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BITS Pilani ने CO₂ से DME बनाने की तकनीक विकसित की

Apurva Choudhary 2026-08-14 19:06:24
BITS Pilani ने CO₂ से DME बनाने की तकनीक विकसित की
BITS Pilani हैदराबाद के शोधकर्ताओं ने कैप्चर किए गए CO₂ और हाइड्रोजन से DME बनाने की सिंगल-स्टेप तकनीक विकसित की है। यह प्रक्रिया LPG के साथ संभावित मिश्रण के लिए उपयोगी हो सकती है। तकनीक का लैब वैलिडेशन पूरा हो चुका है, जबकि पायलट-स्केल विकास अगला चरण है। व्यावसायिक इस्तेमाल अभी भविष्य का विषय है।
LOCATION | DATE | BYLINE
हैदराबाद, तेलंगाना | 14 अगस्त 2026 | Apurva Choudhary 

BITS Pilani की CO₂ से DME तकनीक क्या है
BITS Pilani के हैदराबाद कैंपस के शोधकर्ताओं ने औद्योगिक उत्सर्जन से हासिल किए गए कार्बन डाइऑक्साइड यानी CO₂ को डाइमेथाइल ईथर यानी DME में बदलने की सिंगल-स्टेप तकनीक विकसित की है। यह रिसर्च ऐसे समय सामने आई है जब भारत अपनी LPG जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है और वैकल्पिक घरेलू ईंधन की तलाश ऊर्जा सुरक्षा के लिहाज से अहम बनी हुई है।
13 अगस्त 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट के मुताबिक BITS Pilani की टीम ने इस तकनीक का लैब वैलिडेशन पूरा कर लिया है और अब इसे पायलट-स्केल विकास की दिशा में ले जाने की तैयारी है। इसका मतलब यह नहीं है कि CO₂ से बना DME अभी बाजार में घरेलू LPG की जगह उपलब्ध हो गया है; फिलहाल यह रिसर्च और स्केल-अप के चरण में है।

CO₂ से DME बनाने में क्या है नया
परंपरागत DME उत्पादन में आम तौर पर कई चरण शामिल होते हैं। पहले CO₂ को मेथनॉल में बदला जाता है और उसके बाद मेथनॉल को DME में परिवर्तित किया जाता है। BITS Pilani की टीम ने इन दोनों रिएक्शन को एक ही प्रक्रिया में जोड़ने की कोशिश की है।
इस प्रक्रिया में विशेष रूप से डिजाइन किए गए कैटेलिस्ट और हाई-प्रेशर रिएक्टर कॉन्फिगरेशन का इस्तेमाल किया गया। BITS Pilani के आधिकारिक रिसर्च रिकॉर्ड में इस प्रोजेक्ट का शीर्षक thermal power plant exhaust से CO₂ को “single step” में DME में बदलने से जुड़ा है।
सिंगल-स्टेप प्रक्रिया का संभावित फायदा यह है कि अलग-अलग रिएक्शन के लिए अलग चरणों की जरूरत कम हो सकती है। हालांकि, कम इंजीनियरिंग जटिलता या कम ऊर्जा खपत जैसे संभावित फायदे बड़े पैमाने पर औद्योगिक परीक्षण के बाद ही निर्णायक रूप से आंके जा सकेंगे। इसलिए इस तकनीक को फिलहाल promising research कहना अधिक सटीक है।

शोध में किन वैज्ञानिकों की भूमिका रही
इस प्रोजेक्ट का नेतृत्व BITS Pilani Hyderabad Campus के प्रोफेसर सौनक रॉय ने किया। उनके साथ प्रोफेसर बी.एम. रेड्डी और प्रोफेसर सत्यपाल ए. सिंह भी रिसर्च टीम का हिस्सा रहे। संस्थान की जानकारी और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार इस काम में undergraduate, postgraduate और PhD स्तर के छात्रों ने भी योगदान दिया।
BITS Pilani के आधिकारिक रिसर्च रिकॉर्ड में इस प्रोजेक्ट को SERB, Department of Science and Technology से जुड़े Core Research Grant के तहत सूचीबद्ध किया गया है। प्रोजेक्ट की स्वीकृत राशि ₹44,69,696 दर्ज है और इसका मूल रिसर्च टाइमलाइन 2022 से 2025 तक दिया गया है।
मीडिया रिपोर्टिंग में इस प्रोजेक्ट को ANRF-backed research के रूप में भी संदर्भित किया गया है। फंडिंग एजेंसी के नाम और संस्थागत बदलाव के संदर्भ में अलग-अलग रिकॉर्ड की भाषा को देखते हुए यहां मुख्य तथ्य रिसर्च प्रोजेक्ट और उसके वैज्ञानिक परिणाम पर रखना अधिक उचित है।

DME क्या है और LPG से इसका क्या संबंध है
DME यानी Dimethyl Ether एक ऐसा ईंधन है जिसका इस्तेमाल विभिन्न energy applications में किया जा सकता है। इसकी कुछ भौतिक विशेषताएं LPG के प्रमुख घटकों से मिलती-जुलती हैं, जिसके कारण DME-LPG blend को cooking fuel के संदर्भ में लंबे समय से research किया जाता रहा है।
भारत में Bureau of Indian Standards ने IS 18698:2024 के तहत 20 प्रतिशत DME blended LPG के लिए specification जारी की है। इस standard का scope household, commercial और industrial applications में इस्तेमाल होने वाले 20 प्रतिशत DME-LPG blend से संबंधित है।
इसलिए BITS Pilani की रिसर्च का महत्व सिर्फ CO₂ utilization तक सीमित नहीं है। अगर भविष्य में तकनीक बड़े पैमाने पर आर्थिक और तकनीकी रूप से सफल होती है, तो उत्पादित DME को मौजूदा regulatory framework के तहत LPG blending के संभावित रास्ते से जोड़ा जा सकता है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि BITS की तकनीक से बना DME अभी घरेलू LPG cylinders में इस्तेमाल हो रहा है।

भारत के लिए LPG आयात का मुद्दा क्यों अहम है
भारत अपनी LPG खपत का करीब 60 प्रतिशत आयात करता है। Petroleum Ministry ने 2026 में कई आधिकारिक बयानों में इस आंकड़े की पुष्टि की है। इसका मतलब है कि वैश्विक LPG कीमतों, supply chains और geopolitical developments का भारतीय energy market पर सीधा असर पड़ सकता है।
इसी संदर्भ में घरेलू स्तर पर वैकल्पिक fuel technologies का विकास energy security के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जा सकता है। यदि किसी technology में industrial emissions को feedstock की तरह इस्तेमाल कर fuel बनाया जा सके, तो इसमें carbon utilization और fuel diversification दोनों का संभावित पहलू जुड़ता है।
हालांकि, किसी research technology से सीधे LPG imports में कमी का दावा करना अभी जल्दबाजी होगा। इसके लिए बड़े पैमाने पर उत्पादन, लागत, hydrogen की उपलब्धता, carbon capture infrastructure, transportation, safety standards और commercial viability जैसे कई सवालों का जवाब मिलना बाकी है।

CO₂ को fuel में बदलना कितना महत्वपूर्ण है
CO₂ को सिर्फ waste gas मानने के बजाय उपयोगी chemical या fuel में बदलना Carbon Capture and Utilisation यानी CCU के व्यापक क्षेत्र का हिस्सा है। BITS Pilani की research इसी दिशा में industrial exhaust से carbon dioxide को value-added product में बदलने की कोशिश करती है।
यहां एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक अंतर समझना जरूरी है। CO₂ से fuel बनाना अपने आप में यह साबित नहीं करता कि पूरा fuel cycle carbon-neutral हो गया है। DME production के लिए hydrogen और energy की जरूरत होती है; इसलिए वास्तविक climate benefit इस बात पर निर्भर करेगा कि hydrogen और process energy किस स्रोत से आती है तथा कुल lifecycle emissions कितनी रहती हैं।
यही कारण है कि laboratory success को climate solution की अंतिम मंजिल के बजाय एक technological pathway के रूप में देखना ज्यादा उचित है।

शोधकर्ताओं ने औद्योगिक परिस्थितियों को कैसे परखा
रिपोर्ट के मुताबिक टीम ने laboratory setup में power plants जैसे industrial conditions को simulate करने की कोशिश की। इसके लिए high-pressure reactor में gas flow, pressure, temperature और feed composition जैसे parameters पर काम किया गया।
यह चरण इसलिए अहम है क्योंकि laboratory में नियंत्रित परिस्थितियों में मिली सफलता और वास्तविक industrial plant में लगातार operation के बीच बड़ा अंतर हो सकता है। औद्योगिक स्तर पर catalyst की durability, process stability, gas impurities, heat management और लगातार production जैसे मुद्दे सामने आते हैं।
BITS Pilani के प्रोजेक्ट रिकॉर्ड में thermal power plant exhaust से CO₂ conversion का उल्लेख भी इसी industrial application orientation को दर्शाता है। फिर भी commercial deployment के लिए अतिरिक्त engineering validation जरूरी होगी।

क्या DME अब LPG की जगह ले सकता है?
फिलहाल इसका जवाब नहीं है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक BITS Pilani की technology का laboratory validation पूरा हुआ है और अगला लक्ष्य pilot-scale development है। इसलिए इसे अभी LPG replacement के रूप में पेश करना वैज्ञानिक रूप से सही नहीं होगा।
भारत में 20 प्रतिशत DME-LPG blend के लिए BIS specification मौजूद होना जरूर एक महत्वपूर्ण regulatory आधार देता है। लेकिन किसी fuel technology का standard में covered होना और उसका बड़े पैमाने पर commercial household adoption दो अलग बातें हैं।
इसके अलावा DME-LPG blends के लिए safety, equipment compatibility, storage, transport और quality control भी महत्वपूर्ण हैं। भारत सरकार की पूर्व तकनीकी रिपोर्टों में DME-LPG blends से जुड़े material compatibility और handling requirements पर भी चर्चा की गई है।

तकनीक के सामने सबसे बड़ी चुनौती क्या है
अब इस research की सबसे बड़ी परीक्षा scale-up होगी। Laboratory reactor में सफल conversion को pilot plant और फिर commercial plant तक ले जाने के लिए process economics और long-duration performance का प्रमाण जरूरी होगा।
इसके साथ captured CO₂ की लगातार supply और hydrogen की लागत भी अहम होगी। यदि hydrogen fossil-based energy से तैयार होता है, तो पूरी प्रक्रिया का environmental advantage कम हो सकता है; वहीं low-carbon hydrogen उपलब्ध होने पर तस्वीर अलग हो सकती है।
इसलिए भविष्य की viability केवल यह देखकर तय नहीं होगी कि CO₂ से DME बन सकता है या नहीं। असली सवाल होगा कि इसे कितनी मात्रा में, कितनी लागत पर, कितनी स्थिरता के साथ और कितने कम lifecycle emissions के साथ बनाया जा सकता है।

क्या इस तकनीक से तुरंत LPG सस्ता होगा?
ऐसा निष्कर्ष अभी नहीं निकाला जा सकता। किसी नई fuel technology के commercial होने से पहले capital cost, raw material availability, hydrogen cost, plant efficiency, transportation और regulatory compliance समेत कई खर्चों का आकलन करना पड़ता है।
DME-LPG blending का Indian Standard मौजूद है, लेकिन इससे उपभोक्ता स्तर पर कीमत घटने की कोई स्वतः गारंटी नहीं बनती। संभावित आर्थिक फायदा तभी स्पष्ट होगा जब pilot और commercial scale पर उत्पादन लागत और performance के ठोस आंकड़े सामने आएं।

आगे क्या होगा
BITS Pilani की research अब laboratory validation से pilot-scale development की ओर बढ़ने की स्थिति में है। रिपोर्ट के अनुसार technology ने academia के बाहर भी interest आकर्षित किया है और private companies के साथ pilot-scale collaboration की संभावनाएं सामने आई हैं।
आने वाले चरण में सबसे महत्वपूर्ण परीक्षण technology की scalability और long-term stability का होगा। अगर pilot projects में conversion efficiency, catalyst life, energy consumption और cost-effectiveness के अच्छे परिणाम मिलते हैं, तभी commercial deployment की संभावना मजबूत होगी।
इस दिशा में भारत के existing DME-LPG standards भी एक उपयोगी regulatory foundation प्रदान करते हैं। हालांकि, बड़े पैमाने पर adoption के लिए सरकार, industry, fuel suppliers और research institutions के बीच coordinated development की जरूरत होगी।
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Apurva Choudhary

Apurva Choudhary

Shah Times Reporter

शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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