जंतर-मंतर और संसद मार्च के दौरान पुलिस कार्रवाई पर सुप्रीम कोर्ट ने स्वतंत्र जांच की दिशा में कदम बढ़ाया है। अदालत ने प्रदर्शनकारियों और पुलिस, दोनों पक्षों के आरोपों की निष्पक्ष पड़ताल की जरूरत जताई। मामला शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार, पुलिस बल के इस्तेमाल और जवाबदेही के व्यापक सवाल से जुड़ा है।
लोकेशन: नई दिल्ली
तारीख: 20 अगस्त 2026
बाय: Mohd Naved
जंतर-मंतर पर प्रदर्शनकारियों के खिलाफ पुलिस कार्रवाई अब केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप का मामला नहीं रही। सुप्रीम कोर्ट ने घटनाओं की स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच की दिशा में कदम बढ़ाया है। विवाद का केंद्र 20 जुलाई को जंतर-मंतर से संसद की ओर प्रस्तावित मार्च के दौरान हुआ टकराव और पुलिस बल के इस्तेमाल के आरोप हैं।
अदालत के सामने याचिकाओं में पुलिस पर जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग, लाठीचार्ज, आंसू गैस और दूसरे तरीकों के इस्तेमाल के आरोप लगाए गए हैं। दिल्ली पुलिस ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि भीड़ के एक हिस्से ने बैरिकेड तोड़े और संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की, जिसके बाद कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए कार्रवाई करनी पड़ी।
20 जुलाई को जंतर-मंतर पर बड़ी संख्या में प्रदर्शनकारी जमा हुए थे। प्रदर्शन का संबंध परीक्षा में कथित अनियमितताओं और पेपर लीक के मुद्दे से था। प्रदर्शनकारियों की ओर से संसद की तरफ मार्च का आह्वान किया गया।
दिल्ली पुलिस का कहना है कि संसद सत्र शुरू होने के मद्देनजर नई दिल्ली इलाके में सुरक्षा व्यवस्था कड़ी थी और प्रस्तावित मार्च को अनुमति नहीं मिली थी। पुलिस के मुताबिक भीड़ के कुछ हिस्सों ने सुरक्षा घेरा तोड़ने की कोशिश की, जिसके बाद स्थिति को नियंत्रित करने के लिए बल का इस्तेमाल किया गया।
दूसरी तरफ याचिकाकर्ताओं ने पुलिस कार्रवाई को जरूरत से ज्यादा बताया है। सुप्रीम कोर्ट के सामने आरोपों में लाठीचार्ज और अन्य बल प्रयोग से गंभीर चोटें लगने की बातें भी रखी गईं। जुलाई के एक आदेश में अदालत ने इन आरोपों को प्रथम दृष्टया स्वतंत्र जांच के योग्य माना था।
इस पूरे विवाद का सबसे अहम पहलू शांतिपूर्ण प्रदर्शन के संवैधानिक अधिकार और सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखने की राज्य की जिम्मेदारी के बीच संतुलन है।
सुप्रीम कोर्ट ने जुलाई में कहा था कि शांतिपूर्ण और वैध प्रदर्शन संविधान के तहत संरक्षित है। अदालत ने यह भी संकेत दिया था कि केवल प्रदर्शन होने के आधार पर पुलिस अत्यधिक बल का इस्तेमाल नहीं कर सकती। साथ ही अदालत ने प्रदर्शन के दौरान अनुशासन और कानून-व्यवस्था की जरूरत को भी रेखांकित किया।
यही वजह है कि मौजूदा जांच का दायरा केवल यह तय करने तक सीमित नहीं रहेगा कि लाठीचार्ज हुआ या नहीं। असल सवाल यह होगा कि उस समय पुलिस के सामने स्थिति क्या थी, बल प्रयोग किस स्तर पर किया गया और क्या इस्तेमाल किया गया बल परिस्थितियों के अनुपात में था।
20 जुलाई की घटना के बाद पुलिस कार्रवाई को लेकर दिल्ली हाई कोर्ट और फिर सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं पहुंचीं।
सुप्रीम कोर्ट ने बाद की सुनवाई में छात्रों की गिरफ्तारी और उनके खिलाफ कार्रवाई को लेकर भी अंतरिम निर्देश दिए। अदालत ने नाबालिग छात्रों को रिहा करने और प्रदर्शन में शामिल छात्रों के खिलाफ तत्काल कठोर कार्रवाई से बचने की दिशा में निर्देश दिए थे।
अदालत ने सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-कैम रिकॉर्डिंग और वायरलेस कम्युनिकेशन जैसे डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश भी दिया। इससे जांच में इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों की भूमिका अहम हो जाती है।
बाद में सरकार की ओर से प्रदर्शन से जुड़े छात्रों के खिलाफ मामलों को आगे न बढ़ाने को लेकर भी अदालत में आश्वासन दिया गया। हालांकि गंभीर आपराधिक मामलों या पुराने गंभीर आपराधिक रिकॉर्ड वाले लोगों को अलग श्रेणी में रखा गया।
प्रदर्शनकारियों और याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि पुलिस ने भीड़ को नियंत्रित करने के नाम पर जरूरत से ज्यादा बल का इस्तेमाल किया। याचिकाओं में पुलिस कार्रवाई से गंभीर चोटों के आरोप लगाए गए हैं।
दिल्ली पुलिस का पक्ष अलग है। पुलिस ने सुप्रीम कोर्ट में कहा कि प्रदर्शन शांतिपूर्ण नहीं रहा था और कुछ लोगों ने बैरिकेड तोड़कर संसद की ओर बढ़ने की कोशिश की। पुलिस ने यह भी कहा कि उसके कई कर्मी घायल हुए। एक रिपोर्ट के मुताबिक पुलिस ने 240 से ज्यादा कर्मियों के घायल होने की बात अदालत के सामने रखी।
इसलिए मौजूदा स्थिति में किसी एक पक्ष के आरोप को अंतिम तथ्य मानना उचित नहीं होगा। यही वजह है कि स्वतंत्र जांच की जरूरत सामने आई है।
इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य वीडियो रिकॉर्डिंग, सीसीटीवी फुटेज, ड्रोन फुटेज, बॉडी-कैम रिकॉर्डिंग, वायरलेस संचार और मेडिकल रिकॉर्ड होंगे।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही कई तरह के डिजिटल साक्ष्यों को सुरक्षित रखने का निर्देश दिया था। इसका मतलब है कि जांच में घटनाक्रम को केवल प्रत्यक्षदर्शियों के बयान के आधार पर नहीं देखा जाएगा। उपलब्ध रिकॉर्ड से घटनाओं का क्रम स्थापित करने की कोशिश होगी।
एक और अहम पहलू यह है कि पुलिस ने अपने हलफनामे में अत्यधिक बल प्रयोग से इनकार किया है। इसलिए जांच समिति के सामने दो अलग नैरेटिव होंगे। एक तरफ पुलिस की कानून-व्यवस्था संबंधी दलील होगी, दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की पुलिस ज्यादती संबंधी शिकायतें।
अगर जांच में पुलिस बल का इस्तेमाल अनुपातहीन पाया जाता है, तो इससे जवाबदेही तय करने की प्रक्रिया आगे बढ़ सकती है। इसके उलट अगर जांच में यह सामने आता है कि भीड़ ने गंभीर रूप से सुरक्षा घेरा तोड़ा और पुलिस की कार्रवाई परिस्थितियों के अनुपात में थी, तो पुलिस के पक्ष को मजबूती मिलेगी।
इस जांच का असर भविष्य के प्रदर्शनों पर भी पड़ सकता है। पुलिस बल के इस्तेमाल के लिए स्पष्ट मानक, वीडियो रिकॉर्डिंग और कमांड जिम्मेदारी जैसे मुद्दों पर व्यापक दिशा-निर्देश सामने आ सकते हैं।
यह मामला केवल एक प्रदर्शन तक सीमित नहीं है। इसका संबंध भारत में विरोध प्रदर्शन के अधिकार और राज्य की प्रतिक्रिया से जुड़े बड़े संवैधानिक विमर्श से है।
सुप्रीम कोर्ट ने पहले ही शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार और कानून-व्यवस्था के बीच संतुलन की जरूरत पर जोर दिया है। अदालत ने राष्ट्रीय स्तर पर एक समान प्रोटोकॉल की आवश्यकता की ओर भी संकेत किया था।
ऐसे में जांच का निष्कर्ष भविष्य में पुलिस प्रशिक्षण, भीड़ नियंत्रण और सार्वजनिक प्रदर्शनों के प्रबंधन की नीति को प्रभावित कर सकता है।
प्रत्यक्ष आर्थिक असर इस मामले में प्रमुख मुद्दा नहीं है। सामाजिक असर अधिक महत्वपूर्ण है।
युवा प्रदर्शनकारियों और पुलिस के बीच टकराव की तस्वीरें सार्वजनिक संस्थानों पर भरोसे को प्रभावित कर सकती हैं। दूसरी तरफ पुलिस बल पर हमला या सुरक्षा व्यवस्था तोड़ने की घटनाएं कानून-व्यवस्था के प्रति चिंता बढ़ाती हैं।
इसलिए जवाबदेही दोनों तरफ की गतिविधियों की निष्पक्ष जांच से ही तय हो सकती है।
भारत में शांतिपूर्ण प्रदर्शन का अधिकार संविधान के अनुच्छेद 19 से जुड़ा व्यापक लोकतांत्रिक प्रश्न है। इसलिए सुप्रीम कोर्ट की जांच और उससे निकलने वाली गाइडलाइन का महत्व केवल दिल्ली तक सीमित नहीं रहेगा।
अगर अदालत भविष्य में पुलिस कार्रवाई के लिए स्पष्ट राष्ट्रीय मानक तय करती है, तो दूसरे राज्यों में भी प्रदर्शन प्रबंधन की नीति पर इसका असर पड़ सकता है।
सबसे बड़ा सवाल यही है कि 20 जुलाई को घटनाओं का वास्तविक क्रम क्या था।
क्या भीड़ ने पहले सुरक्षा घेरा तोड़ा या पुलिस ने पहले बल प्रयोग किया? किस स्तर पर बल प्रयोग का आदेश दिया गया? इस्तेमाल किए गए उपकरणों और तरीकों की जरूरत कितनी थी? कितने प्रदर्शनकारी और पुलिसकर्मी घायल हुए? वीडियो रिकॉर्डिंग इन सवालों का कितना स्पष्ट जवाब देती है?
इन सवालों का जवाब जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों से मिलेगा। अभी किसी निष्कर्ष को अंतिम तथ्य मानना जल्दबाजी होगी।
सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में प्रस्तावित जांच का सबसे अहम काम दोनों पक्षों के दावों की स्वतंत्र पड़ताल करना होगा। समिति को उपलब्ध वीडियो, पुलिस रिकॉर्ड, मेडिकल दस्तावेज और संबंधित पक्षों के बयान देखने होंगे।
जांच का निष्कर्ष यह तय करने में अहम होगा कि पुलिस कार्रवाई निर्धारित मानकों के अनुरूप थी या नहीं। साथ ही यह भी देखा जा सकता है कि भविष्य में ऐसे प्रदर्शनों के दौरान पुलिस और आयोजकों के लिए कौन से स्पष्ट प्रोटोकॉल जरूरी हैं।
जंतर-मंतर की घटना में दो संवैधानिक हित एक साथ मौजूद हैं। नागरिकों को शांतिपूर्ण और वैध विरोध का अधिकार है। राज्य को सार्वजनिक व्यवस्था और सुरक्षा बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है।
इस मामले में अंतिम फैसला आरोपों या राजनीतिक दावों से नहीं, बल्कि स्वतंत्र जांच और उपलब्ध साक्ष्यों से होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप इसी जवाबदेही की दिशा में महत्वपूर्ण कदम है। जांच का वास्तविक महत्व इस बात में होगा कि वह पुलिस कार्रवाई और प्रदर्शनकारियों के आचरण, दोनों का निष्पक्ष आकलन करती है।
Shah Times Reporter
शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।