आजम खान की रिहाई 23 महीने के इंतज़ार के बाद मुमकिन हुई है। सीतापुर जेल से बाहर आने के बाद उनका राजनीतिक भविष्य और सपा-बसपा गठजोड़ की चर्चाएं नए सियासी मोड़ की ओर इशारा कर रही हैं।हालांकि, मुरादाबाद कोर्ट से रिहाई का अभी जारी नहीं हुआ, जिससे “आजम खान आज नहीं हो पाएंगे रिहा?” जैसे सवाल उठ रहे हैं।
Lucknow, (Shah Times1)। उत्तर प्रदेश की राजनीति में आजम खान की रिहाई का मुद्दा पिछले कई महीनों से गर्म रहा है। सीतापुर और मुरादाबाद की कोर्ट में लंबित मामलों के बावजूद, आज़म खान के वकीलों ने उच्च न्यायालय से ज़मानत दिलाकर उनकी रिहाई का रास्ता साफ कर दिया है। लेकिन, “आजम खान आज नहीं हो पाएंगे रिहा?” यह सवाल मीडिया और समर्थकों के बीच लगातार गूंज रहा था, क्योंकि आज़म खान की रिहाई अटक गई है. मुरादाबाद कोर्ट से अभी रिहाई का परवाना जारी नहीं हुआ है।
समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेता आजम खान की रिहाई सिर्फ व्यक्तिगत घटना नहीं, बल्कि पूरे प्रदेश की सियासी तस्वीर को प्रभावित करने वाली है। उनके जेल से बाहर आने की प्रक्रिया में प्रशासनिक तैयारियों और सुरक्षा इंतज़ामों के चलते थोड़ी देरी हुई। जेल प्रशासन ने समर्थकों की भीड़ को नियंत्रित करने के लिए सुरक्षा कर्मियों को तैनात किया और ट्रैफिक के लिहाज से जेल के आसपास कई वाहन चालान किए गए।
अदीब आजम ने इसे पूरे प्रदेश के लिए खुशी का दिन बताया। उन्होंने कहा, "आज के हीरो आजम खान हैं, जो बोलेंगे वही बोलेंगे।" समर्थक भी इस मौके को ईद के दिन के समान मान रहे हैं। उनके जेल से बाहर आने के बाद सपा में नई ऊर्जा देखने को मिलेगी और आगामी चुनावों पर इसका प्रभाव भी पड़ेगा।
राजनीतिक जानकार मानते हैं कि आजम खान की रिहाई न केवल सपा के संगठनात्मक ढांचे को मजबूत करेगी, बल्कि 2027 के चुनावों में भी सपा की स्थिति को मजबूती देगी। उनके समर्थक मानते हैं कि जेल से बाहर आने के बाद पार्टी में नई रणनीति और आंदोलन की लहर देखने को मिलेगी।
हालांकि, राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि आजम खान का अगला कदम क्या होगा। हाल ही में तजीन फात्मा और बसपा प्रमुख मायावती की मुलाकात ने यह कयास और मजबूत कर दिए हैं कि भविष्य में दलित-मुस्लिम गठजोड़ की संभावनाएं बन सकती हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का कहना है कि यह मुलाकात संयोग नहीं थी और इसमें आजम खान की राजनीतिक सक्रियता प्रमुख भूमिका निभा रही है।
लोकसभा चुनावों में टिकट बंटवारे के दौरान अखिलेश यादव और आजम खान के रिश्तों में जो खटास आई थी, वह भी चर्चा का विषय रही। आजम खान ने रामपुर लोकसभा सीट से चुनाव लड़ने का सुझाव दिया था, जिसे अखिलेश यादव ने ठुकरा दिया। इसके बावजूद, आजम खान की राजनीतिक पकड़ सपा के भीतर मजबूत बनी हुई है।
सीतापुर जेल में बंद रहते हुए आजम खान पर दर्ज लगभग 96 मामलों में से कई में उन्हें जमानत मिल चुकी है। उनके वकील जुबैर अहमद खान के अनुसार, सभी मामलों में रिहाई का परवाना जेल प्रशासन को मिल चुका है। इनमें डूंगरपुर प्रकरण, क्वालिटी बार केस और कई संपत्ति से जुड़े मामले शामिल हैं।
सपा का आरोप है कि भाजपा सरकार ने झूठे मुकदमों के जरिए आजम खान को लंबे समय तक जेल में रखा। उनके समर्थक मानते हैं कि उन्हें फर्जी मुकदमों में फंसाया गया और जेल में उनकी सुविधाएँ भी सीमित रही।
जेल प्रशासन ने भी आजम खान की रिहाई को लेकर सुरक्षा और प्रशासनिक इंतज़ाम किए हैं। समर्थकों और कार्यकर्ताओं का उत्साह इसे और बढ़ा रहा है। जेल के आसपास बड़ी संख्या में पुलिसकर्मी तैनात किए गए थे ताकि भीड़ नियंत्रण और सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सियासी विश्लेषकों के अनुसार, आजम खान की रिहाई सिर्फ व्यक्तिगत मुक्ति नहीं, बल्कि उत्तर प्रदेश की राजनीति में बड़े बदलाव का संकेत है। इससे न केवल सपा की स्थिति मजबूत होगी, बल्कि उनके विरोधियों के लिए भी नई रणनीतियाँ बनाना चुनौतीपूर्ण हो जाएगा।
आजम खान की रिहाई के बाद उनके नए राजनीतिक ठिकाने को लेकर भी कयास
आजम खान की रिहाई के बाद उनके नए राजनीतिक ठिकाने को लेकर भी कयास लगाए जा रहे हैं। हालांकि, सपा के वरिष्ठ नेता कहते हैं कि आजम खान केवल सपा में ही सक्रिय रहेंगे और दूसरे दलों में शामिल होने की चर्चा निराधार है।
जेल में बंद रहते हुए आजम खान ने अपनी राजनीतिक पकड़ बनाए रखी। उनके समर्थक अलग-अलग जिलों से सीतापुर जेल के बाहर पहुंचे और स्वागत की तैयारी की। यह दर्शाता है कि उनका प्रभाव केवल व्यक्तिगत नहीं, बल्कि पूरे सपा संगठन और समर्थकों के बीच मजबूत है।
इस पूरी प्रक्रिया में कोर्ट और प्रशासन का योगदान भी महत्वपूर्ण रहा। हाईकोर्ट और सेशन कोर्ट ने उनके कई मामलों में जमानत प्रदान की, जिससे कुल 72 मामलों में रिहाई के आदेश मिल चुके हैं। वकील जुबैर अहमद खान के अनुसार, बाकी मामलों के परवाने भी सीतापुर जेल भेज दिए गए हैं, जिससे अब उनके जेल से बाहर आने की राह साफ हो गई है।
आजम खान की रिहाई सपा के लिए सिर्फ खुशी का मौका नहीं, बल्कि आगामी चुनावों में रणनीतिक बदलाव का संकेत है। उनके समर्थक इसे 'ईद का दिन' मान रहे हैं, जबकि राजनीतिक प्रतिद्वंद्वी इसके प्रभाव का आकलन कर रहे हैं।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।