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असम में मुस्लिम बस्तियों को नहीं मुल्क के संविधान को किया जा रहा है बुल्डोज़

None 2025-08-30 22:34:26
असम में मुस्लिम बस्तियों को नहीं मुल्क के संविधान को किया जा रहा है बुल्डोज़

जमीअत उलमा-ए-हिंद: अदालतें बेअसर, संविधान कमज़ोर

 

असम में मुस्लिम बस्तियाँ नहीं, संविधान को किया गया निशाना

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने असम में मुस्लिम बस्तियों पर बुल्डोज़र कार्रवाई को संविधान और क़ानून का उल्लंघन बताया, सुप्रीम कोर्ट दख़ल की मांग की।

New Delhi ,(शाह टाइम्स ब्यूरो) । नई दिल्ली में आयोजित जमीअत उलमा-ए-हिंद की कार्यकारी समिति की बैठक ने देश के भीतर उठते सांप्रदायिक तनाव, असम में चल रही निष्कासन कार्रवाई और मुस्लिम बस्तियों पर बुल्डोज़र अभियान को लेकर गहरी चिंता जताई। मौलाना अरशद मदनी के नेतृत्व में हुई इस सभा ने साफ़ शब्दों में कहा कि यह केवल मुस्लिम बस्तियों का मुद्दा नहीं बल्कि भारतीय संविधान, क़ानून और न्यायिक व्यवस्था की साख का सवाल है।

मदनी का कहना था कि असम में पचास हज़ार से ज़्यादा परिवारों को धर्म के आधार पर घर से बेदख़ल करना दरअसल मुल्क की असली रूह यानी इंसाफ़ और बराबरी पर हमला है।

असम में बुल्डोज़र पॉलिटिक्स

असम की सरकार लगातार इस बात पर ज़ोर देती है कि जिन बस्तियों को हटाया गया वो "अवैध क़ब्ज़े" थीं। लेकिन सवाल उठता है कि अगर ये सचमुच अवैध थीं तो सरकार ने सालों तक वहां बिजली, पानी, स्कूल, राशन कार्ड जैसी सुविधाएं क्यों दीं।

यहां हक़ीक़त यह है कि "Bulldozer Justice" अब केवल उत्तर प्रदेश या मध्य प्रदेश तक सीमित नहीं रही, बल्कि असम जैसे संवेदनशील राज्य में भी उसे एक राजनीतिक औज़ार की तरह इस्तेमाल किया जा रहा है।

मौलाना मदनी का तर्क साफ़ है – "अगर अदालतों की कोई अहमियत नहीं रही और मुख्यमंत्री के फ़रमान ही क़ानून बन जाएं तो फिर लोकतंत्र किसलिए है?"

जमीअत का स्टैंड और क़ानूनी लड़ाई

जमीअत उलमा-ए-हिंद ने अपने पुराने स्टैंड को दोहराते हुए कहा कि उनकी लड़ाई किसी कौम या धर्म से नहीं बल्कि सरकार की नीतियों से है। संगठन का कहना है कि सड़कों पर टकराव की जगह उन्होंने अदालतों को चुना और यही रास्ता देश और मुसलमान दोनों के लिए बेहतर है।

सुप्रीम कोर्ट में पहले भी कई मामलों में जमीअत को राहत मिली है। इसी वजह से अब वो फिर से असम में हुए हालिया निष्कासन के खिलाफ संविधान की सर्वोच्च अदालत का दरवाज़ा खटखटाने जा रहे हैं।

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 संविधान बनाम राजनीति

भारत का संविधान हर नागरिक को बराबरी का अधिकार देता है। आर्टिकल 14, 15 और 21 नागरिकों को भेदभाव रहित जीने और न्याय पाने की गारंटी देते हैं। मगर असम में जो हो रहा है वो इन मूलभूत सिद्धांतों के उलट है।

राज्य सरकार का बयान कि "हम केवल मियां मुस्लिमों को निकाल रहे हैं" दरअसल इस पूरी कार्रवाई की असलियत खोल देता है। यह किसी क़ानून या प्रशासनिक नियम का पालन नहीं बल्कि सीधी सांप्रदायिक राजनीति है।

 सरकार का पक्ष

असम सरकार यह दलील देती है कि प्रदेश में घुसपैठ और अवैध बस्तियों की समस्या दशकों पुरानी है। एनआरसी प्रक्रिया के बाद भी कई विवाद unresolved रह गए। मुख्यमंत्री का कहना है कि प्रदेश के संसाधन सीमित हैं और "बाहरी लोगों" की वजह से असली नागरिकों पर बोझ बढ़ रहा है।

लेकिन सवाल उठता है कि जब NRC प्रक्रिया के दौरान ही नागरिकता की जांच पूरी हो चुकी है, तो अब बार-बार उसी बहाने से केवल एक समुदाय को क्यों निशाना बनाया जा रहा है।

समाज पर असर

इस तरह की कार्रवाई ने असम ही नहीं पूरे देश में अल्पसंख्यक समुदायों में गहरी असुरक्षा की भावना पैदा की है। गांव के गांव उजड़ गए, महिलाएं और बच्चे बेघर हो गए, शिक्षा और स्वास्थ्य व्यवस्था ठप हो गई।

सबसे बड़ा खतरा यह है कि समाज में हिंदू और मुसलमानों के बीच एक ऐसी खाई तैयार की जा रही है, जिसे भरना आसान नहीं होगा।

फिलिस्तीन और असम: एक पैरेलल चिंता

जमीअत की सभा ने असम के साथ-साथ फिलिस्तीन के हालात पर भी चिंता जताई। मदनी ने कहा कि गाज़ा में जो हो रहा है वो केवल एक ज़मीन की लड़ाई नहीं बल्कि इंसानियत के खिलाफ जंग है।

असम और फिलिस्तीन का मसला भले अलग-अलग हो, लेकिन दोनों जगह एक कॉमन पैटर्न दिखाई देता है – कमजोरों को बेघर करना, और ताक़तवर का क़ानून से ऊपर होना।

नतीजा 

मौलाना मदनी के शब्द आज की राजनीति की कड़वी हकीकत को सामने लाते हैं – "हिंदू मुसलमान करके सत्ता तो पाई जा सकती है, लेकिन देश नहीं चलाया जा सकता।"

असम में बुल्डोज़र की गर्जना सिर्फ़ घरों की दीवारें नहीं गिरा रही, बल्कि संविधान की बुनियाद को भी हिला रही है। अदालतें अगर चुप रहीं और समाज ने इंसाफ़ की आवाज़ बुलंद न की, तो कल यह नज़ीर किसी और समुदाय के खिलाफ भी इस्तेमाल हो सकती है।

इसलिए यह केवल असम या मुसलमानों का मुद्दा नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र और इंसाफ़ की जड़ों की रक्षा का सवाल है।

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शाह टाइम्स के वरिष्ठ संवाददाता। स्थानीय, राजनीतिक, अपराध, शिक्षा एवं सामाजिक विषयों पर नियमित रिपोर्टिंग।

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