सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज़ की NSA के तहत हिरासत रद्द कर दी। अदालत ने कहा, पुलिस में दिया कबूलनामा अकेले हिरासत का आधार नहीं बन सकता। इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला रद्द हुआ। उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख लागत लगाई गई। आपराधिक मामलों के गुण-दोष प्रभावित नहीं हुए।
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📍New Delhi 📰 30 सितंबर 2026 ✍️ Apurva Choudhary
संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला
संभल हिंसा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुल्ला अफरोज़ को बड़ी कानूनी राहत दी है। जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून यानी NSA के तहत उनकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया। अदालत ने साथ ही इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस फैसले को भी निरस्त कर दिया, जिसमें अफरोज़ की हिरासत को बरकरार रखा गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई है। यह राशि मुल्ला अफरोज़ को एक महीने के भीतर दिए जाने का निर्देश दिया गया है। अदालत ने यह भी निर्देश दिया कि अफरोज़ को तत्काल रिहा किया जाए, बशर्ते किसी दूसरे मामले में उनकी हिरासत जरूरी न हो।
पुलिस हिरासत के कबूलनामे पर अदालत की अहम टिप्पणी
मामले में सबसे अहम सवाल उस कथित कबूलनामे से जुड़ा था, जिसे पुलिस हिरासत के दौरान दर्ज किए जाने की बात कही गई थी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पुलिस के सामने दिए गए कथित कबूलनामे को अकेले निवारक हिरासत का आधार नहीं बनाया जा सकता।
अदालत के मुताबिक निवारक हिरासत के लिए संबंधित प्राधिकारी के पास स्वतंत्र और पर्याप्त सामग्री होनी चाहिए। सिर्फ किसी आपराधिक मामले में आरोपी बनाए जाने या पुलिस के सामने कथित बयान दिए जाने से NSA के तहत हिरासत की वैधता स्वतः स्थापित नहीं होती।
पीठ ने यह भी देखा कि हिरासत आदेश में जिन सामग्रियों पर भरोसा किया गया, उनके संदर्भ में जरूरी कानूनी कसौटियां पूरी नहीं हुई थीं। अदालत ने हिरासत के लिए दर्ज की गई संतुष्टि और उपलब्ध सामग्री के बीच पर्याप्त संबंध की आवश्यकता पर जोर दिया।
निवारक हिरासत को दंडात्मक कार्रवाई नहीं बनाया जा सकता
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में निवारक हिरासत की प्रकृति को लेकर भी महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने स्पष्ट किया कि Preventive Detention का उद्देश्य किसी व्यक्ति को उसके कथित अपराध के लिए सजा देना नहीं है।
निवारक हिरासत का इस्तेमाल भविष्य में सार्वजनिक व्यवस्था या राज्य की सुरक्षा के लिए संभावित खतरे को रोकने के लिए किया जाता है। अदालत ने कहा कि इसे किसी व्यक्ति को लंबे समय तक हिरासत में रखने के वैकल्पिक रास्ते के तौर पर इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।
फैसले में यह भी सामने आया कि अफरोज़ को संबंधित आपराधिक मामलों में जमानत मिलने के बाद भी NSA के तहत हिरासत में रखा गया था। सुप्रीम कोर्ट ने इस परिस्थिति को निवारक हिरासत के उद्देश्य के संदर्भ में महत्वपूर्ण माना।
इलाहाबाद हाई कोर्ट का फैसला भी रद्द
मुल्ला अफरोज़ ने NSA के तहत अपनी हिरासत को चुनौती देते हुए इलाहाबाद हाई कोर्ट का रुख किया था। हाई कोर्ट ने 8 जून 2026 को उनकी याचिका खारिज करते हुए हिरासत को बरकरार रखा था।
इसके बाद अफरोज़ ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाई कोर्ट के फैसले को भी रद्द कर दिया और संबंधित NSA हिरासत तथा उसके बाद की पुष्टि के आदेश को निरस्त कर दिया।
अक्टूबर 2025 में लगाया गया था NSA
मुल्ला अफरोज़ को संभल में नवंबर 2024 में हुई हिंसा के सिलसिले में 17 जनवरी 2025 को गिरफ्तार किया गया था। बाद में 13 अक्टूबर 2025 को संभल के जिला मजिस्ट्रेट ने राष्ट्रीय सुरक्षा कानून की धारा 3(2) के तहत उनकी निवारक हिरासत का आदेश जारी किया।
राज्य सरकार ने इस आदेश की पुष्टि की थी और हिरासत की अवधि एक साल तक निर्धारित की गई थी। अफरोज़ ने इस कार्रवाई को हाई कोर्ट में चुनौती दी, लेकिन वहां राहत नहीं मिलने के बाद मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
नवंबर 2024 की संभल हिंसा से जुड़ा मामला
यह पूरा मामला 24 नवंबर 2024 को संभल में हुई हिंसा से जुड़ा है। उस दिन शाही जामा मस्जिद के कोर्ट-निर्देशित सर्वे के दौरान इलाके में तनाव बढ़ गया था और बाद में प्रदर्शनकारियों तथा सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प हुई थी।
इस हिंसा में चार लोगों की मौत हुई थी और कई लोग घायल हुए थे। घटना के बाद पुलिस ने कई लोगों के खिलाफ मुकदमे दर्ज किए और जांच के दौरान अलग-अलग आरोपियों की गिरफ्तारी हुई।
अफरोज़ पर अभियोजन पक्ष की ओर से हिंसा को भड़काने और उसमें भूमिका निभाने जैसे गंभीर आरोप लगाए गए। हालांकि ये आरोप आपराधिक मुकदमे के स्तर पर विचाराधीन हैं और सुप्रीम कोर्ट के मौजूदा फैसले को उनकी दोषसिद्धि या निर्दोषता का फैसला नहीं माना जा सकता।
सुप्रीम कोर्ट ने आपराधिक केस पर फैसला नहीं दिया
इस मामले में एक महत्वपूर्ण कानूनी अंतर समझना जरूरी है। सुप्रीम कोर्ट का फैसला NSA के तहत निवारक हिरासत की वैधता से संबंधित है। अदालत ने यह नहीं कहा कि अफरोज़ के खिलाफ दर्ज आपराधिक मामलों में लगाए गए आरोप सही हैं या गलत।
अदालत ने आपराधिक मामलों के गुण-दोष पर कोई अंतिम राय नहीं दी है। इसलिए NSA हिरासत रद्द होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित आपराधिक मुकदमे अपने आप खत्म हो गए या उनमें आरोपी को दोषमुक्त घोषित कर दिया गया।
54 दिन बाद गिरफ्तारी का मुद्दा भी सामने आया
सुनवाई के दौरान अफरोज़ की ओर से गिरफ्तारी के समय और पुलिस की कार्रवाई को लेकर भी सवाल उठाए गए। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक हिंसा की घटना के करीब 54 दिन बाद उन्हें गिरफ्तार किया गया था।
सुप्रीम कोर्ट ने इस अंतराल और जांच में उपलब्ध सामग्री के संदर्भ में भी सवालों पर विचार किया। अदालत ने यह जांचा कि जब जांच एजेंसी के पास कथित तौर पर अन्य सामग्री उपलब्ध थी, तो गिरफ्तारी और बाद की निवारक हिरासत के लिए किन आधारों पर कार्रवाई की गई।
सरकार ने क्या तर्क दिया था
उत्तर प्रदेश सरकार की ओर से यह पक्ष रखा गया था कि अफरोज़ की रिहाई से दोबारा हिंसा या सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने का खतरा हो सकता है। राज्य ने निवारक हिरासत को कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए जरूरी बताया था।
सरकार की दलील थी कि उपलब्ध सामग्री और संभावित खतरे को देखते हुए प्रशासन ने NSA का इस्तेमाल किया। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने हिरासत के लिए इस्तेमाल सामग्री और प्रशासन की संतुष्टि की कानूनी पर्याप्तता की जांच के बाद आदेश को टिकाऊ नहीं माना।
₹10 लाख की लागत क्यों महत्वपूर्ण है
सुप्रीम कोर्ट ने सिर्फ NSA हिरासत रद्द नहीं की, बल्कि उत्तर प्रदेश सरकार पर ₹10 लाख की लागत भी लगाई। यह राशि अफरोज़ को दिए जाने का निर्देश है।
अदालत का यह कदम निवारक हिरासत की संवैधानिक और कानूनी सीमाओं पर उसकी गंभीरता को दर्शाता है। फैसला इस बात पर जोर देता है कि किसी व्यक्ति की व्यक्तिगत स्वतंत्रता को सीमित करने वाली कार्रवाई के लिए प्रशासन को कानून के निर्धारित मानकों और पर्याप्त सामग्री का पालन करना होगा।
फैसले का व्यापक कानूनी महत्व
NSA के तहत निवारक हिरासत सामान्य आपराधिक गिरफ्तारी से अलग व्यवस्था है। इसका उद्देश्य किसी व्यक्ति को भविष्य में संभावित नुकसानदायक गतिविधि से रोकना है, न कि पहले से किए गए कथित अपराध के लिए सजा देना।
संभल मामले में सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसी अंतर को रेखांकित करता है। अदालत ने स्पष्ट किया कि निवारक हिरासत के लिए केवल आपराधिक आरोप या पुलिस हिरासत में कथित बयान पर्याप्त नहीं हो सकता। प्रशासन को स्वतंत्र, प्रासंगिक और पर्याप्त सामग्री के आधार पर अपनी संतुष्टि दर्ज करनी होगी।
अफरोज़ की आगे की कानूनी स्थिति
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद NSA के तहत उनकी हिरासत समाप्त हो गई है। अदालत ने उनकी रिहाई का निर्देश दिया है, लेकिन यह शर्त रखी गई है कि अगर किसी दूसरे मामले में उनकी हिरासत कानूनी रूप से जरूरी है, तो वह अलग प्रश्न होगा।
इसलिए मौजूदा फैसला अफरोज़ को NSA हिरासत से राहत देता है, लेकिन संभल हिंसा से जुड़े अन्य आपराधिक मामलों की न्यायिक प्रक्रिया अपने स्तर पर जारी रह सकती है।