल्कि एक चुनौती है। एक तरफ़ पार्टी के भीतर पुराने नेताओं की उपेक्षा के आरोप हैं, तो दूसरी तरफ़ संगठन को नई दिशा देने का दबाव। ऐसे में रामपुर जाकर आज़म ख़ान के साथ बैठना एक राजनीतिक “डैमेज कंट्रोल” के रूप में देखा जा रहा है।

पर क्या सिर्फ़ कैमरे के सामने मुस्कुराना रिश्तों को बहाल कर सकता है? शायद नहीं। रिश्ते भरोसे से बनते हैं और भरोसा वक्त से।

रामपुर की गलियों में अब भी लोग आज़म ख़ान को “अपना नेता” कहते हैं। उनके समर्थकों का दर्द यह है कि जिस आदमी ने सपा को उत्तर प्रदेश के पश्चिमी इलाक़े में मज़बूत किया, उसी को मुश्किल वक्त में तन्हा छोड़ दिया गया। उनकी ये पीड़ा केवल व्यक्तिगत नहीं है, बल्कि एक पूरे समुदाय की भावनाओं से जुड़ी है जो अब खुद को सियासी तौर पर असुरक्षित महसूस करता है।

दूसरी तरफ़ अखिलेश यादव भी जानते हैं कि अगर समाजवादी पार्टी को आने वाले चुनावों में मज़बूती चाहिए, तो पुराने रिश्तों को फिर से जोड़ना होगा। आज़म ख़ान जैसे नेताओं का प्रतीकात्मक महत्व आज भी बहुत बड़ा है। भले ही उनकी राजनीतिक सक्रियता पहले जैसी न हो, मगर उनके नाम का असर अब भी वोटों में महसूस किया जा सकता है।

इसलिए यह मुलाक़ात सिर्फ़ एक व्यक्तिगत मुलाक़ात नहीं है। यह समाजवादी पार्टी के लिए एक पैग़ाम है — कि पुरानी नींव को मज़बूत किए बिना नई इमारत खड़ी नहीं की जा सकती।

राजनीति में वक़्त सबसे बड़ा जज होता है। यह देखना दिलचस्प होगा कि आने वाले महीनों में यह मुलाक़ात सपा के भीतर नई ऊर्जा भरती है या सिर्फ़ एक तस्वीर बनकर रह जाती है।

जो लोग आज़म ख़ान को क़रीब से जानते हैं, वे बताते हैं कि उनका ग़ुस्सा उतना ही सच्चा है जितनी उनकी वफ़ादारी रही है। वह अपने अल्फ़ाज़ में तल्ख़ी रखते हैं, मगर उनके दिल में अब भी उम्मीद की चिंगारी है। शायद इसी वजह से जब अखिलेश उनसे मिलने आ रहे हैं।

कभी यही रिश्ता उत्तर प्रदेश की राजनीति का सबसे मज़बूत गठजोड़ हुआ करता था — अखिलेश की युवाशक्ति और आज़म का तजुर्बा। मगर वक्त की धूल ने इस साझेदारी पर कई सवाल खड़े कर दिए। अब वही वक्त दोनों के सामने है, इम्तिहान बनकर।

अगर अखिलेश यादव सच में सपा को एक समावेशी और भरोसेमंद दल बनाना चाहते हैं, तो उन्हें सिर्फ़ आज़म ही नहीं, बल्कि उन तमाम पुराने समाजवादियों को फिर से सम्मान देना होगा जिन्होंने पार्टी की बुनियाद रखी थी। यही लोकतंत्र की खूबसूरती है — मतभेदों में भी संवाद ढूँढना।

सियासत सिर्फ़ चुनाव जीतने का नाम नहीं है, यह रिश्ते निभाने की कला भी है। और यही कला आज की राजनीति से ग़ायब होती जा रही है। आज़म और अखिलेश की मुलाक़ात इस कमी को भरने की कोशिश करेगी ।

लोगों की निगाहें अब इस बात पर हैं कि क्या यह तस्वीर आने वाले दिनों में पार्टी की रणनीति में बदलाव लाएगी, या फिर यह भी बाकी राजनीतिक रस्मों की तरह बस एक औपचारिकता बनकर रह जाएगी।

रामपुर की हवा इस बार अलग है। सड़कों पर चर्चा है कि “अखिलेश आएंगे मिलने, बातें होंगी, पर दिलों की दूरियाँ मिटेंगी या नहीं?” यही सवाल इस मुलाक़ात की असली कसौटी है।

आज़म ख़ान शायद जानते हैं कि सियासत में भरोसा उतना ही नाज़ुक होता है जितना शीशा। एक बार टूट जाए तो आवाज़ बहुत देर तक गूंजती है। और अखिलेश यादव भी यह भलीभांति समझते हैं कि जो नेता अपने पुराने साथियों को भूल जाता है, वह जनता से भी दूर हो जाता है।

इस मुलाक़ात का असर चाहे जो भी हो, लेकिन यह साबित कर देगी कि राजनीति में संवाद अब भी ज़रूरी है। शायद यही लोकतंत्र की असली रूह है — बात करते रहना, भले मतभेद क्यों न हों।

नज़रिया

किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में सबसे बड़ी ताक़त संवाद और सम्मान होती है। जब नेता अपने पुराने साथियों से दूर हो जाते हैं, तो पार्टी की आत्मा कमज़ोर पड़ जाती है। आज़म और अखिलेश की यह मुलाक़ात हमें याद दिलाएगी कि सियासत में सिर्फ़ सत्ता नहीं, भरोसा और इंसानियत भी मायने रखती है।
जनता हमेशा देखती है कि मुश्किल वक़्त में कौन किसके साथ खड़ा रहा। यही लोकतंत्र की सच्ची पहचान है — जवाबदेही और विश्वास।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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